नवरात्र के दिनों में बुंदेलखंड में घर-घर देवी आराधना, व्रत और पूजन की परंपराएं जीवंत हो उठती हैं। इस अवसर पर चितेरी कला लोकजीवन और आस्था के रंगों को समझने का विशिष्ट माध्यम बनती है। झांसी के राजकीय संग्रहालय में चितेरी कला से जुड़ी कलाकृतियां इस परंपरा की विविधता की झलक प्रस्तुत करती हैं। कभी घरों की दीवारों पर उकेरे जाने वाले चित्र अब साड़ियों, गमछों और कुर्तों जैसे वस्त्रों पर भी अपनी छाप छोड़ रहे हैं। इनमें लोकविश्वास, प्रकृति, पर्व-त्योहार और सामाजिक जीवन की छवियां देखने को मिलती हैं। चितेरी कला महज रंगों और रेखाओं का संयोजन नहीं, बल्कि बुंदेली जनजीवन की दृश्य अभिव्यक्ति है। पारंपरिक रूप से विवाह और दूसरे मांगलिक अवसरों पर घरों की दीवारों को सजाने में इसका इस्तेमाल होता रहा है। देहरी और आंगन भी लोकपरंपराओं में शुभ प्रतीकों और मांगलिक अलंकरण के महत्वपूर्ण स्थल रहे हैं। नवरात्र में देवी आराधना और शक्ति के प्रति आस्था को चित्रों के माध्यम से व्यक्त करने का विशेष महत्व है। देवी के स्वरूप, शुभ प्रतीकों और फूल-पत्तियों जैसी आकृतियों के जरिये लोकविश्वास को दृश्य रूप मिलता है। विवाह जैसे अवसरों पर चित्रांकन मंगलकामना और समृद्धि की भावना से जुड़ता है। इस तरह चितेरी कला धार्मिक अनुष्ठानों और सामाजिक जीवन के बीच सांस्कृतिक सेतु का काम करती है। राजकीय संग्रहालय झांसी के निदेशक मनोज कुमार गौतम बताते हैं कि चितेरी कला का प्रदर्शन विशेष रूप से व्रत-त्योहारों के अवसर पर किया जाता रहा है। इसमें बूंदी और किशनगढ़ जैसी चित्रशैलियों की झलक भी देखने को मिलती है। गौतम के अनुसार, पहले नवरात्र के अवसर पर चितेरी कला के माध्यम से चित्रांकन की परंपरा थी। समय के साथ इसका स्वरूप बदला है। अब कुछ संस्थाएं इसे व्यावसायिक रूप देने और नए माध्यमों से जोड़ने का प्रयास कर रही हैं। वस्त्रों पर उकेरे गए चित्रों के माध्यम से यह लोककला घरों की दीवारों से निकलकर रोजमर्रा के जीवन और बाजार तक पहुंच रही है। झांसी के पुराने शहर में चितेरों के मुहल्ले को कभी चितरयाना कहा जाता था, जो अब चतुरयाना के नाम से जाना जाता है। नाम भले ही बदल गया हो, लेकिन चितेरी कला से जुड़ी परंपरा आज भी कायम है। विवाह जैसे मांगलिक अवसरों पर घरों की दीवारों पर चित्रकारी कराने के लिए चितेरों को विशेष रूप से बुलाया जाता है। इन अवसरों पर उन्हें अच्छी रकम भी मिलती है। बदलते समय के बावजूद चितेरों की यह परंपरा बुंदेलखंड की लोककला और सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए हुए है। हालांकि समय के साथ घरों की बनावट और जीवनशैली में बदलाव आया है। पक्के मकानों के बढ़ते चलन और घरों को सजाने के तौर-तरीकों में परिवर्तन से पारंपरिक भित्ति चित्रकारी के लिए पहले जैसी परिस्थितियां नहीं रह गई हैं। ऐसे में चितेरी कला को नए माध्यमों से जोड़ना उसके संरक्षण और विस्तार का एक रास्ता बन सकता है। प्रदर्शनियों, कार्यशालाओं और कलाकारों से संवाद के जरिए इसकी विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाया जा सकता है। झांसी राजकीय संग्रहालय जैसे संस्थान इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। नवरात्र के अवसर पर चितेरी कला की चर्चा इसीलिए महत्वपूर्ण है कि यह केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान में जीवित सांस्कृतिक परंपरा भी है। दीवारों से साड़ियों तक पहुंचने की इसकी यात्रा बताती है कि यह लोककला बदलते समय के साथ नए माध्यम अपना सकती है। जरूरत इस बात की है कि चितेरी के रंगों का विस्तार हो लेकिन उनके पीछे छिपी लोकस्मृति, आस्था और कलाकारों की विशिष्ट पहचान भी सुरक्षित रहे।