फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Bihar ›   bihar election 2015, what is the opinion of muslims

बिहार में क्या है मुसलमानों की राय, आप भी जानिए?

Fri, 04 Sep 2015 09:28 AM IST
Updated Fri, 04 Sep 2015 09:28 AM IST
विज्ञापन
bihar election 2015, what is the opinion of muslims

जनगणना के धर्म आधारित आंकड़े बताते हैं कि बिहार में मुसलमान आबादी करीब 17 फीसदी है और राज्य के आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर इस तबके पर खास तौर से नजरें टिकी हैं।

विज्ञापन


बिहार में मुसलमान आबादी किसी एक खास इलाके में नहीं, बल्कि लगभग पूरे राज्य में छितरी हुई है। यह जनसांख्यिकीय खासियत उन्हें चुनाव की बिसात पर बहुत अहम बना देती है।
विज्ञापन


राज्य की 243 विधानसभा क्षेत्रों में से करीब 50 विधानसभा सीटों पर मुसलमानों के वोट निर्णायक माने जाते हैं। इन क्षेत्रों में मुसलमानों की आबादी 18 से 74 फीसद तक है।
विज्ञापन
विज्ञापन


बिहार में चुनावी सरगर्मी हर दिन तेज़ हो रही है, हालांकि अब तक ये पूरी तरह साफ नहीं हुआ है कि कौन सियासी दल मुसलमान समुदाय के किन-किन मुद्दों को तवज्जो देंगे।

कितनी है नुमाइंदगी

bihar election 2015, what is the opinion of muslims

लेकिन मुसलमान समुदाय के लिए इस चुनाव में कौन से मुद्दे ज्यादा अहम हैं? सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता अरशद अजमल कहते हैं, "मुसलमानों के बीच नुमाइंदगी, विकास, सुरक्षा और कम्यूनल हालात का मामला अभी चर्चा में है।"

उनके मुताबिक, "सियासी दलों को मुसलमानों का समर्थन इस बात पर निर्भर करेगा कि वे इन मुद्दों पर अपना क्या एजेंडा सामने लाते हैं।" नुमाइंदगी के सवाल पर मुसलमान समुदाय की लगातार मांग रही है कि आबादी के लिहाज से कम से कम विधानसभा में 40 मुसलमान प्रतिनिधि होने चाहिए।

लेकिन औसतन इसके आधे मुसलमान प्रतिनिधि ही विधानसभा तक पहुंच पाते हैं, वर्तमान पंद्रहवीं विधानसभा में 17 मुसलमान विधायक हैं, जिनमें मात्र एक महिला है।

ऐसे में, पटना सिटी के सरफ़राज़ अहमद मांग करते हैं, "मुसलमान, आबादी के मुताबिक विधानसभा में भी नजर आएं, इसके लिए सियासी दलों को मुसलमानों को पर्याप्त संख्या में मौका देना चाहिए।"

क्या है अहमियत

bihar election 2015, what is the opinion of muslims

मोहम्मद सोहराब अली पटना शहर से करीब 15 किलोमीटर दूर अब्दुल्लाह चक गांव में रहते हैं। उनके मुताबिक, इस बार सियासी दलों को मुसलमानों के पिछड़ेपन को चुनावी मुद्दा बनाना चाहिए।

वो कहते हैं, "पिछड़ेपन को दूर किए गए बगैर किसी मुद्दे को सुलझाना मुमकिन नहीं है। इसे दूर करने के लिए शिक्षा पर ख़ास ज़ोर दिए जाने की ज़रूरत है।"

मुसलमानों की आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक स्थिति के आंकड़े भी मोहम्मद सोहराब जैसे लोगों की मांग को सही ठहराते हैं।

2001 के जनगणना के मुताबिक, इस समुदाय में साक्षरता दर केवल 42 फीसदी है। बिहार अल्पसंख्यक आयोग ने 2004 में मुसलमानों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति जानने के लिए एक सर्वेक्षण कराया था।

इसके अनुसार, करीब आधे मुसलमान गरीबी रेखा से नीचे हैं, साथ ही सर्वेक्षण यह भी बताता है कि गांवों में रहने वाले करीब 28 फीसदी मुसलमान आबादी भूमिहीन मजदूर है।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed