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तालिबान राज: महिलाओं की जिंदगी बदतर होने का खौफ, अन्य मुस्लिम देशों में क्या है महिलाओं की स्थिति

Fri, 20 Aug 2021 02:58 PM IST
प्रतिभा ज्योति प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली।
प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: प्रतिभा ज्योति Updated Fri, 20 Aug 2021 02:58 PM IST
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सार
अफगानिस्तान पर तालिबान का राज होने के बाद दुनियाभर को सबसे ज्यादा डर अफगान महिलाओं की आजादी छीन जाने का  है। दुनिया खौफ में है कि रूढ़िवादी ताकतें प्रगतिशील समाज के भविष्य को कुचलने की कोशिश करेगीं और अफगानिस्तान की महिलाओं को अपने सपनों को साकार करने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ेगा। 
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Taliban rule in Afghanistan: Women's life is afraid of getting worse, what is the condition of women in other Muslim countries
अफगान महिलाएं... - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

तालिबान के काबुल पर काबिज होने के बाद अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश और संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटरेश अफगानिस्तान की महिलाओं की स्थिति को लेकर चिंता जाहिर कर चुके हैं। यूरोपिय देशों के साथ-साथ करीब 20 और देशों ने एक साझा बयान जारी कर महिलाओं के अधिकारों और उनकी आजादी सुनिश्चित करने की बात कही है।  



शरीया कानून के तहत हुकूमत करने की बात करने वाला तालिबान भले ही यह भरोसा दे चुका है कि वह महिलाओं को अपने कानून के तहत 'आजादी' देगा, वह महिलाओं को काम पर जाने से नहीं रोकेगा, लेकिन उसके कट्टर शासन का इतिहास देखते हुए इस बात पर यकीन करना मुश्किल है। दुनिया की आशंका सच साबित होती दिख रही है। 




अफगानिस्तान की टीवी पत्रकार शबनम दावरान ने तालिबान के इरादों की कलई खोल दी है। शबना दावरान ने दुनिया को बता दिया है कि तालिबान ने  उन्हें काम करने से रोक दिया है। शबनम से बताया कि तालिबान ने उनसे कहा- तुम एक महिला हो, अपने घर जाओ। तुम यहां काम नहीं कर सकती। इससे पहले अमेरिकी मीडिया हाउस सीएनएन चीफ इंटरनेशनल रिपोर्टर क्लैरिसा वार्ड हिजाब में नजर आईं थीं। 

कथित तौर पर तालिबान ने 15 से 45 साल की अकेली महिलाओं और विधवाओं की सूची बनाकर देने को कहा है, ताकि तालिबानी लड़ाके उनसे शादी कर सकें। महिलाएं बुर्का पहनने के मजबूर हो रही हैं और तालिबान लड़ाकों की खौफ की वजह से कामकाजी महिलाओं ने दफ्तर जाना बंद कर दिया है।

तालिबान के कट्टर शासन के इतिहास को देखते हुए  इस रिपोर्ट में हम कुछ मुस्लिम बहुल देशों जैसे मिस्र, ईरान, सऊदी अरब की महिलाओं के अधिकारों की स्थिति और उनके हालात पर एक नज़र डालने की कोशिश करते हैं। साथ ही यह समझते हैं कि कानून की नजर में उन्हें समानता का क्या अधिकार हासिल हुआ है? लेकिन पहले यह जान लीजिए कि 2001 से पहले जब तालिबान का अफगानिस्तान पर शासन था तो महिलाओं की जिंदगी कैसी थी?

  • महिलाओं पर खूब जुल्म ढाए जाते थे।
  • उन्हें दोयम दर्जे का समझा जाता था।
  • उन्हें पढ़ने की  इजाजत नहीं थी।
  • दफ्तरों में काम करने पर पाबंदी थी।
  • हील्स पहनकर बाहर निकलने की मनाही थी।
  • घर की बालकानी या छत पर जाना मना था। 
  • घर के किसी मर्द के बिना बाहर जाना मना था।
  • अकेले घर से निकलने पर उन्हें पीटा जाता था। 
     

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egypt - फोटो : social media

अब बात करते हैं अन्य मुस्लिम बहुल देशों की  

मिस्र-
देश के वर्तमान संविधान के अनुच्छेद 40 और 46 में स्पष्ट रूप से कहा गया है, "कानून के समक्ष सभी नागरिक समान हैं। नस्ल, जातीय मूल, भाषा, धर्म या पंथ के आधार पर उनके बीच भेदभाव के बिना उनके समान सार्वजनिक अधिकार और कर्तव्य हैं।" इसी संविधान का दूसरा अनुच्छेद घोषित करता है "इस्लाम राज्य का धर्म है और इस्लामी शरिया के सिद्धांत कानून का प्रमुख स्रोत हैं।" इस कानून के हिसाब से महिलाओं का हिजाब पहनना या सिर ढंकना जरूरी है। सामाजिक और धार्मिक दबावों के कारण महिलाएं इन आवरणों के बिना सार्वजनिक रूप से बाहर निकलने में हिचकिचाती हैं।

साल 2008 में मिस्र में खतना पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगने के बावजूद अभी भी इस देश में ये खतरनाक प्रथा बदस्तूर जारी है।  महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर बहुत कम हैं। देश के जिन हिस्सों में बहुत गरीबी है वहां महिलाओं के लिए नौकरी के कम अवसर हैं। 2004 में विश्व बैंक ने अपने एक अध्ययन में यह  अनुमान लगाया था कि, यदि मध्य पूर्व में महिलाएं दुनिया के अन्य हिस्सों के समान पुरूष साथियों के बराबर वेतन पर काम करें तो औसत घरेलू आय में पच्चीस प्रतिशत तक की वृद्धि हो सकती है, जो कई परिवारों को गरीबी से बाहर निकाल सकता है।

कुछ क्षेत्रों में महिलाएं अक्सर दुर्व्यवहार का शिकार होती हैं, इसलिए भी वे काम करने से हिचकती हैं। 2013 में संयुक्त राष्ट्र के एक सर्वेक्षण में यह खुलासा हुआ कि मिस्र में अनुमानित 99.3 फीसदी महिलाओं को कभी-न कभी यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है। मिस्र की संसद ने अब यौन अपराधों के खिलाफ एक नए कानून को मंजूरी दी है।

देश ने हाल के वर्षों में लैंगिक समानता की दिशा में कुछ प्रगति की है। लड़कियां और लड़के अब समान संख्या में स्कूल जाते हैं। मिस्र के विश्वविद्यालयों में पुरुष स्नातकों की तुलना में लड़कियों की संख्या ज्यादा होती है। युवतियां देर से शादी कर रही हैं और दो दशक पहले की तुलना में कम बच्चे पैदा कर रही हैं।  मिस्र में एक तिहाई महिलाएं सक्रिय रूप से राजनीति कर रही हैं। कहा जाता है कि प्राचीन मिस्र सभ्यता में महिलाओं के पास पुरुषों से ज्यादा अधिकार थे। पुरातत्व खुदाई में मिले एक भोजपत्र जिसमें एक शादी का अनुबंध दर्ज था, उससे शोधकर्ताओं को यह जानकारी मिली कि आज से 2500 साल पहले मिस्र के समाज में महिलाएं ज्यादा सक्षम थीं। 

ईरान की महिलाएं
ईरान की महिलाएं - फोटो : Social media
ईरान-
संयुक्त राष्ट्र के एक विशेषज्ञ जावेद रहमान ने मानवाधिकार परिषद को सौंपे अपनी एक रिपोर्ट में कहा, यहां महिलाओं और लड़कियों को दोयम दर्जे का  नागरिक माना जाता है। विशेषज्ञ ने अपनी रिपोर्ट में कहा,  हर साल 10 से 14 साल की हजारों बच्चियों की शादी हो रही है। बच्चियों और महिलाओं के अधिकार छीनने में बदस्तूर जारी बाल विवाह की कुप्रथा का बड़ा हाथ है।

इस रिपोर्ट के मुताबिक ईरानी कानून और व्यवहार में महिलाओं के लिए साफ तौर पर  भेदभाव मौजूद है। विवाह, तलाक, रोजगार और संस्कृति सहित जीवन के हर पहलू में, ईरानी महिलाएं पाबंदियों के घेरे में हैं। उन्हें अपने हर कदम के लिए पति या पैतृक अभिभावकों से अनुमति लेने की जरूरत होती है। ईरान में अगर पति को लगता है कि उसकी पत्नी ने नौकरी करना शुरू कर दिया है या वह देश के नागरिक संहिता के अनुसार व्यवहार नहीं कर रही है तो पति उसे काम करने से रोक सकता है। पत्नी की अंतरराष्ट्रीय यात्रा  प्रतिबंधित कर सकता है।

ईरान में कार्यस्थल पर अभी भी समान प्रतिनिधित्व की कमी है। ह्यूमन राइट्स वॉच  के अनुसार,  हर साल 50 फीसदी लड़कियां विश्वविद्यालयों से स्नातक होती हैं बावजूद इसके कार्यबल में महिलाएं केवल 17 फीसदी हैं।  हालांकि राजनीतिक तौर कुछ सकारात्मक कदम भी  कदम भी उठाए गए हैं। ईरान में पहले महिलाओं को राष्ट्रपति बनने की इजाजत नहीं थी और उनकी उम्मीदवारी को भी गैरकानूनी माना जाता था। लेकिन अब उन्हें यह इजाजत मिल गई है। हालांकि महिलाओं को संसदीय चुनाव लड़ने का अधिकार पहले से हासिल था।
 

सऊदी अरब-
यहां की महिलाओं को ड्राइविंग का अधिकार दिए जाने की बात ने दुनियाभर में सुर्खियां बटोरी थीं। कहा गया कि यह महिलाओं को अधिकार और आजादी देने का यह फ़ैसला  क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के 'विजन 2030' का हिस्सा है। यहां की महिलाएं युद्ध की भूमिकाओं को छोड़कर सैन्य और ख़ुफ़िया सेवाओं में शामिल हो सकती हैं। लेकिन विश्व आर्थिक मंच के विश्व लिंगभेद सूचकांक में हकीकत कुछ और भी है। सूचकांक में 144 देशों में इसका स्थान 138वां है।

यहां की महिलाएं अपने पुरुष अभिभावक की अनुमति के बिना बैंक अकाउंट नहीं खोल सकती हैं। सऊदी महिलाओं का पासपोर्ट बनवाने या देश से बाहर जाने के लिए भी पुरुष अभिभावक की सहमति लेना होता है। महिलाओं को किसी पुरूष के साथ रेस्तरां में बैठने की भी इजाजत नहीं है। महिलाएं शादी से लेकर तलाक तक के लिए पुरूष रिश्तेदारों की कृपा पर निर्भर है। महिलाओं के लिए उसका पुरुष अभिभावक होना अनिवार्य है।

सऊदी अरब की महिलाओं को सार्वजनिक स्थानों पर अपना चेहरा ढकने की  ज़रूरत नहीं है लेकिन उन्हें ढीला-ढाला और पूरा तन ढकने वाले कपड़े पहनने होते हैं। इन कपड़ों को 'अबाया' कहा जाता है। महिलाओं के लिए इन नियमों का पालन करना जरूरी है वरना धार्मक पुलिस उन पर कार्रवाई करती है।  सऊदी अरब में, महिलाओं को 2015 में वोट देने का अधिकार मिला है।  कुछ साल साल पहले एक महिला को मंत्री बनाया गया। 






 
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