विलय से बैंकिंग व्यवस्था हो जाएगी बीमार, भाजपा के संगठन ने किया दावा
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केंद्र सरकार देश की बैंकिंग व्यवस्था को बीमार बना रही है। भाजपा से जुड़े संगठन नेशनल ऑर्गनाइजेशन ऑफ बैंकिंग वर्कर्स का कहना है कि विलय के बहाने सरकार सुधार के नाम पर बैंकों को और बीमार बना रही है। नेशनल ऑर्गेनाइजेशन ऑफ बैंकिंग वर्कर्स के महामंत्री अश्विनी राणा ने कहा कि सरकार के पास जमीन से जुड़े, भारतीय अर्थव्यवस्था को समझने वाले सलाहकारों का टोटा है। सरकार के सलाहकार सही नहीं हैं और बैंकों के विलय का भविष्य में अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ना तय है।
ऐसे नहीं पड़ा था 2008 की मंदी का असर
बैंकिग एसोसिएशन के पदाधिकारी ने 2008 की मंदी का जिक्र करते हुए कहा वो कोई छोटी मंदी नहीं थी। दुनिया के बड़े-बड़े बैंक इसमें दिवाला बोल गए, लेकिन भारत के किसी बैंक ने कोई अप्रिय सूचना नहीं दी। अश्विनी राणा ने कहा कि भारत की बैंकों के फंडामेंटल बहुत मजबूत रहे हैं। इसलिए ऐसा नहीं हो पाया था। केंद्र सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए। राणा के अनुसार 1991 में नरसिंहन कमेटी ने बैंकों के विलय की सिफारिश की थी, लेकिन यह लटकता रहा। अब सरकार ने अचानक निर्णय ले लिया है।
तीन साल में होगा विलय
अश्विनी राणा ने बड़ा सवाल उठाते हुए पूछा है कि 2017 में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया और 2018 में बैंक ऑफ बड़ौदा में कई बैंकों का विलय हुआ था। दो साल हो गए हैं और अभी तक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में विलय की प्रक्रिया चल रही है। इस बीच में केंद्र सरकार ने एक और बड़े विलय की घोषणा कर दी है। अश्विनी राणा का कहना है कि अर्थव्यवस्था बुरे दौर से गुजर रही है। यह बैंकों के विलय का सही समय नहीं है, लेकिन केंद्र सरकार ने बिना होमवर्क किए अचानक इसकी घोषणा कर दी। अब बैंक अपने कर्मियों के विलय, उनकी हाइरारिकी, तैनाती, स्थानांतरण समेत एचआर से जुड़े तमाम कामों में अगले दो -तीन सालों तक व्यस्त रहने वाले हैं। ऐसे में हमें समझ में नहीं आ रहा है कि देश के ये बैंक बैंकिंग कब करेंगे?
वसूली का कोई खाका नहीं
अश्विनी राणा ने कहा है कि बैंकों का लाखों करोड़ रुपया डूबा है। आठ लाख करोड़ रुपये से अधिक का एनपीए है। सरकार इस रिकवरी की वसूली के लिए कोई खाका नहीं पेश कर पा रही है। एनसीएलटी का गठन हो गया है, लेकिन उसके पास संसाधन नहीं हैं। जबकि सरकार को अर्थव्यस्था की गाड़ी को आगे बढ़ाने के लिए पहले रिकवरी पर विशेष ध्यान देना चाहिए था। इसके लिए सरकार संसाधन मुहैय्या कराती, तंत्र को मजबूत करती, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। अश्विनी का कहना है कि 17-18 अगस्त को बैंकों के क्षेत्रीय और प्रबंधक स्तर के अधिकारियों की बैठक बुलाई गई थी। इसमें उनसे अर्थवस्था में गति लाने का सुझाव मांगा गया था। दूसरी बैठक 22 अगस्त को हुई थी, जिसमें इन बैंकों के जीएम और अन्य बड़े अधिकारी शामिल हुए थे, जिसमें भी सुझाव मांगे गए थे। अश्विनी ने दावा किया है कि अधिकारियों ने बैंकों के विलय की सलाह नहीं दी थी। इतना ही नहीं, मार्च 2019 में मौजूदा सचिव राजीव कुमार ने कहा था कि बैंकों के विलय की अभी कोई योजना नहीं है, लेकिन केंद्र सरकार ने अचानक कदम उठा लिया।
बैंकों का लाभ प्रोविजन में खर्च
बैंकिंग एसोसिएशन ने कहा कि बैंक अभी लाभ की स्थिति में हैं। बैंकों ने 2.16 लाख करोड़ रुपये कमाए हैं और 1.75 लाख करोड़ रुपये प्रोविजन में चले गए। यदि सरकार बैंकों के ऋण की वसूली पर जोर देती तो यहां बैंकों को बड़ा लाभ होता। इससे बैंकिंग प्रक्रिया को गति मिलती और अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में सहायता मिलती। अश्विनी राणा का कहना है कि अभी बैंकों के जिम्मे कई काम हैं। उन्हें सरकार की योजनाएं लागू करनी हैं, बीमा कंपनियों के लिए थर्ड पार्टी का काम, मुद्रालोन, जनधन खाता, मध्यम, छोटे और लघु उद्योगों का भी ख्याल रखना है,
रोजगार का बड़ा केंद्र हैं बैंक
बैंक रोजगार देने का बड़ा साधन हैं। इस समय देश में करीब नौ लाख लोग बैंक में काम कर रहे हैं। 1.5-1.75 लाख लोग अगले दो-तीन साल में रिटायर होने वाले हैं। अश्विनी राणा मानते हैं कि सरकार ने बैंकों का विलय करने की घोषणा के दौरान कहा कि किसी की नौकरी नहीं जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं है। राणा ने बैंक भले ही विलय के बाद छंटनी न करें, लेकिन ऐसे हालात पैदा किए जाएंगे कि बड़ी संख्या में बैंक कर्मी नौकरी छोड़ने पर मजबूर हो जाएंगे।