Discontinued cars in India: भारत में क्यों नहीं चलीं ये 7 फ्यूचरिस्टिक कारें? जानिए फ्लॉप होने का पूरा सच?
Indian Cars Ahead Of Time: भारतीय ऑटोमोटिव बाजार में कई ऐसी कारें लॉन्च हुईं, जो डिजाइन, टेक्नोलॉजी और कॉन्सेप्ट के मामले में काफी आगे रही। इसके बावजूद कुछ कारणों से ये बड़े पैमाने पर सफल नहीं हो सकीं। जानिए उन कारों के बारे में विस्तार से और उनके कामयाब न होने के कारण?
विस्तार
भारतीय सड़कों पर हर साल सैकड़ों कारें उतरती है। इनमें से कुछ ऐसी भी होती हैं, जो अपने इनोवेशन, स्टाइल से लोगों को चौंका देती हैं, लेकिन वो ज्यादा सफल नहीं हो पाती। इस लेख में हम उन सात कार कंपनियों के बारे में बात करेंगे जो कीमत, गलत समय पर लॉन्च और ग्राहकों की बदलती पसंद की वजह से अब भारतीय बाजार से बाहर हो चुकी हैं।
1. टाटा नैनो: वैश्विक स्तर पर खूब सुर्खियां भी बटोरी
रतन टाटा का सपना था कि अधिक से अधिक भारतीय परिवार में टाटा नैनो कार हो। इसकी कीमत महज 1 लाख रुपये थी और इसने वैश्विक स्तर पर खूब सुर्खियां भी बटोरी, लेकिन इसका मार्केटिंग टैग ही इसके लिए अभिशाप बन गया। लोग इसे स्टेटस सिंबल नहीं मान पाए। इसके बाद सिंगूर विवाद और आग लगने की कुछ घटनाओं ने इसकी रही-सही कसर पूरी कर दी। इन कारणों से नैनो की ब्रांड इमेज कमजोर हो गई और यह मास मार्केट में हिट नहीं हो सकी।
2. मारुति सुजुकी बलेनो अल्टूरा: स्टेशन वैगन का फ्लॉप प्रयोग
ये बलेनो अल्टूरा, बलेनो सेडान पर आधारित एक स्टेशन वैगन थी। इसमें ढेर सारा बूट स्पेस था, लेकिन भारतीय ग्राहक कार को लंबा देखने के बजाय ऊंचा (SUV स्टाइल) देखना पसंद करते थे और सेडान के मुकाबले इसकी अलग बॉडी स्टाइल ग्राहकों को आकर्षित नहीं कर पाई। इसका नतीजा ये रहा कि बिना ज्यादा चर्चा के ये मॉडल बाजार से हट गया।
3. शेवरले SR-V: स्पोर्टी लुक पर भारी पड़ी कीमत
ये उस दौर में आई जब भारत में छोटी हैचबैक का दौर था। तब शेवरले ने एक प्रीमियम और मस्कुलर हैचबैक एसआर-वी पेश की। इसके शार्प लुक्स वाले हैचबैक आज भी आधुनिक लगते हैं और याद भी की जाती है, लेकिन इसकी कीमत ज्यादा थी। फ्यूल एफिशिएंसी औसम से कम थी और ब्रांड पर भरोसा भी सीमित था। इसलिए आकर्षक डिजाइन के बावजूद एसआर-वी ज्यादा ग्राहकों तक नहीं पहुंच पाई।
4. सैन स्टॉर्म: भारत की इकलौती देसी कन्वर्टिबल
गोवा की कंपनी सैन मोटर्स ने भारत की पहली सस्ती दो दरवाजों वाली खुली कार (कन्वर्टिबल) लॉन्च कर सबको ड्राइविंग का रोमांच देने का वादा किया था। ये दिखने में बेहद कूल थी, लेकिन कमजोर बिल्ड क्वालिटी, सीमित सेफ्टी फीचर्स और कम ब्रांड वैल्यू ने इसकी संभावनाओं पर पानी फेर दिया। नतीजतन, ये कार कुछ ही समय में बाजार से गायब हो गई।
5. फॉक्सवैगन बीटल: रईसों का खिलौना बनकर रह गई
दुनिया भर में एक आइकॉन के रूप में पहचान बनाने वाली बीटल को भारत में लाइफस्टाइल कार के तौर पर उतारा गया था। जब ये आई तो इसकी कीमत इतनी ज्यादा थी कि ये सिर्फ रईसों के गैराज की शोभा बनकर रह गई। इसका यूनिक और क्यूट डिजाइन लोगों को पसंद तो आया, लेकिन ऊंची कीमत, दो-दरवाजों का लेआउट और भारतीय सड़कों के लिहाज से सीमित प्रैक्टिकैलिटी इसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गई है। परिणामस्वरुप ये सिर्फ कुछ मेट्रो शहरों तक सीमित रह गई।
6. टोयोटा सेरा: बटरफ्लाई डोर्स वाली 'वंडर कार'
टोयोटा सेरा अपने खास 'बटरफ्लाई डोर्स' (ऊपर की तरफ खुलने वाले दरवाजे) के लिए जानी जाती थी। ये कार तकनीकी और डिजाइन दोनों ही लिहाज से फ्यूचरिस्टिक थी। इसमें चारों तरफ कांच का इस्तेमाल किया गया था जो इसे किसी अंतरिक्ष यान जैसा लुक देता था। हालांकि, सीमित संख्या में इंपोर्ट, ज्यादा लागत और सर्विस सपोर्ट की कमी ने इसे आम ग्राहकों की पहुंच से दूर रखा। अंततः ये सिर्फ कलेक्टर्स की पसंद बनकर रह गई।
7. निसान 370Z: स्पोर्ट्स कार का सपना जो अधूरा रहा
निसान 370जेड एक शुद्ध स्पोर्ट्स कार थी। इसमें ताकतवर V6 इंजन और जबरदस्त परफॉर्मेंस मिलती थी, लेकिन भारत में इसकी ऊंची कीमत, सीमित स्पोर्ट्स कार कल्चर और ब्रांड की कमजोर मौजूदगी इसके आड़े आ गई। ग्लोबल मार्केट में लोकप्रिय होने के बावजूद, भारतीय बाजार में यह कार ज्यादा खरीदार नहीं जुटा पाई। साथ ही ऊंची कीमत और स्पोर्ट्स कार मार्केट का छोटा होना इसकी नाकामी की बड़ी वजह बना।