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Hindi News ›   Bihar ›   A temple linked to Lord Rama—yet the Garhdevi temple remains in a dilapidated state:

बिहार: नवरात्र में उमड़ती है भीड़, लेकिन मंदिर परिसर में गड्ढे; आखिर कब बदलेगी तस्वीर?

Mon, 19 Oct 2026 08:51 PM IST
सारण ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, छपरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, छपरा Published by: सारण ब्यूरो Updated Mon, 19 Oct 2026 08:51 PM IST
सार

सारण के बनियापुर स्थित वैष्णवी माता गढ़देवी मंदिर का 2007 में चारदीवारी निर्माण के बाद समुचित विकास नहीं हुआ। परिसर में गड्ढों और अधूरे निर्माण से श्रद्धालु परेशान हैं। स्थानीय लोग मंदिर के संरक्षण, सौंदर्यीकरण और ऐतिहासिक महत्व के अध्ययन की मांग कर रहे हैं।

 

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A temple linked to Lord Rama—yet the Garhdevi temple remains in a dilapidated state:
श्रीराम से जुड़ी बदहाल गढ़ देवी मंदिर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

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जहां भगवान श्रीराम के आगमन से जुड़ी स्थानीय मान्यताएं हैं, जहां नवरात्र में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है और जहां आसपास के दर्जनों गांवों के लोग मांगलिक कार्यों की शुरुआत माता की पूजा-अर्चना से करते हैं, वही वैष्णवी माता गढ़देवी मंदिर आज भी विकास की बाट जोह रहा है। सारण जिले के बनियापुर प्रखंड की कराह पंचायत में कराह और इब्राहिमपुर गांव की सीमा पर स्थित यह प्राचीन धार्मिक स्थल संरक्षण और सौंदर्यीकरण की अधूरी पहल का उदाहरण बना हुआ है। स्थानीय लोगों के अनुसार, वर्ष 2007 में चारदीवारी बनने के बाद मंदिर के समग्र विकास की दिशा में कोई बड़ी पहल नहीं हुई। क्षेत्र से जुड़े कई जनप्रतिनिधियों के महत्वपूर्ण पदों पर रहने के बावजूद मंदिर परिसर में बुनियादी सुविधाओं और संरक्षण की जरूरत बनी हुई है।

मांगलिक कार्यों से पहले माता के दरबार में हाजिरी
गढ़देवी मंदिर आसपास के गांवों के लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। हरपुर, कराह, भूमिहारा और इब्राहिमपुर सहित दर्जनों गांवों के लोग शादी-विवाह समेत अन्य मांगलिक कार्यों की शुरुआत माता की पूजा-अर्चना से करते हैं। नवदंपती भी विवाह के बाद माता का आशीर्वाद लेने पहुंचते हैं। मंदिर में माता की सातों बहनों की पिंडी स्वरूप में पूजा करने की परंपरा है। शारदीय और चैत्र नवरात्र में यहां विशेष पूजा-अर्चना होती है, जबकि कार्तिक महीने में मेला भी लगता है। धार्मिक परंपराओं और स्थानीय जनजीवन से गहराई से जुड़े इस मंदिर में श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रहती है। ऐसे में परिसर की बदहाल स्थिति और बुनियादी सुविधाओं की कमी लोगों के लिए परेशानी का कारण बनती है।

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श्रीराम के जनकपुर जाने से जुड़ी है मान्यता
स्थानीय लोगों के अनुसार, भगवान श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण के साथ ताड़का वध और अहिल्या उद्धार के बाद इसी मार्ग से जनकपुर गए थे। मान्यता है कि जनकपुर जाने के दौरान उन्होंने यहां माता की पूजा-अर्चना भी की थी। स्थानीय लोग हरपुर-कराह नाम को भी इस प्राचीन मार्ग से जुड़ी मान्यताओं के संदर्भ में देखते हैं।

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एक अन्य धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस स्थल पर माता सती की नाक गिरी थी। हालांकि, इन मान्यताओं की ऐतिहासिक पुष्टि के लिए प्रमाणिक शोध और पुरातात्विक अध्ययन आवश्यक हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक महत्व से जुड़े इस स्थल के संरक्षण के लिए गंभीर पहल होनी चाहिए।


2007 में बनी चारदीवारी, फिर थम गई विकास की रफ्तार
मंदिर परिसर के संरक्षण की दिशा में वर्ष 2007 में पहल की गई थी। तत्कालीन कला एवं संस्कृति मंत्री जनार्दन सिंह सिग्रीवाल की पहल पर बिहार सरकार के कला एवं संस्कृति विभाग की ओर से परिसर की चारदीवारी का निर्माण कराया गया था। स्थानीय लोगों के मुताबिक, उस समय कला-संस्कृति और पुरातत्व विभाग के अधिकारियों ने भी स्थल का निरीक्षण किया था।

स्थल को पालकालीन गढ़ से जोड़कर देखा गया और इसके संरक्षण व सौंदर्यीकरण की रूपरेखा तैयार करने की बात कही गई थी। हालांकि, चारदीवारी निर्माण के बाद विकास की रफ्तार आगे नहीं बढ़ सकी। स्थानीय लोगों के सहयोग से परिसर में निर्माण कार्य शुरू हुआ, लेकिन वह भी अधूरा रह गया। समय के साथ अधूरे निर्माण की स्थिति खराब होती गई और मंदिर के समग्र विकास की उम्मीद अधूरी रह गई।

सौंदर्यीकरण के नाम पर गड्ढे, श्रद्धालुओं को परेशानी
स्थानीय लोगों का आरोप है कि मनरेगा के तहत सौंदर्यीकरण के नाम पर लाखों रुपये खर्च किए गए, लेकिन मंदिर परिसर में आज भी बड़े-बड़े गड्ढे बने हुए हैं। इससे श्रद्धालुओं को आवागमन में परेशानी होती है और उनके चोटिल होने का खतरा बना रहता है।

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नवरात्र और अन्य धार्मिक अवसरों पर यहां श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ जाती है। ऐसे में परिसर को सुरक्षित और व्यवस्थित बनाना जरूरी है। स्थानीय लोग सवाल उठा रहे हैं कि यदि विकास कार्यों के लिए राशि खर्च की गई, तो उसका अपेक्षित परिणाम परिसर में क्यों नहीं दिखाई दे रहा है। हालांकि, खर्च की गई राशि, कराए गए कार्यों और उनकी वर्तमान स्थिति की पुष्टि के लिए संबंधित अभिलेखों की जांच जरूरी है।

जनप्रतिनिधियों की पहल का इंतजार
स्थानीय लोगों के मुताबिक, इस क्षेत्र से जुड़े कई जनप्रतिनिधि मंत्री और सांसद जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रह चुके हैं। इनमें पूर्व मंत्री उमा पाण्डेय और वैद्यनाथ पाण्डेय, पूर्व सांसद गिरजा देवी तथा पूर्व मंत्री जनार्दन सिंह सिग्रीवाल शामिल हैं। सिग्रीवाल वर्तमान में इसी संसदीय क्षेत्र से सांसद हैं और पड़ोसी गांव से उनका संबंध बताया जाता है।

इसके बावजूद मंदिर के समग्र विकास, ऐतिहासिक महत्व के अध्ययन और श्रद्धालुओं की सुविधाओं के विस्तार की दिशा में ठोस पहल की जरूरत बनी हुई है। लोगों के बीच यह सवाल भी है कि वर्षों पहले संरक्षण और सौंदर्यीकरण को लेकर जगी उम्मीद अब तक धरातल पर क्यों नहीं उतर सकी। हालांकि, इस संबंध में जनप्रतिनिधियों की किसी हालिया पहल या आधिकारिक प्रतिक्रिया की जानकारी उपलब्ध नहीं है।

सर्वेक्षण और संरक्षण से बदल सकती है तस्वीर
गढ़देवी मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थल नहीं, बल्कि स्थानीय आस्था और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। जरूरत है कि जिला प्रशासन और संबंधित विभाग मंदिर परिसर का सर्वेक्षण कराएं। अधूरे निर्माण और मनरेगा के तहत कराए गए कार्यों की स्थिति की जांच के साथ स्थल के ऐतिहासिक महत्व का प्रमाणिक अध्ययन भी कराया जाए।

इसके अलावा, परिसर के गड्ढों को भरने, सुरक्षित आवागमन, साफ-सफाई और श्रद्धालुओं के लिए बुनियादी सुविधाओं की व्यवस्था की जानी चाहिए। इससे मंदिर परिसर की स्थिति सुधरने के साथ धार्मिक पर्यटन को भी बढ़ावा मिल सकता है।

अब सवाल यही है कि वर्षों से विकास की बाट जोह रहे गढ़देवी माता मंदिर के संरक्षण और सौंदर्यीकरण की पहल कब शुरू होगी। भगवान श्रीराम से जुड़ी स्थानीय मान्यताओं और हजारों लोगों की आस्था वाले इस प्राचीन स्थल को उसका अपेक्षित सम्मान और संरक्षण कब मिलेगा, यह देखना बाकी है।

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