नीतीश-मांझी फिर आ सकते हैं साथ-साथ, बनने लगे आसार
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राजनीति संभावनाओं का नाम होती है, ऐसी संभावनाएं जो कभी भी खत्म नहीं होती। ऐसी ही संभावना बनती दिख रही है बिहार की राजनीति में। जहां पहले दोस्त और फिर दुश्मन बने दो नेता एक बार फिर नजदीक आते दिख रहे हैं।
बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी और मौजूदा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बीच नजदीकियां एक बार फिर बढ़ती दिख रही हैं। मांझी नीतीश को करीब लाने की मुहिम में लगे हैं एक और पूर्व मुख्यमंत्री और किंगमेकर कहे जाने वाले लालू यादव।
लालू ने अपने घर हुई इफ्तार पार्टी में दोनों नेताओं को संग-संग क्या बैठाया पुराने रिश्ते एक बार फिर अंगड़ाइयां लेने लगे। कुछ देर झिझकन के बाद दोनों नेताओं में जो एक बार बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ तो फिर घंटों तक चला। उसका असर ये रहा कि मांझी बाहर निकले तो यह कहने से नहीं चूके कि मैं आज जो कुछ भी हूं नीतीश की वजह से हूं।
लालू की पार्टी में मुलाकात के बाद बढ़ी नजदीकियां
असल में बिहार विधानसभा चुनावों से पूर्व तक मांझी और भाजपा दोनों उन्हें एक बड़ी ताकत के रूप में आंक रहे थे लेकिन चुनावों के परिणाम उल्टे पड़े तो भाजपा के लिए मांझी की अहमियत भी घट गई। पार्टी बनाकर मात्र एक सीट जीतने वाले मांझी का सियासी वजूद भी इससे कम हुआ।
नतीजा ये हुआ कि मांझी के सामने सियासी पहचान का संकट भी बन गया। दूसरी ओर भाजपा के खिलाफ मोर्चा तैयार करने में जुटे लालू यादव भी एनडीए में दरार ढूंढने में लगे थे। इसी मुहिम में उन्होंने जीतन राम मांझी को अपने घर हुई इफ्तार पार्टी में दावत पर बुलाया।
इसके बाद बकायदा नीतीश और मांझी के बैठने की व्यवस्था साथ साथ की गई। लालू की मुहिम रंग लाई और थोड़ी देर के तकल्लुफ के बाद नीतीश और मांझी एक दूसरे से नंबुदार हुए तो बातचीत का सिलसिला देर तक चला। दोनों नेताओं ने फिर इसके बाद खुलकर बातचीत की और तमाम मुद्दों पर चर्चा की। मांझी कार्यक्रम के बाहर निकले तो खबरनवीसों ने उन्हें घेर लिया।
सवाल नीतीश कुमार से मुलाकात पर पूछा गया तो मांझी ने कहा राजनीति संभावनाओं का नाम होती है और संभावनाएं कभी खत्म नहीं होती। कहा, मेरे और नीतीश जी के बीच में दूरियां कब थी, कभी नहीं। आज वो जो कुछ भी हैं नीतीश की वजह से हैं। अगर आज वो पूर्व मुख्यमंत्री हैं तो भी नीतीश की वजह से।
इस मुलाकात के बाद बिहार की राजनीति में एक चर्चा तेज हो गई कि जब जहरीली कड़वाहट के बाद भी नीतीश और लालू यादव एक हो सकते हैं तो मांझी और नीतीश क्यों नहीं?