Astrology: ज्योतिष के नजरिए से जानिए क्यों होते हैं मानसिक विकार, किन ग्रहों की होती है भूमिका ?
चन्द्रमा जल का कारक होने के कारण मनुष्य की भावुकता को काबू करता है, क्योंकि शरीर में सबसे अधिक जल है। चंद्र नक्षत्र देखकर ही हम कोई शुभ काम करते हैं इसलिए इसकी भूमिका रहती है।
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वैदिक ज्योतिष में मानसिक विकार और कारक ग्रहों का विस्तृत वर्णन प्राप्त होता है। ज्योतिष एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा आधुनिक विज्ञान भी मानसिक रोगी की मनोदशा भी समझ सकता है। आज इस देश में मानसिक रोग एक बड़ी समस्या बन चुका है, ऐसे में हम ज्योतिष के योगदान को नकारते है तो यह बड़ी भूल होगी।
- वैदिक ज्योतिष के विद्वानों ने एक मत से यह माना है कि चन्द्रमा जल का कारक होने के कारण मनुष्य की भावुकता को काबू करता है, क्योंकि शरीर में सबसे अधिक जल है। चंद्र नक्षत्र देखकर ही हम कोई शुभ काम करते हैं इसलिए इसकी भूमिका रहती है। इसके अलावा बुध को बुद्धि का कारक माना गया है। बुध एक युवा ग्रह है और वाणी का कारक होने के कारण चंद्र के बाद बुध की भूमिका सबसे अधिक मानी गई है।
- इसके अलावा चौथा भाव हृदय को और पंचम भाव मस्तिष्क को दर्शाता है ऐसे में इन दोनों भावों का पीड़ित होना भी मानसिक कष्ट देता है। जब व्यक्ति अपनी भावनाओं को किसी से कह नहीं पाता या प्रकट नहीं कर पाता तो एक उथल पुथल सी मच जाती है। चंद्र और शनि की युति के कारण मनुष्य अंदर ही अंदर पीड़ित होता रहता है और अंत में रोगी हो जाता है। यह एक चीज और ध्यान देने लायक है और वो है राहु चंद्र की युति !
- सिर्फ पीड़ित होना ही रोगी नहीं बनाता है ! कई बार जीवन में हवा हवाई सपने देखना और उन सपनों को पूरा नहीं होते देखना भी रोग का कारण बनाता है। राहु छल का कारक है और आलसी है ! ऐसे में चंद्र के साथ आकर जातक को सपने दिखाने लगता है ! ऐसा व्यक्ति बस सपने ही देखता है और लोगों को झूठी बातें कहता है। ऐसे में जब राहु दशा अन्तर्दशा में अपना फल दिखाता है तो जातक मानसिक रोगी हो जाता है।
- अगर इसी के दूसरे पहलु पर विचार करें तो कुछ ऐसे लोग होते हैं जो कुछ भी कहते रहते हैं। उनकी वाणी और उनका कर्म कभी एक दिशा में नहीं जाता है ! वो कहते कुछ और है करते कुछ और हैं। ऐसे लोगों का बुध केतु और चौथा भाव पीड़ित होता है। विद्वानों के मत के अनुसार बुध पीड़ित होने पर गंभीर मानसिक विकार जातक को हो सकते हैं। ऐसा व्यक्ति नशा भी बहुत करेगा। मानसिक विकार के लिए कुछ विद्वान शनि को भी उत्तरदायी मानते हैं। अगर शनि मंगल चंद्र छठे, आठवे और बारहवें भाव में हो तो व्यक्ति का मन कच्चा होता है। वो अपनी बात कहने से डरता है और धीरे 2 उसे डरने की बीमारी होती है।
- आज आधुनिक विज्ञान को मानने वाले कई चिकित्सक ज्योतिष के विद्वानों की मदद लेकर मनुष्य के मानसिक विकारों को ठीक कर रहे है। अगर आपने किसी रोग को समझ कर समय पर उपचार कर दिया तो ही आपका ज्ञान उत्तम है ऐसा विद्वानों का मत है।
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