बैंकों को एनपीए कर्ज के संकट से निकालने में सरकार मदद करेः उर्जित पटेल

एजेंसी/ मुंबई Updated Sat, 19 Aug 2017 07:40 PM IST
RBI governor Urjit Patel said government help banks to get rid of the crisis of NPA debt
रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल - फोटो : self
रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल ने सरकारी बैंकों को एनपीए की समस्या से निपटने में मदद के लिए उनके री-कैपिटलाइजेशन की मांग की है। उन्होंने कहा कि  सरकार समयबद्ध तरीके से इन बैंकों को पैसा दे ताकि ये इस समस्या से निकल से निकल सकें। पटेल ने कहा कि सरकारी बैंकों का एनपीए बढ़ कर बैंकिंग सिस्टम का 9.6 फीसदी हो गया है, जिसे किसी भी हालत में स्वीकार नहीं किया जा सकता। 

बैंकरों औैर उद्योगपतियों की बैठक में उर्जित पटेल ने कहा कि सकल एनपीए बौैंकिंग सिस्टम के 9.6 फीसदी पर पहुंच गया है, जबकि स्ट्रेस्ड एसेट रेश्यो मार्च 2017 में 12 फीसदी पर पहुंच चुका है। यह बेहद चिंता का विषय है। पटेल जिस बैठक में यह चिंता जता रहे थे उसमें वित्त मंत्री अरुण जेटली भी मौजूद थे।

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पटेल ने स्वीकार किया बैंकों का बैलेंसशीट इतना मजबूत नहीं है कि वे कर्ज लेकर अपनी स्थिति संभाल सकें। जाहिर है जब बैंकों का कर्ज फंसता है तो उनकी वित्तीय स्थिति खराब हो जाती है। सरकारी बैंकों की इस वक्त जो स्थिति है, उसमें उन्हें री-कैपिटलाइजेशन से ही बचाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि बैंकों के फंसे कर्ज का 86.5 फीसदी बड़े कर्जदारों के पास है।

वहीं दूसरी तरफ वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा है कि एनपीए प्रस्ताव को संकट में फंसी कंपनियों के कारोबार को खत्म करने के लिए नहीं बल्कि उन्हें बचाने के लिए है। उन्होंने कहा नाय दिवालिया कानून ने काफी हद तक डिफॉल्ट करने वाले देनदारों और लेनदारों के बीच रिश्ते बदल दिए हैं।

इस प्रस्ताव का मकसद कंपनियों की परिसंपत्तियों का निपटारा करना नहीं बल्कि उसका कारोबार बचाना है। इससे मौजूदा प्रमोटर को नए पार्टनर या नए उद्यमियों के साथ या उनके बगैर भी यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि उनकी अहम परसंपत्तियां बरकरार रहें। जेटली सीआईआई की ओर से आयोजित इनसोल्वेंसी समिट में बोल रहे थे। 

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फंसे कर्ज का आप पर असर 
1. बैंकों के फंसे कर्ज यानी एनपीए का आम आदमी पर भी असर होता है। चूंकि बैंक लोन देकर कमाई करते हैं। इसलिए कर्ज फंस जाने से उनकी कमाई घट जाती है। इसकी सीधी भरपाई आम ग्राहकों से की जाती है बैंक उन्हें उनके डिपोजिट पर कम ब्याज देता है। साथ ही बैंकों से लिए जाने वाले लोन की ब्याज दरें भी महंगी हो जाती हैं। 
2. सरकारी बैंकों को फंसे कर्ज से उबारने के लिए सरकार उन्हें धन मुहैया कराती है। सरकारी खजाने से दिया जाने वाला यह धन भी आपके टैक्स से जुटाया गया होता है। सरकारी के सार्वजनिक खाते से यह रकम जाने का विकास योजनाओं पर भी नकारात्मक असर पड़ता है। 

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