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Chaturmas 2026: चातुर्मास के चार महीने क्यों माने जाते हैं सबसे पवित्र? जानिए शास्त्रों में बताए नियम
Mon, 20 Jul 2026 08:11 PM IST
विनोद शुक्ला
ज्योतिष डेस्क, अमर उजाला
ज्योतिष डेस्क, अमर उजाला
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Mon, 20 Jul 2026 08:11 PM IST
सार
Chaturmas 2026: हिंदू धर्म में चातुर्मास का विशेष महत्व होता है। चातुर्मास में शुभ और मांगलिक कार्य करना वर्जित होता है।
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Chaturmas 2026
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
Chaturmas 2026: आषाढ़ शुक्ल एकादशी को देवशयनी एकादशी कहा जाता है। पद्म पुराण, स्कंद पुराण और भविष्य पुराण के अनुसार इसी दिन भगवान श्रीहरि विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं। इसी के साथ चातुर्मास का आरंभ होता है, जो कार्तिक शुक्ल एकादशी अर्थात देवोत्थान एकादशी तक चलता है। यह चार महीने देवपूजन, जप, तप, व्रत और दान के लिए अत्यंत पुण्यदायी माने गए हैं।
चातुर्मास का धार्मिक महत्व
शास्त्रों के अनुसार चातुर्मास देवताओं की विशिष्ट उपासना का काल है। इस अवधि में भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं, इसलिए भक्त अधिक श्रद्धा के साथ उनकी आराधना करते हैं। स्कंद पुराण में कहा गया है कि चातुर्मास में किया गया जप, तप, दान और व्रत सामान्य दिनों की अपेक्षा अनेक गुना अधिक पुण्य प्रदान करता है।
इन कार्यों का करना चाहिए त्याग
धर्मग्रंथों में चातुर्मास के दौरान मांस, मदिरा और अन्य तामसिक पदार्थों का त्याग करने का विधान बताया गया है। असत्य बोलना, क्रोध करना, हिंसा करना, परनिंदा, छल-कपट और अपवित्र आचरण से भी दूर रहने की सलाह दी गई है। अनेक श्रद्धालु इस अवधि में अपनी श्रद्धा के अनुसार कुछ विशेष खाद्य पदार्थों का भी त्याग करते हैं और पूरे चातुर्मास सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं।
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इन धार्मिक कार्यों का करें पालन
चातुर्मास में प्रतिदिन प्रातः स्नान कर भगवान विष्णु का पूजन, तुलसी पूजन, दीपदान, विष्णु सहस्रनाम का पाठ, श्रीमद्भागवत एवं भगवद्गीता का श्रवण-पाठ अत्यंत शुभ माना गया है। एकादशी व्रत, हरिनाम संकीर्तन, मंदिर दर्शन और ब्राह्मण तथा संतों की सेवा का भी विशेष महत्व बताया गया है। इस अवधि में भगवान विष्णु को पीले पुष्प, तुलसी दल और पंचामृत अर्पित करना पुण्यदायक माना जाता है।
क्यों नहीं किए जाते मांगलिक कार्य?
धार्मिक मान्यता है कि देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं। चूंकि वे ही समस्त शुभ कार्यों के अधिष्ठाता माने गए हैं, इसलिए उनके शयनकाल में विवाह, गृहप्रवेश, यज्ञोपवीत, मुंडन और अन्य मांगलिक संस्कार सामान्यतः नहीं किए जाते। इन शुभ कार्यों का पुनः आरंभ देवोत्थान एकादशी पर भगवान विष्णु के जागरण के बाद होता है।
दान और व्रत का विशेष फल
पद्म पुराण में वर्णित है कि चातुर्मास के दौरान अन्नदान, जलदान, गौसेवा, वस्त्रदान, दीपदान और श्रीहरि के निमित्त किए गए व्रत अक्षय पुण्य प्रदान करते हैं। विशेष रूप से देवशयनी एकादशी से आरंभ कर पूरे चातुर्मास भगवान विष्णु की आराधना करने वाले भक्तों पर श्रीहरि की कृपा बनी रहती है तथा अंत में देवोत्थान एकादशी पर व्रत का समापन अत्यंत शुभ माना जाता है। यह संपूर्ण अवधि धर्म, भक्ति और भगवान विष्णु की अनन्य उपासना का पावन पर्व मानी गई है।Sawan 2026: सावन में रख रहे हैं व्रत ? पहले जान लें ये 5 जरूरी नियम
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।
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चातुर्मास का धार्मिक महत्व
शास्त्रों के अनुसार चातुर्मास देवताओं की विशिष्ट उपासना का काल है। इस अवधि में भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं, इसलिए भक्त अधिक श्रद्धा के साथ उनकी आराधना करते हैं। स्कंद पुराण में कहा गया है कि चातुर्मास में किया गया जप, तप, दान और व्रत सामान्य दिनों की अपेक्षा अनेक गुना अधिक पुण्य प्रदान करता है।
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इन कार्यों का करना चाहिए त्याग
धर्मग्रंथों में चातुर्मास के दौरान मांस, मदिरा और अन्य तामसिक पदार्थों का त्याग करने का विधान बताया गया है। असत्य बोलना, क्रोध करना, हिंसा करना, परनिंदा, छल-कपट और अपवित्र आचरण से भी दूर रहने की सलाह दी गई है। अनेक श्रद्धालु इस अवधि में अपनी श्रद्धा के अनुसार कुछ विशेष खाद्य पदार्थों का भी त्याग करते हैं और पूरे चातुर्मास सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं।
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इन धार्मिक कार्यों का करें पालन
चातुर्मास में प्रतिदिन प्रातः स्नान कर भगवान विष्णु का पूजन, तुलसी पूजन, दीपदान, विष्णु सहस्रनाम का पाठ, श्रीमद्भागवत एवं भगवद्गीता का श्रवण-पाठ अत्यंत शुभ माना गया है। एकादशी व्रत, हरिनाम संकीर्तन, मंदिर दर्शन और ब्राह्मण तथा संतों की सेवा का भी विशेष महत्व बताया गया है। इस अवधि में भगवान विष्णु को पीले पुष्प, तुलसी दल और पंचामृत अर्पित करना पुण्यदायक माना जाता है।
क्यों नहीं किए जाते मांगलिक कार्य?
धार्मिक मान्यता है कि देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं। चूंकि वे ही समस्त शुभ कार्यों के अधिष्ठाता माने गए हैं, इसलिए उनके शयनकाल में विवाह, गृहप्रवेश, यज्ञोपवीत, मुंडन और अन्य मांगलिक संस्कार सामान्यतः नहीं किए जाते। इन शुभ कार्यों का पुनः आरंभ देवोत्थान एकादशी पर भगवान विष्णु के जागरण के बाद होता है।
दान और व्रत का विशेष फल
पद्म पुराण में वर्णित है कि चातुर्मास के दौरान अन्नदान, जलदान, गौसेवा, वस्त्रदान, दीपदान और श्रीहरि के निमित्त किए गए व्रत अक्षय पुण्य प्रदान करते हैं। विशेष रूप से देवशयनी एकादशी से आरंभ कर पूरे चातुर्मास भगवान विष्णु की आराधना करने वाले भक्तों पर श्रीहरि की कृपा बनी रहती है तथा अंत में देवोत्थान एकादशी पर व्रत का समापन अत्यंत शुभ माना जाता है। यह संपूर्ण अवधि धर्म, भक्ति और भगवान विष्णु की अनन्य उपासना का पावन पर्व मानी गई है।