जिस आंगन में बच्चों की किलकारियां गूंजीं और जिस परिवार को पालने-पोसने में पूरी जिंदगी लगा दी, उसी घर से बुढ़ापे में दूर होना कितना दर्द देता है, यह दियोली स्थित अपना घर वृद्धाश्रम में रह रहीं 105 वर्षीय बुजुर्ग की आंखों में साफ दिखता है। तीन बेटे, तीन बहू, पोते-पोतियां और परपोते होने के बावजूद करीब एक माह से वह वृद्धाश्रम में हैं। पति मिस्त्री का काम कर परिवार का पालन-पोषण करते थे। उनके निधन के बाद बुजुर्ग के सामने अपनों के सहारे की जरूरत और बढ़ गई। बेटे सरकारी नौकरी से सेवानिवृत्त हैं। इसके बावजूद आखिरी पड़ाव में उन्हें अपनों का साथ नहीं मिल पा रहा है। पोते-पोतियों का नाम लेते ही उनकी आंखें नम हो जाती हैं। घर लौटने की बात पर हामी भरती हैं, लेकिन आवाज में बेबसी साफ सुनाई देती है। आश्रम में भोजन, रहने और स्वास्थ्य की सुविधाएं मिल रही हैं, लेकिन अपनों से दूर होने का खालीपन बरकरार है। आश्रम में मंडी जिले के एक बुजुर्ग करीब साढ़े तीन साल से रह रहे हैं। पत्नी और बच्चे नहीं हैं। दो कमरों का मकान और जमीन भाइयों को देने के बाद उनके अनुसार देखभाल नहीं हुई। रांची के बबुआ करीब 1990 में काम की तलाश में हिमाचल आए थे। बीमारी के बाद अस्पताल पहुंचे और परिवार से दूरी व आर्थिक परेशानी के कारण वापस नहीं लौट सके। शादी नहीं की और अब अपना घर ही उनका ठिकाना है। वर्तमान में आश्रम में 28 बुजुर्ग रह रहे हैं। किसी के पास परिवार है तो कोई अपनों से दूर है। सभी के लिए आश्रम सहारा जरूर है, लेकिन घर और परिवार की कमी कोई सुविधा पूरी नहीं कर पाती। अपना घर वृद्धाश्रम के संचालक अधिवक्ता प्रकाश बंसल के अनुसार प्रदेश के अलावा बाहरी राज्यों से भी बुजुर्ग यहां आते हैं। परिवारों से संपर्क कर उन्हें घर भेजने का प्रयास किया जाता है, लेकिन कई कारणों से बुजुर्ग वापस नहीं लौट पाते। स्टाफ नर्स एवं कोऑर्डिनेटर शैलजा के अनुसार बुजुर्गों की नियमित स्वास्थ्य जांच होती है और महीने में करीब आठ स्वास्थ्य शिविर लगाए जाते हैं। योग, वॉक, कैरम, शतरंज, सिलाई-कढ़ाई और ड्राइंग जैसी गतिविधियों से उन्हें व्यस्त रखा जाता है। कोशिश रहती है कि बुजुर्गों को आश्रम नहीं, अपना घर महसूस हो।