कल तक बेचते थे नमक, आज बन गए हैं सबसे बड़ी हेलमेट निर्माता कंपनी
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निराश होकर काम छोड़ देना सोल्यूशन नहीं होता बल्कि उस काम से मिल रही चुनौतियों से लड़कर आगे बढ़ने की कोशिश करना ही सफलता की डगर बनाता है। सफलता उनको नसीब होती है जो चुनौतियों को झेलने की शक्ति रखते हैं और अपने जज्बे को कम नहीं होने देते। बहुत सारे ऐसे उदाहरण दुनिया में देखने को मिलेंगे जो आज हर किसी के लिए प्रेरणा बन चुके हैं। ऐसी ही एक सफलता की मिसाल है स्टीलबर्ड कंपनी। अमर उजाला ने हाल ही में कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर राजीव कपूर से बातचीत की आइए उस इंटरव्यू के कुछ अंश आपसे यहां साझा कर रहे हैं।
कहां से की शुरुआत
स्टीलबर्ड की स्थापना 13 मार्च 1964 में मेरे पिता ने की थी। इसके पहले मेरे पिता जी कपूर थैली हाऊस के नाम से नमक की थैलियां बनाते थे और 25 पैसे एक थैली पर कमाते थे। लेकिन हम बिजनेस बंद होने के डर से रेट नहीं बढ़ा पा रहे थे। उसी दौरान एक सज्जन हमारे घर आए और उन्होंने मेरे पिता जी को फिल्टर बनाने का बिजनेस सजेस्ट किया। पिता जी को आइडिया अच्छा लगा और उन्होंने उन सज्जन के मदद से लगभग 6 हजार रुपये का जुगाड़ करके फिल्टर बनाने की मशीन दिल्ली के आजादनगर के बेरीवाले बाग में एक छोटी सी फैक्ट्री में लगाई। लेकिन जब फिल्टर बनकर तैयार हुए तो वह सज्जन अचानक कहीं चले गए। मेरे पिता जी के लिए यह सदमे जैसा था क्योंकि एक व्यक्ति ने आकर उनकी सारी पूंजी कहीं लगवा दी और उससे आऊटपुट कैसे मिलता यह बताए बगैर वो चला गया। स्टीलबर्ड नाम भी उसी व्यक्ति ने हमें दिया था।
खुद के दम पर आगे बढ़ने की कोशिश
मेरे पिता जी ने हिम्मत नहीं हारी और वो छोटी-छोटी ऑटोमोबाइल के कलपुर्जे बेचने वाली दुकानों पर अपना फिल्टर बेचने के लिए जाने लगे। लेकिन हमारे फिल्टर को किसी ने कोई भाव नहीं दिया। मेरे पिता जी को इस बात से गहरा धक्का लगा और वो एक दुकान पर जाकर रोने लगे। पिता जी समस्या को उस दुकानदार ने समझा और उन्हें प्यार से अपनी दुकान पर बिठाया और समझाया कि इसका कारोबार होता कैसे है। एयर फिल्टर क्या होता है, ऑयल फिल्टर क्या होता है सबके बारे में उन्हें बारीकी से बताया। उस दुकानदार की सलाह मेरे पिता जो काफी रास आई और इसके बाद हमारे फिल्टर्स को बाजार से काफी अच्छा रिस्पांस मिला और सिर्फ तीन महीने के अंदर मेरे पिता जी ने वहां से सलाह लेकर कई तरह के फिल्टर बनाए और बाजार से उन फिल्टर्स को काफी अच्छा रिस्पांस मिला। इसके बाद 600 तरह के फिल्टर मेरे पिता ने तैयार किए।
1976 में स्टीलबर्ड हेलमेट बनाने वाली भारत की पहली कंपनी बनी
1889 में मैंने ज्वाइन किया कारोबार
मैं जब सातवीं क्लास में था तबसे ही फैक्ट्री जाना शुरू कर दिया था। मुझे काम करने का बहुत बहुत शौक था, मैं अपना समय पढ़ाई में नहीं लगाना चाहता था। मैंने 1989 में अपने पिता के बिजनेस को ज्वाइन कर लिया। हमने मायापुरी फैक्ट्री से हमने हेलमेट बनाना शुरू किया। इसी बीच हमें एक जगह से काफी हेलमेटों का ऑर्डर मिला और हमारी हेलमेट बनाने की क्षमता 1000 प्रति दिन की हो गई। उस समय मैं इसके साथ अपनी 21 और फैक्ट्रियों का काम संभालता था।
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फिर से जमाया कारोबार
मैं इस घटना के बाद टूट चुका था और अपना कारोबार बंद करने की ठान ली। लेकिन मेरे पिता ने ऐसा नहीं करने दिया। मेरे पिता ने मुझे समझाया कि काम तो करना ही है, क्योंकि दादा जी बोलते थे खाली मत बैठो अगर बैठे हो तो अपने ही कपड़े फाड़ो और सिलो। पिता जी की सलाह पर मैं एक बार फिर बैंक गया और डेढ़ करोड़ का लोन मांगा, बैंक ने हमें आराम से लोन दे दिया। हमने अपना कारोबार आगे बढ़ाया और उसी दौरान हिमाचल में बद्दी का प्लांट लिया और 2005 तक हम एक बार फिर नंबर 1 हो गए। 3 हलार हेलमेट हम दिल्ली में बनाते थे तीन हजार बद्दी में इस तरह से प्रतिदिन के हिसाब से छह हजार हेलमेट रोज बनाते थे।
नावा हुई दीवालिया और हम पर आया मुसीबत का पहाड़
इंजीनियरिंग प्रोडक्ट बनाने का काम शुरू किया
लेकिन एसईजेड में हमने जो इंजीनियरिंग प्रोडक्ट बनाने का काम शुरू किया वह काफी अच्छा चला और महज दो सालों में हमने लगभग 40 करोड़ का लाभ कमाया। हमारे बक्कल पूरी दुनिया में सप्लाई हो रहे थे। अगर हम बक्कल न देते तो दुनिया भर की हेलमेट इंडस्ट्री प्रभावित हो जाती। हमें बक्कल किंग का तमगा मिल गया। हमने अपना काम जारी रखा और हमारे इंजीनियरिंग उत्पादों ने हमें काफी सपोर्ट किया।
2011 में हम फिर हेलमेट के कारोबार में लौटै
लोग हेलमेट पहनने से क्यूं बचते हैं
सरकार अगर इसे कानून बना दे तो हर सर पर हेलमेट हो जाएंगे। लेकिन अगर सरकार अब कोई ऐसा कानून बनाती है तो भी इसमें पांच साल लग जाएंगे। मुझे नहीं पता सरकार क्यूं इसे मेंडेटरी नहीं कर रही है। हमने कई सारे प्रजेंटेशन दिए हैं लेकिन अभी तक इस पर कोई कानून नहीं बना है। दुपहिया एक्सीडेंट में सबसे ज्यादा जानें इसलिए जाती हैं क्योंकि राइडर के सर पर हेलमेट नहीं होता। मुझे लगता है कि सरकारों को इसके प्रति गंभीरता से सोचना चाहिए और सड़क सुरक्षा हित में इसे एक कड़े कानून के तहत लागू करना चाहिए। राज्य सरकारों को इसके लिए आगे आना चाहिए।
हम लोगों को जागरूक करने की कोशिश कर रहे हैं
स्टाइलिश हेलमेट को हम सस्ते में बेच रहे हैं
हमने हाल ही में इटली के बार्जे डिजाइन से समझौता किया है। इसके तहत महंगे हेलमेटों को बढ़िया ग्राफिक्स व डिजाइन के साथ लोगों को सस्ती कीमत पर देंगे। हम वॉल्यूम पर खेल रहे हैं जिससे इसकी कीमत और नीचे आए और हमें इसमें सफलता भी मिली है।
युवा स्टार्टअप को क्या सजेशन देंगे
मैं युवाओं को कहना चाहूंगा कि सबसे पहले वो धैर्य से दोस्ती कर लें और कभी हिम्मत न हारें। युवाओं को अपनी प्लानिंग को कागज पर पेनडाउन करना चाहिए इसके बाद आगे बढ़ना चाहिए। और यह मानकर चलना चाहिए कि अगर उनकी प्लानिंग सही है तो फिर उसमें विफलता का स्कोप नहीं रह जाता। बॉक्सिंग से इसे जोड़ें तो कहा जाता है कि जीतता वही है जो आखिरी घूसा मारता है। मैं सिर्फ यही कहूंगा एक लक्ष्य बनाओ आगे बढते रहो, हो सकता है मंजिल थोड़ी देर बाद आए पर आएगी जरूर, अगर आप नहीं लड़खड़ाओगे तो मंजिल आपके स्वागत में कभी पीछे नहीं हटेगी।