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कानपुर: मंदाकिनी दीदी बोलीं- सजगता से साधना करने पर भक्ति का होता उदय

श्रीरामलीला सोसाइटी परेड के बैनर तले आयोजित रामकथा के अंतिम दिन मंदाकिनी दीदी ने रामचरित मानस के दृष्टांत से साधना और निर्भर प्रेम की व्याख्या की। उन्होंने कहा कि सजगता से साधना करने से ही भक्ति का उदय होता है। हम प्रभु से प्रेम कैसे करें यह साधना है और प्रभु मुझसे कैसे कितना अधिक प्रेम करते हैं, यह विश्वास ही निर्भर प्रेम का मूल है। सुंदरकांड में हनुमान जी जैसे महानतम भक्त प्रभु से निर्भरता चाहते हैं। मां सीता उन्हें निर्भरा भक्ति देती हैं जिसे पाकर हनुमान प्रसन्न हो गए। रामकथा का आयोजन मर्चेंट चैंबर हॉल में किया गया। मंदाकिनी दीदी ने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास ने देखा कि जब हनुमान को मां से प्रसाद मिला है तो प्रसाद बंटना भी चाहिए। इसी कारण गोस्वामी तुलसीदास प्रभु से भक्ति का वरदान मांगते ही हैं पर बीच में प्रभु के समक्ष हाथ फैलाकर सुंदरकांड के प्रारंभ में स्तुति करते हैं। हनुमान की लंका यात्रा जो मां सीता के दर्शन के रूप में फलीभूत होती है वह केवल एक व्यक्ति मात्र की यात्रा नहीं है। यह उन समस्त साधकों के लिए पथ प्रशस्त करने वाली यात्रा है जो जीवन में कृतकृत्य होना चाहते हैं। इसका अभिप्राय यही है कि कर्म की महिमा का चाहे जितना गायन किया जाए पर उसकी अंतिम परिणति कृतकृत्यता में है। जब हृदय में यह अनुभूति उत्पन्न हो जाए कि मैंने सब कुछ पा लिया, कुछ भी पाना शेष नहीं है। इस स्थिति को कृतकृत्यता कहते हैं। और यही स्थिति हनुमान के जीवन में दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि प्रेम और निर्भर प्रेम में जो अंतर है, वही भक्ति और निर्भरा भक्ति में है। निर्भरा भक्ति कृपा-मूलक भक्ति है। प्रभु श्रीराम शबरी के समक्ष नवधा भक्ति का उपदेश देते हैं। रामकथा में कमेटी के वरिष्ठ उपाध्यक्ष राजीव गर्ग, कमल किशोर अग्रवाल, राकेश गर्ग, अमरनाथ मेहरोत्रा, पवन अग्रवाल, वीरेंद्र अग्रवाल, आलोक अग्रवाल आदि मौजूद रहे।

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