फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Bihar ›   Notbandi: What would you like to be close to Modi, Nitish

नोटबंदी: क्या मोदी के करीब जाना चाहते हैं नीतीश

Sat, 26 Nov 2016 01:15 PM IST
मणिकांत ठाकुर/ बीबीसी
मणिकांत ठाकुर/ बीबीसी Updated Sat, 26 Nov 2016 01:15 PM IST
विज्ञापन
Notbandi: What would you like to be close to Modi, Nitish
- फोटो : bbc

बिहार की सत्ता में साझीदार तीनों दलों के - यानी जनता दल यूनाइटेड (जदयू), राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और कांग्रेस के दबे हुए मनभेद कुछ मुद्दों पर मतभेदों की शक्ल में उभरने शुरू हो गए हैं। ताजा उदाहरण है 500 और 1000 के पुराने नोटों पर लगा बैन।

विज्ञापन


नोटबंदी के ज्वलंत मुद्दे पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का जो चौंकाने वाला समर्थन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मिला है, उससे दरार के वही संकेत सुर्खियों में आ गए हैं।वैसे, अभी यह महज संकेत ही है। इससे नीतीश-लालू गठबंधन सरकार में टूट-फूट की कोई ठोस गुंजाइश तलाशने वालों को फिलहाल निराशा ही हाथ लगेगी।
विज्ञापन


कारण स्पष्ट है। दोनों नेता राजनीति के ऐसे कच्चे खिलाड़ी नहीं हैं कि 'जहर के घूंट' पीकर बहुमत से मिली 'अमृत नुमा' सत्ता को इतनी जल्दी गंवा देने जैसी गलती करेंगे।लेकिन हां, निपट स्वार्थ जनित सियासत के इस दौर में अपनी महत्वाकांक्षा या राजभोग की लालसा पूरी करने के लिये आगे की रणनीति बनाने से भला ये भी क्यों चूकेंगे?
विज्ञापन
विज्ञापन


नीतीश कुमार को अगर लगता है कि उन्हें प्रधानमंत्री पद तक पहुंचाने वाली दिशा में लालू यादव और मुलायम सिंह यादव की युगलबंदी बाधक बन सकती है, तो उस पर 'नोटबंदी' समर्थन का तीर चला देना उनकी रणनीति का हिस्सा हो सकता है। यह भी हो सकता है कि नीतीश कुमार नोटबंदी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का साहसिक कदम बता कर इस तीर से कई शिकार करना चाह रहे हों।
 

नोटबंदी प्रधानमंत्री का 'मास्टर स्ट्रोक' मानता है जदयू

Notbandi: What would you like to be close to Modi, Nitish

एक तरफ उन्होंने काले धन या काले धंधे से अलग रहने वाले नेताओं जैसी अपनी छवि दर्शाने की कोशिश की है। दूसरी तरफ उनका यह कदम भाजपा से तालमेल वाले उनके मृत रिश्ते के फिर से जिंदा होने जैसी संभावना या अटकल को हवा दे कर उन्हें फायदा पहुंचा सकता है। जाहिर है कि ये दोनों बातें राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा विरोधी कारगर मोर्चेबंदी के इच्छुक नेताओं को चिंता में डाल सकती हैं। इसलिये यह दबाव नीतीश कुमार की नेतृत्व-चाहत को पूरी करने के काम आ सकता है।

नोटबंदी के मुद्दे पर नीतीश कुमार के रुख को कांग्रेस ने भी पसंद नहीं किया है।पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और बिहार के शिक्षा मंत्री अशोक चौधरी ने अपने आलाकमान का इशारा पाकर इस बाबत गठबंधन धर्म के संदर्भ में एक सख्त बयान देने की हिम्मत की। एक नजरिया और है, जो नोटबंदी के सवाल पर जदयू में दिख रहे अंतर्विरोध का विश्लेषण देता है।

अपने दल के कुछ बड़े नेताओं को नीतीश कुमार ने नोटबंदी के खिलाफ खुल कर सामने आयी विपक्षी पार्टियों के साथ भी खड़ा कर दिया है। तर्क यह दिया जा रहा है कि विमुद्रीकरण पर अमल में गड़बड़ी की वजह से परेशान हो रहे आम लोगों की आवाज संसद में और सड़क पर उठाने में जदयू विपक्ष के साथ है। यानी नीतीश कुमार प्रतिपक्षी गोलबंदी से खुद को अलग-थलग भी दिखाना नहीं चाहते।विरोधाभास देखिये कि इसी दल के राज्यसभा सदस्य और वरिष्ठ पत्रकार हरिवंश इस नोटबंदी को प्रधानमंत्री का 'मास्टर स्ट्रोक' मानते हैं। तो क्या समझा जाय कि नीतीश कुमार इस प्रकरण में अपने दोनों हाथों में लड्डू देख रहे हैं? मेरे ख्याल से इस खेल में विश्वसनीयता घटने का जोखिम भी है।

 

गठबंधन के दरकने या बिखरने की आशंका कम

Notbandi: What would you like to be close to Modi, Nitish
नोटंबदी पर नीतीश के बयान को बीजेपी के फिर से करीब आने की कोशिश का हिस्सा के तौर पर देखा जा रहा है।उधर लालू प्रसाद यादव भाजपा के प्रति अपने खूंटागाड़ विरोध को और चमकाते हुए बिहार की सत्ता पर पारिवारिक पकड़ बढाने की जुगत में लगे हुए हैं। मार-सम्हार की कला में माहिर लालू प्रसाद अपने पुत्र-मंत्रियों को जदयू वालों के उकसावे पर संयम नहीं खोने की हिदायत दे कर उन्हें टकराव से बचाते रहते हैं।

लेकिन यह भी सच है कि बिहार में लागू शराबबंदी को नीतीश कुमार ने अपनी खास उपलब्धि के रूप में देश भर में प्रचारित-प्रसारित करने/कराने की जो मुहिम छेड़ी, वह इस राज्य की गठबंधन सरकार के सबसे बड़े साझीदार राष्ट्रीय जनता दल की चुभन बन गयी है। इस बीच कई और ऐसे सरकारी निर्णय और कार्यक्रम सामने आये, जो राजद की उपेक्षा या जदयू के वर्चस्व के संकेत दे गये। साथ ही कुछ काण्ड ऐसे भी हुए, जिनमें जदयू को बचा कर राजद की छवि खराब होने देने के प्रयास दिखे।

इन तमाम अंदरूनी तल्खियों के बावजूद राजद, जदयू और कांग्रेस के बीच अभी कोई ऐसी तकरार मुखर नहीं हुई है, जिससे गठबंधन के दरकने या बिखरने की आशंका हो। फिर भी इतना तो दिख ही जाता है कि नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव के बीच की पुरानी कड़वाहटें रह-रह कर जोर मारने लगती हैं।

(ये लेखक के निजी विचार हैं)
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed