जासूसी करने के भी अजब-गजब तरीके होते हैं। खुफिया कोड, बनावटी बातें, खास जबान, चेहरे पर चेहरा, हनीट्रैप वगैरह वगैरह...। कुल मिलाकर खुफियागिरी या जासूसी आम तौर पर लोगों की नजरें बचाकर, छुप-छुपाकर की जाती है, ताकि दुश्मन की नजर ना पड़े। कोई जान न जाए। लेकिन आप ने कभी नहीं सुना होगा कि कोई देश रेडियो स्टेशन से जासूसी करता है और वो भी खुलेआम, पूरी दिलेरी से। नहीं सुना, तो चलिए आपको एक ऐसे रेडियो स्टेशन का किस्सा सुनाते हैं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : Pixabay
ये रेडियो स्टेशन रूस के सेंट पीटर्सबर्ग शहर से कुछ दूर पर सुनसान इलाके में है। रेडियो स्टेशन से नियमित अंतराल पर कुछ प्रसारण होता है। इसके बाद जैसे किसी रेडियो स्टेशन से प्रसारण बंद हो जाता है, ठीक उसी तरह इस स्टेशन से भी भनभनाहट सुनाई देती रहती है। इस रेडियो स्टेशन का ऐसा अजीबो-गरीब प्रसारण पिछले कई दशकों से जारी है। कुछ आवाजें और फिर वही भनभनाहट।
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दिलचस्प बात ये है कि दुनियाभर में ये रेडियो स्टेशन सुना जाता है, पर किसी को नहीं मालूम कि ये रेडियो स्टेशन कौन चला रहा है। किसी भी रिकॉर्ड में ये रेडियो स्टेशन नहीं दर्ज है। रूस की सरकार इसकी मौजूदगी से अनजान बनती है। अब ऐसे रहस्यमयी स्टेशन का नाम भी अजीबो-गरीब होना तय है। तो, इस रेडियो स्टेशन का नाम है MDZhB। पश्चिमी देशों में इसे 'द बजर' के नाम से जाना जाता है। पिछले करीब 35 साल से ये रेडियो स्टेशन विचित्र आवाजें दुनिया को सुना रहा है, लेकिन कोई अब तक इसका मकसद डिकोड नहीं कर पाया है।
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इस रेडियो स्टेशन पर दुनिया की नजर पड़ने की वजह एक अजीब सा रूटीन है। हफ्ते में एक या दो बार कोई मर्द या औरत इस स्टेशन पर कुछ शब्द बोलते हैं, जैसे कि डिंगी या किसानी के विशेषज्ञ। बस, इसके बाद रेडियो स्टेशन की फ्रीक्वेंसी पर वही भनभनाहट सुनाई देती है। ये रेडियो स्टेशन शॉर्ट वेव पर प्रसारित होता है। इसी वजह से ये दुनियाभर में सुना जाता है। इस रेडियो स्टेशन के अजीब प्रसारण की वजह से ही इसे लेकर तमाम तरह के किस्से दुनिया भर में प्रचलित हो चले हैं। इसी तरह के दो और रेडियो स्टेशन हैं। ऐसे अजीब रेडियो सुनने के शौकीन लोग इन्हें 'द पिप' और 'स्क्वीकी व्हील' के नाम से बुलाते हैं।
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ऑनलाइन दुनिया में इन तरह के रहस्यमयी रेडियो स्टेशनों के तमाम चाहने वाले हैं। वो नियमित रूप से इनका प्रसारण या इनकी भनभनाहट सुनते हैं। लंदन की सिटी यूनिवर्सिटी के सिग्नल स्पेशलिस्ट डेविड स्टपल्स कहते हैं कि इन रेडियो स्टेशनों का मकसद अब तक डिकोड नहीं हो सका। रेडियो स्टेशन की फ्रीक्वेंसी की बुनियाद पर पश्चिमी देश ये मानते हैं कि ये रूसी सेना से ताल्लुक रखता है। इसका प्रसारण शीत युद्ध के आखिरी दिनों में शुरू हुआ था। आज 'द बजर' रेडियो स्टेशन का प्रसारण सेंट पीटर्सबर्ग और मॉस्को से होता है। सोवियत संघ के विघटन के बाद रेडियो के प्रसारण में कमी आने के उलट तेजी आ गई है।