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आखिर क्या है लुटियंस की दिल्ली, जिसे नहीं छोड़ना चाहते बड़े लोग

Fri, 03 Jul 2020 01:07 PM IST
सोनू शर्मा फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: सोनू शर्मा Updated Fri, 03 Jul 2020 01:07 PM IST
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What is Lutyens Delhi which Hi profile people do not want to leave
1950 के दशक में ऐसी थी लुटियंस की दिल्ली - फोटो : Social media

कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी को 35 लोधी एस्टेट स्थित सरकारी बंगला खाली करने का नोटिस दिया गया है। उन्हें एक अगस्त, 2020 तक बंगला खाली करने की मोहलत दी गई है। हाउसिंग और शहरी मामलों के मंत्रालय ने इस बाबत प्रियंका गांधी को नोटिस भेजा है। प्रियंका गांधी से एसपीजी सुरक्षा वापस ले कर जेड प्लस सुरक्षा दी गई है। एसपीजी कवर में सुरक्षा के मद्देनजर सरकारी बंगले का प्रावधान था, जेड प्लस में बंगले का प्रावधान नहीं है। 

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किन लोगों को लुटियंस दिल्ली में आवास आवंटित किए जाएंगे इसको लेकर वर्ष 2000 के दिसंबर माह में ही आवास पर कैबिनेट की समिति ने दिशा निर्देश जारी किए थे। इस नए निर्देश के तहत ये तय किया गया था कि किसी भी निजी व्यक्ति को इन आवासों का आवंटन नहीं किया जाएगा, लेकिन इसमें एक अपवाद उस श्रेणी का रखा गया जिन्हें स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप यानी एसपीजी सुरक्षा मिली हुई थी।
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इन विशेष श्रेणी के लोगों के लिए भी कई एकड़ में फैले लुटियंस दिल्ली के बंगलों का किराया बाजार की दर से पचास गुना ज्यादा रखा गया। वर्ष 2019 में सरकार ने संसद में एक विधेयक भी पारित कराया। इस विधेयक- सार्वजनिक परिसर (अनधिकृत लोगों की बेदख़ली) संशोधन विधेयक, 2019 ने वर्ष 1971 में लाए गए विधेयक में कई संशोधन किए।
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प्रियंका गांधी को आवंटित किए गए आवास को खाली कराने की कार्यवाही इसी विधेयक में मौजूद प्रावधानों के तहत की गई। भारत सरकार के आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय के अधीन संपदा निदेशालय ही लुटियंस दिल्ली स्थित इन आवासों का आवंटन करता है। संसद के दोनों सदनों के अलावा हर मंत्रालय के लिए आवास आवंटन के अलग-अलग 'पूल' बनाए गए हैं, जिसके तहत इन आवासों का आवंटन होता है। इसमें लोकसभा के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, राज्यसभा के सभापति और उपसभापति के अलावा सांसदों को ये आवास आवंटित किए जाते हैं।

इसके अलावा सेना, न्यायपालिका और कार्यपालिका के लिए भी अलग अलग 'पूल' निर्धारित किए गए हैं। पूल यानी के इनके लिए अलग-अलग आवासों को चयनित किया जाता है जिसमें यही रहते हैं। इसके अलावा राज्य सरकारों के प्रतिनिधियों के लिए भी लुटियंस दिल्ली के आवासों के आवंटन का प्रावधान है। लुटियंस दिल्ली के बंगलों में रहने के लिए हमेशा रसूखदार लोगों के बीच होड़ लगी रहती है। अपना कार्यकाल खत्म होने के बाद भी बहुत सारे ऐसे हैं जो बंगले खीली नहीं करना चाहते।

इसी साल फरवरी माह में आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय ने वैसे आवासों या बंगलों की सूची बनाई, जिनपर अनाधिकृत रूप से लोग रह रहे हैं। मंत्रालय को तब हैरानी हुई जब रिपोर्ट में पता चला कि इनकी संख्या 600 से कुछ कम बताई जा रही है, जिसमें दो मौजूदा सांसद के अलावा भूतपूर्व सांसद, राजनीतिक दलों के कद्दावर नेता और ऐसे नौकरशाह भी शामिल हैं जो वर्ष 2001 में ही सेवानिवृत हो चुके हैं।

क्या है लुटियंस की दिल्ली?

किंग जॉर्ज V और ब्रिटेन की महारानी मेरी अपने उपनिवेश यानी उस वक्त के भारत के दौरे पर थे। वर्ष 1911 की 15 दिसंबर को किंग्सवे कैंप के पास शाही दंपत्ति ने 'दिल्ली दरबार' की नींव रखी। इसका निर्माण कार्य वर्ष 1912 में शुरू हुआ और ये 10 फरवरी वर्ष 1931 में पूरा हो गया जब इसका औपचारिक उद्घाटन किया गया। भारत की आजादी के बाद अंग्रेज शासक तो चले गए, मगर लुटियंस की दिल्ली में भारत के उस समय के बड़े लोग - चाहे नेता हों, नौकरशाह या फिर उद्योगपति - यानी प्रभावशाली लोग इन बंगलों में रहने लगे। 

वर्ष 2015 में भारत की संसद ने एक अध्यादेश के जरिये 'दिल्ली शहरी कला आयोग' का गठन किया, जिसका अध्यक्ष प्रोफेसर पीएसएन राव को बनाया गया। इस आयोग ने लुटियंस की दिल्ली में कई इलाकों को शामिल करने और कुछ इलाकों को इससे निकालने का प्रस्ताव अपनी रिपोर्ट में सरकार को सौंपा। कई पुराने बंगलों के विस्तार और एक मंजिला घरों को दो मंजिलों तक बनाने का प्रस्ताव भी इसमें शामिल है।

पूल यानी के इनके लिए अलग-अलग आवासों को चयनित किया जाता है, जिसमें यही रहते हैं। इसके अलावा राज्य सरकारों के प्रतिनिधियों के लिए भी लुटियंस दिल्ली के आवासों के आवंटन का प्रावधान है। लुटियंस दिल्ली के बंगलों में रहने के लिए हमेशा रसूखदार लोगों के बीच होड़ लगी रहती है। अपना कार्यकाल खत्म होने के बाद भी बहुत सारे ऐसे हैं जो बंगले खाली नहीं करना चाहते।

इसी साल फरवरी माह में आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय ने वैसे आवासों या बंगलों की सूची बनाई, जिनपर अनाधिकृत रूप से लोग रह रहे हैं। मंत्रालय को तब हैरानी हुई जब रिपोर्ट में पता चला कि इनकी संख्या 600 से कुछ कम बताई जा रही है, जिसमें दो मौजूदा सांसद के अलावा भूतपूर्व सांसद, राजनीतिक दलों के कद्दावर नेता और ऐसे नौकरशाह भी शामिल हैं जो वर्ष 2001 में ही सेवानिवृत हो चुके हैं।

इन दोनों के मामलों में गृह मंत्रालय का तर्क है कि सुरक्षा कारणों से इन दोनों नेताओं को अपने आवासों में रहने की अनुमति प्रदान की गई है, हालांकि इनकी सुरक्षा भी एसपीजी नहीं प्रदान करती है। गौर करने वाली बात ये है कि भारत सरकार के आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय के अधीन संपदा निदेशालय, जो इन आवासों का आवंटन करता है, उसके पास आवंटनों से संबंधित कोई डेटाबेस नहीं है।

इसलिए सूचना के अधिकार के तहत जानकारी हासिल करने वालों को ये विभाग जवाब नहीं दे पाता है, ये कहते हुए कि संसद का अपना संपदा विभाग अलग है जो इसकी जानकारी रखता है, लेकिन संसद के संपदा विभाग का कहना है कि उसके पास सिर्फ मौजूदा सदस्यों की ही जानकारी है। जिनके कार्यकाल खत्म हो गए हैं उनके बारे में कोई जानकारी नहीं है।

उसी तरह हर मंत्रालय के अपने अलग-अलग पूल हैं और उनके अलग-अलग संपदा यानी एस्टेट विभाग, जिनके पास अलग-अलग जानकारियां हैं। सूचना और तकनीक की क्रांति के इस दौर में एक जगह पर इन सूचनाओं का ना होना किसी को भी हैरत में डाल सकता है। 

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