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बिहारः जातियों के दर्जे में बदलाव से होगा फायदा ?

Thu, 17 Sep 2015 08:12 PM IST
Updated Thu, 17 Sep 2015 08:12 PM IST
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Nitish kumar changed categaries of many castes

गुजरात के हार्दिक पटेल बीते दिनों काफ़ी चर्चा में थे। उनकी अगुआई में गुजरात के पटेल जाति का बड़ा तबका खुद को अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल किए जाने की मांग कर रहा है जिससे उन्हें भी आरक्षण का लाभ मिले। बिहार में भी ऐसे ही कई छोटे-बड़े जाति और समुदाय आधारित संगठन अपने सामाजिक दर्जे में बदलाव की मांग करते रहते हैं।

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सितंबर महीने के पहले सप्ताह में ऐसी ही एक मांग से जुड़ी लगातार दो दिनों की घटना और फैसले काफी महत्त्वपूर्ण रहे।  पहले निषाद विकास संघ के समर्थकों और पुलिस के बीच चार सितंबर को पटना के गांधी मैदान के पास झड़प हुई। संघ ने उस दिन मल्लाह जाति को अनुसूचित जनजाति (एसटी) में शामिल करने की अपनी पुरानी मांग को लेकर राजभवन तक मार्च आयोजित किया था। अगले दिन पांच सितंबर को नीतीश कैबिनेट की बैठक हुई।
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इसमें मल्लाह की सभी उपजातियों और नोनिया जाति को अत्यंत पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) से एसटी में शामिल किया गया और इस संबंध में केंद्र सरकार को सिफारिश भेजने को फैसला लिया गया। दरअसल बिहार में किसी जाति या जातीय समूहों की सामाजिक श्रेणी बदलने का यह कोई पहला मामला नहीं है। निषादों की तरह ही बहुतेरे जातीय समूह ऐसी मांग करते रहते हैं। लेकिन चुनावी साल में नीतीश सरकार ने मल्लाह जाति की तरह की कई दूसरी जातियों की सामजिक श्रेणी भी बदलने में ज़्यादा दिलचस्पी दिखाई है।
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मानदंडों की अनदेखी

Nitish kumar changed categaries of many castes

मल्लाह जाति को एसटी का दर्जा देने के पहले अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की तेली और दांगी जातियों को ईबीसी में शामिल किया गया था। ईबीसी की तांती जाति को एससी का दर्जा दिया गया था। इतना ही नहीं सामान्य श्रेणी को दो जातियों को भी ओबीसी में शामिल किया गया था। इनमें हिंदुओं की गोस्वामी और मुस्लिमों की मल्लिक जाति शामिल है।साथ ही अब भी कई जातियां अपने पिछड़ेपन को आधार बनाकर अपनी सामाजिक श्रेणी में बदलाव करने की मांग करती हैं।

इनमें बढ़ई और कुम्हार जैसी जातियां शामिल हैं। जानकारों का मानना है कि भारत की आजादी के करीब 70 वर्षों बाद भी कई सामाजिक और जातीय समूह कई क्षेत्रों में पीछे छूटे हुए हैं। ऐसे में जातियों को एक खास वर्ग में शामिल करने या उससे बाहर निकालने की प्रक्रिया चलाना तो ठीक है, लेकिन ऐसा करते हुए तय मानदंडों का ध्यान रखना जाना चाहिए। जोस कालापुरा पटना स्थित जेवियर इंस्टीट्यू ऑफ सोशल रिसर्च के निदेशक हैं। उनका मानना है कि सरकार जातियों की सामाजिक श्रेणी बदलने का फैसला लेते हुए इतिहास, परंपरा और सामाजिक-आर्थिक स्थिति की जमीनी हकीकत का ध्यान नहीं रख रही है।

जैसा कि मल्लाह जाति संबंधी सिफारिश के बारे में उनका मानना है, "मल्लाह शारीरिक बनावट, संस्कृति और धार्मिक, इनमें से किसी भी मावशास्त्रीय आधार पर एसटी वर्ग का हिस्सा नहीं हो सकते हैं।" दरअसल सरकार द्वारा जरूरी प्रक्रिया का ध्यान नहीं रखे जाने के कारण ही ऐसे फैसलों का विरोध भी हो रहा है। इनमें से कुछ को तो अदालत में चुनौती भी दी गई है।

राजनीतिक फायदा

Nitish kumar changed categaries of many castes

माना जा रहा है कि जातियों की श्रेणी बदलने के फैसले का एक सिरा राजनीति से भी जुड़ा है। खासकर तब जब ये फैसले चुनावी साल में लिए गए हों। ऐसे में एक सवाल यह कि इन फैसलों का कितना नफा-नुकसान नीतीश कुमार की अगुवाई वाले महागठबंधन को होगा? एक दैनिक अखबार के पटना संस्करण के संपादकीय सलाहकार सुरेंद्र किशोर के मुताबिक, "जातियों की सामाजिक श्रेणी बदलने की जरूरत हो भी तो ऐसे फैसले सामान्य दिनों में लिए जाने चाहिए।"

वो कहते हैं, "चुनाव के ठीक पहले ऐसे फैसलों को लोग शक की नजर से देखते हैं। साथ ही चुनावी माहौल में ऐसे फैसले लेते वक्त हर पहलू का ध्यान भी नहीं रखा जाता है।" सुरेंद्र का यह भी मानना है कि नीतीश सरकार ने ऐसे जो भी फैसले लिए हैं, उनकी जरूरत पहले से महसूस की जाती रही है। और ऐसे में थोड़ा राजनीति फायदा महागठबंधन को मिल सकता है।

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