खुद की डॉक्टरी-एंटीबायोटिक दवाओं की ओवरडोज भारी पड़ रहा है। इससे बीमारी के कीटाणु नष्ट नहीं हो रहे हैं। हालत ये है कि 90 फीसदी एंटीबायोटिक दवाएं बेअसर साबित हो रही हैं। इससे आईसीयू के मरीजों को बचाना मुश्किल हो रहा है। एसएन मेडिकल कॉलेज की माइक्रोबायोलॉजी की राइट एंटीबायोटिक, स्टार्ट विद राइट कल्चर विषय पर कार्यशाला में चिकित्सा विज्ञानियों ने इस पर चिंता जताई है। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) की वैज्ञानिक डॉ. कामिनी वालिया ने बताया कि निमोनिया, टाइफाइड, यूटीआई, सेप्सिस, वायरल इन्फेक्शन, टीबी, फेफड़े समेत कीटाणुओं से होने वाली बीमारियों में एंटीबायोटिक दवाएं रेसिस्टेंट हो रही हैं। इन दवाओं से संक्रमण करने वाले कीटाणु नष्ट नहीं हो रहे। इससे मर्ज आसानी से ठीक नहीं हो रहा। जान का जोखिम भी बढ़ गया है। आईसीएमआर की मदद से दो नई एंटीबायोटिक दवाएं विकसित हुई हैं। केजीएमयू लखनऊ के इन्फेक्शन डिजीज डिपार्टमेंट ऑफ मेडिसिन के अध्यक्ष डॉ. हिमांशु रेड्डी ने बताया कि एंटी फंगल और एंटी इन्फेक्शन दवाएं तेजी से रेसिस्टेंट हो रही हैं। सबसे ज्यादा आईसीयू के गंभीर मरीजों का इलाज बनता जा रहा है। तीन-चार तरह के कीटाणुओं की दवाएं सबसे ज्यादा रेसिस्टेंट हैं। यही स्थिति रही तो अगले 10-15 साल में भी एंटीबायोटिक दवाएं बीमारी पर कार्य नहीं करेंगी। ऐसे में चिकित्सक दो-तीन एंटीबायोटिक को मिलाकर इलाज कर रहे हैं।