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E-Vechiles: बहुत हुई इलेक्ट्रिक वाहनों की तारीफ, अब जान लीजिए इनकी हकीकत, रिपोर्ट में हुआ खुलासा!

Wed, 29 Jan 2025 01:30 PM IST
नीतीश कुमार ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: नीतीश कुमार Updated Wed, 29 Jan 2025 01:30 PM IST
सार

एक EV बनाने में 5-10 टन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन होता है, जो एक सामान्य पेट्रोल-डीजल कार की तुलना में दोगुना है। EV में इस्तेमाल होने वाली लीथियम-आयन बैटरी के लिए रेयर अर्थ मेटल्स की माइनिंग की जाती है, जिससे भारी मात्रा में प्रदूषण फैलता है।

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Electric Vehicle Manufacturing Creates Double Carbon Emission Than A Normal Petrol Or Diesel Vehicle
Electric Car - फोटो : Freepik

विस्तार

कुछ साल पहले तक इलेक्ट्रिक वाहन (EVs) की चर्चा सिर्फ भविष्य की तकनीक के तौर पर होती थी, लेकिन अब यह हमारी जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। दुनियाभर की सरकारों की पहल और बढ़ती जागरूकता ने EV को तेजी से लोकप्रिय बनाया है। भारत सरकार ने भी हाल ही में PM E Drive योजना के तहत 10,900 करोड़ रुपये की मंजूरी दी है ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग EV खरीद सकें। इसके साथ ही EV खरीदने पर सब्सिडी, GST और टैक्स में छूट जैसे लाभ भी दिए जा रहे हैं।
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लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या वाकई में इलेक्ट्रिक वाहन उतने प्रदूषण मुक्त हैं जितना उन्हें बताया जाता है? EVs को पर्यावरण के अनुकूल माना जाता है क्योंकि ये गाड़ियां न तो धुआं छोड़ती हैं और न ही शोर करती हैं। लेकिन क्या वाकई ये गाड़ियां इतनी “ग्रीन” हैं जितना दावा किया जाता है? आइए जानते हैं।
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Electric Vehicle Manufacturing Creates Double Carbon Emission Than A Normal Petrol Or Diesel Vehicle
EV से दोगुना कार्बन एमिशन - फोटो : Freepik
ग्रीन EV की गहरी हकीकत!
सच तो यह है कि EVs का निर्माण और इनकी बैटरी पर्यावरण पर गहरा असर डालती हैं। IMF की एक रिपोर्ट के मुताबिक, EV के निर्माण के दौरान सामान्य गाड़ियों की तुलना में दोगुना कार्बन एमिशन होता है। एक EV बनाने में 5-10 टन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन होता है। इसके अलावा, EV में इस्तेमाल होने वाली लीथियम-आयन बैटरी के लिए रेयर अर्थ मेटल्स जैसे लीथियम, कोबाल्ट और निकल की माइनिंग की जाती है, जिससे भारी मात्रा में प्रदूषण फैलता है। रिपोर्ट के मुताबिक, इन्हें जमीन से निकालने में 4,275 किलो एसिड वेस्ट और 57 किलो रेडियोएक्टिव रेसिड्यू पैदा होता है।

Electric Vehicle Manufacturing Creates Double Carbon Emission Than A Normal Petrol Or Diesel Vehicle
लीथियम माइनिंग है खतरनाक (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : एएनआई
लीथियम माइनिंग का दुष्प्रभाव
लीथियम माइनिंग पर्यावरण के लिए सबसे बड़ा खतरा है। रिपोर्ट के अनुसार, एक टन लीथियम निकालने में 2 मिलियन टन पानी की जरूरत होती है। एक ईवी बनाने में 13,500 लीटर पानी लगता है, जबकि पेट्रोल कार में यह करीब 4 हजार लीटर है। इसकी वजह से चिली, अर्जेंटीना और बोलीविया जैसे देशों में पानी की भारी किल्लत हो गई है। अकेले चिली नें 65 प्रतिशत पानी का इस्तेमाल लिथियम निकालने के लिए किया जा रहा था। फिलीपींस और क्यूबा में माइनिंग से बड़ी मात्रा में जमीन बंजर हो चुकी है। पर्यावरणीय दुष्प्रभाव के कारण फिलीपींस में कई लीथियम खदानों को बंद करना पड़ा।
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ईवी को चार्ज करने से भी बढ़ता है प्रदूषण - फोटो : Freepik
बैटरी चार्जिंग भी समस्या
EVs को चार्ज करने के लिए बिजली की जरूरत होती है, लेकिन भारत में 70% बिजली कोयले से बनती है। अगर EVs को कोयले से बनी बिजली से चार्ज किया जाए, तो ये डेढ़ लाख किलोमीटर चलने पर, यह पेट्रोल कार के मुकाबले केवल 20% ही कम कार्बन उत्सर्जन करेंगी। अगर बिजली आपूर्ती की मौजूदा व्यवस्था को देखा जाए तो चार्जिंग की जरूरत बढ़ने से कोयले से बनने वाली बिजली पर ही निर्भरता बढ़ेगी और आखिरकार इससे प्रदूषण बढ़ेगा।

खराब बैटरियां भी खतरनाक
जब EV की बैटरी खराब हो जाती है, तो उसे रीसाइकिल करना काफी महंगा और मुश्किल होता है। अधिकतर बैटरियों को लैंडफिल में डाल दिया जाता है, जहां इनसे निकलने वाले रसायन जमीन और पानी को जहरीला बनाते हैं। मौजूदा समय में केवल 5 प्रतिशत ईवी बैटरी ही रीसाइकिल हो पाती है।

Electric Vehicle Manufacturing Creates Double Carbon Emission Than A Normal Petrol Or Diesel Vehicle
ईवी के टायर जल्दी घिसते हैं - फोटो : Freepik
ब्रेक और टायर का प्रदूषण
EVs का वजन सामान्य गाड़ियों की तुलना में अधिक होता है। इस वजह से इनके टायर और ब्रेक जल्दी घिसते हैं और हवा में हानिकारक केमिकल फैलाते हैं। रिसर्च के अनुसार, EVs के ब्रेक और टायर से होने वाला प्रदूषण सामान्य गाड़ियों के मुकाबले 1850 गुना ज्यादा होता है। ज्यादातर टायर क्रूड ऑयल से निकले सिंथेटिक रबर से तैयार किए जाते हैं। ये प्रदूषण की वजह बनते हैं।

समाधान क्या है?
यह कहना गलत होगा कि EVs का कॉन्सेप्ट पूरी तरह से गलत है। यह तकनीक अभी शुरुआती दौर में है, और इसे बेहतर बनाया जा सकता है। EVs को वाकई ईको-फ्रेंडली बनाने के लिए हमें माइनिंग के तरीकों को डीकार्बोनाइज करना होगा, बैटरी रीसाइक्लिंग के बेहतर विकल्प खोजने होंगे और चार्जिंग के लिए सोलर या विंड एनर्जी का इस्तेमाल करना होगा।

EVs पर्यावरण के लिए पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं, लेकिन यह सही दिशा में एक कदम जरूर हैं। सही तकनीक और नीति के साथ, इन्हें वास्तव में ग्रीन और सस्टेनेबल बनाया जा सकता है।
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