राज्यस्तरीय छतराड़ी जातर मेले की सांस्कृतिक संध्या में हिमाचली लोक संस्कृति का ऐसा रंग जमा कि देर रात तक पूरा माहौल लोकधुनों और भजनों से गूंजता रहा। मंच पर जैसे ही लोक कलाकारों ने पारंपरिक गीत छेड़े, दर्शक भी अपनी जगह पर झूमते नजर आए। सांस्कृतिक संध्या में लोकगायक कमल नैहरिया ने अपनी प्रस्तुतियों से भक्ति और लोक संस्कृति का अनूठा संगम पेश किया। उन्होंने कार्यक्रम की शुरुआत भजनों से की। ‘तेरे मणिमहेश से’, ‘शिवा री जातरा’, ‘मेरेया भागसू नागा’ और ‘भोले मेरे सामी’ जैसे भजनों से उन्होंने वातावरण को भक्तिमय बना दिया। इसके बाद कमल नैहरिया ने ‘माता टाल वालिए’, ‘सामरिए नागे’, ‘देवी जालपा’ और ‘सृष्टि री रचना’ की प्रस्तुतियां दीं। भजनों की इन प्रस्तुतियों पर दर्शक पूरी तरह भक्ति में डूबे नजर आए। भक्ति गीतों के बाद जैसे ही लोकगीतों का दौर शुरू हुआ, सांस्कृतिक संध्या का माहौल और रंगीन हो गया। कमल नैहरिया ने ‘लोभिया’, ‘ढोलकू री ताना’, ‘नार पराई’ और ‘संसारो’ जैसे लोकगीत प्रस्तुत किए। लोकधुनों की शुरुआत होते ही दर्शकों का उत्साह देखते ही बना। पंडाल में मौजूद लोग तालियों के साथ कलाकारों का उत्साह बढ़ाते रहे और कई दर्शक लोकगीतों की धुन पर झूमते नजर आए। इसके बाद लोकगायिका निशा जरयाल ने मंच संभाला। उन्होंने ‘शिव कैलाशो के वासी’ भजन के साथ अपनी प्रस्तुति की शुरुआत की। इसके बाद ‘नचे धूडुआ’, ‘ऐंचली’, ‘निक्की जेई गोजरी’ और ‘तुलसो’ जैसी प्रस्तुतियों से दर्शकों का मनोरंजन किया। निशा जरयाल की प्रस्तुतियों ने कार्यक्रम में लोक संस्कृति का रंग और गहरा कर दिया। पारंपरिक धुनों और उनकी आवाज ने दर्शकों को देर तक बांधे रखा। सांस्कृतिक संध्या में लोकगायक अजय भरमौरी ने भी अपनी प्रस्तुतियों से खूब रंग जमाया। उन्होंने ‘इंद्रु नगा’ के भजन से कार्यक्रम को आगे बढ़ाया। इसके बाद ‘नागा खोल कुंडिया’, ‘हे देवा’, ‘गिरदा माई’ और ‘बनवासी’ जैसी प्रस्तुतियां देकर दर्शकों का मनोरंजन किया। एक के बाद एक लोक कलाकारों की प्रस्तुतियों ने छतराड़ी जातर की शाम को यादगार बना दिया। मंच से निकलती हिमाचली लोकधुनें और पंडाल में उमड़ता दर्शकों का उत्साह देर रात तक बना रहा। सांस्कृतिक संध्या में भरमौर-पांगी के पूर्व विधायक जियालाल कपूर ने विशेष अतिथि के रूप में शिरकत की। तहसीलदार चंबा भूपेंद्र कश्यप ने मुख्य अतिथि को स्मृति चिन्ह भेंटकर सम्मानित किया। छतराड़ी जातर की इस सांस्कृतिक संध्या ने एक बार फिर हिमाचल की लोक परंपराओं की खूबसूरती को मंच पर जीवंत कर दिया। भक्ति गीतों से लेकर पारंपरिक लोकधुनों तक, कार्यक्रम में हिमाचली संस्कृति के अलग-अलग रंग देखने को मिले।