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बिहार: छठ से पहले बढ़ी पीतल के बर्तनों की मांग, परेव की पीतल नगरी में कैसे तैयार होते हैं बर्तन

Fri, 30 Oct 2026 04:52 PM IST
पटना ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पटना
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पटना Published by: पटना ब्यूरो Updated Fri, 30 Oct 2026 04:52 PM IST
सार

दीपावली और छठ पूजा से पहले पीतल के बर्तनों की मांग बढ़ गई है। पटना से करीब 40 किलोमीटर दूर बिहटा का परेव गांव पीतल के बर्तनों के निर्माण के लिए प्रसिद्ध है। यहां पारंपरिक कारीगरी और आधुनिक मशीनों की मदद से सूप, लोटा, थाली समेत कई तरह के बर्तन तैयार किए जाते हैं। यह उद्योग करीब 10 हजार परिवारों की आजीविका का सहारा है।
 

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Demand for brass utensils increases on Diwali and Chhath
तेज हुई पीतल के बर्तनों की मांग - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

दीपावली और छठ पूजा का पर्व नजदीक आते ही बाजारों में पीतल के बर्तनों की खरीदारी तेज हो गई है। छठ पूजा में पीतल के सूप, लोटा, थाली और अन्य पूजन सामग्री की खास मांग रहती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ये बर्तन बनते कैसे हैं? बिहार की राजधानी पटना से करीब 40 किलोमीटर दूर बिहटा का परेव गांव इसी पारंपरिक कारीगरी के लिए मशहूर है। यहां कारीगर छह से सात प्रक्रियाओं से गुजरकर पीतल के बर्तनों को तैयार करते हैं। इस उद्योग से करीब 10 हजार परिवारों की रोजी-रोटी जुड़ी हुई है।
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पीतल के स्क्रैप से तैयार होता है चमकदार बर्तन
परेव के कारखानों में पीतल के बर्तन बनाने की प्रक्रिया काफी मेहनत वाली है। फैक्ट्री संचालकों के मुताबिक, सबसे पहले पीतल के स्क्रैप को भट्ठी में गलाया जाता है। इसके बाद पिघली धातु को गोल आकार दिया जाता है और मशीन की मदद से चपटा किया जाता है।
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फिर जरूरत के अनुसार अलग-अलग सांचों और मशीनों से उसे बर्तन का आकार दिया जाता है। इसके बाद कारीगर उसकी बनावट को दुरुस्त करते हैं। आखिर में घिसाई और पॉलिश के जरिए बर्तनों को चमकाया जाता है। इस तरह करीब छह से सात प्रक्रियाओं के बाद बर्तन बिक्री के लिए तैयार होते हैं।
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मशीनों ने आसान किया कारीगरों का काम
स्थानीय कारीगरों का कहना है कि पहले बर्तनों को तैयार करने और चमकाने में काफी मेहनत लगती थी। कई प्रक्रियाएं पूरी तरह हाथों से करनी पड़ती थीं। अब आधुनिक मशीनों के इस्तेमाल से काम आसान हुआ है और उत्पादन में भी सुविधा मिली है।

हालांकि, बाजार में नए डिजाइन और अधिक चमकदार बर्तनों की मांग बढ़ने से प्रतिस्पर्धा भी तेज हुई है। ऐसे में स्थानीय उद्योग के सामने अपनी पारंपरिक पहचान बनाए रखने के साथ आधुनिक जरूरतों के अनुरूप उत्पादन करने की चुनौती है।

नेपाल के बर्तनों से मिल रही स्थानीय उद्योग को चुनौती
परेव के पीतल उद्योग की पहचान मजबूत और टिकाऊ बर्तनों के निर्माण के लिए रही है। लेकिन स्थानीय कारोबारियों के मुताबिक, नेपाल में तैयार होने वाले आकर्षक और चमकदार बर्तनों से उन्हें प्रतिस्पर्धा मिल रही है।

कारोबारियों का कहना है कि सस्ते कच्चे माल और आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल से दूसरे स्थानों पर तैयार होने वाले बर्तन बाजार में अपनी जगह बना रहे हैं। वहीं, सरकारी योजनाओं और सुविधाओं का अपेक्षित लाभ नहीं मिलने से परेव के उद्योग को आधुनिक बनाने की जरूरत बनी हुई है।

शादी-विवाह से लेकर छठ पूजा तक रहती है मांग
स्थानीय दुकानदार अमरजीत कुमार के मुताबिक, कारखानों में तैयार होने के बाद बर्तन दुकानों तक पहुंचते हैं। लोग इन्हें शादी-विवाह, शुभ कार्यों, दीपावली और छठ पूजा के लिए खरीदते हैं।
छठ पूजा के दौरान पीतल के सूप और अन्य पूजन सामग्री की मांग विशेष रूप से बढ़ जाती है। परेव में बने बर्तनों की आपूर्ति बिहार के अलावा दूसरे राज्यों में भी होती है। कई लोग अन्य राज्यों से भी यहां के बर्तन खरीदने पहुंचते हैं।

करीब 10 हजार परिवारों की आजीविका इस उद्योग पर निर्भर
परेव का पीतल उद्योग सिर्फ बर्तन बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था की महत्वपूर्ण कड़ी भी है। इस कारोबार से जुड़े लोगों के अनुसार, करीब 10 हजार परिवारों और मजदूरों की आजीविका इससे चलती है।
बिहार सरकार ने वर्ष 2008 में इस उद्योग को पहचान दिलाने की पहल की थी। इसके बाद केंद्र सरकार के सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय की ओर से करीब दो करोड़ रुपये की लागत से सामान्य सुविधा केंद्र बनाने की पहल की गई थी। इसका उद्देश्य स्थानीय कारीगरों को बेहतर तकनीक और सुविधाएं उपलब्ध कराना था।


आधुनिक सुविधाओं के इंतजार में परेव की पीतल नगरी
परेव आज भी अपनी पारंपरिक कारीगरी के दम पर बाजार में पहचान बनाए हुए है। दीपावली और छठ जैसे त्योहारों में बढ़ती मांग इस उद्योग के महत्व को दिखाती है। हालांकि, बदलते बाजार, आधुनिक डिजाइन और बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच स्थानीय उद्योग को नई तकनीक, बेहतर सुविधाओं और सरकारी सहयोग की जरूरत है। इससे न केवल कारीगरों की आजीविका सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी, बल्कि पीतल के बर्तन बनाने की यह परंपरा भी आगे बढ़ सकेगी।
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