जगाधरी। शारदीय नवरात्र के समापन पर सोमवार को श्रद्धालुओं ने मां भगवती की पूजा-अर्चना कर हलवा-पूड़ी का भोग लगाया और कन्या पूजन के साथ अपने नौ दिवसीय व्रत का पारण किया। सुबह से ही मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़नी शुरू हो गई। भक्तों ने मां भगवती के चरणों में अपनी मनोकामनाएं अर्पित कर परिवार की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना की। मंदिरों में सुबह से ही धार्मिक माहौल बना रहा और श्रद्धालु मां के जयकारे लगाते नजर आए। मां भगवती के मंदिर में सुबह करीब तीन बजे से ही पूजा-अर्चना की तैयारियां शुरू हो गई थीं। श्रद्धालुओं ने विधि-विधान से मां की पूजा की और हलवा, पूड़ी व चने का भोग लगाया। इसके बाद छोटी कन्याओं को देवी का स्वरूप मानकर उनका पूजन किया गया। कन्याओं को भोजन करवाकर दक्षिणा और उपहार भेंट किए गए। इसके साथ ही श्रद्धालुओं ने अपने व्रत पूर्ण किए और मां भगवती से परिवार पर कृपा बनाए रखने की प्रार्थना की। सात पीढ़ियों से मां भगवती की सेवा में जुटा परिवार मंदिर में मां भगवती की सेवा करने वाले परिवार के सदस्यों ने बताया कि उनके परिवार की कम से कम सात पीढ़ियां मां भगवती की सेवा में लगी हुई हैं। यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ रही है। परिवार के बुजुर्गों से मिली धार्मिक परंपराओं का आज भी विधिवत पालन किया जा रहा है। परिवार के वर्तमान सदस्य भी मां की सेवा कर रहे हैं और आने वाली पीढ़ी को इस परंपरा से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। पंडित अभिनव शास्त्री ने कहा कि सनातन धर्म की परंपराओं को जीवित रखने के लिए बच्चों को बचपन से ही पूजा-पाठ, धार्मिक संस्कारों और देवी-देवताओं के प्रति श्रद्धा का महत्व समझाना जरूरी है। जब बच्चे अपने परिवार में इन परंपराओं को देखते हैं तो वे भी उनसे जुड़ते हैं और भविष्य में इन्हें आगे बढ़ाते हैं। दूर-दराज से दर्शन करने पहुंचते हैं श्रद्धालु मंदिर में केवल स्थानीय श्रद्धालु ही नहीं, बल्कि यमुनानगर-जगाधरी के अलावा अंबाला और आसपास के क्षेत्रों से भी भक्त मां भगवती के दर्शन करने पहुंचते हैं। कई परिवार पीढ़ियों से मंदिर में माथा टेकने आते रहे हैं। श्रद्धालु अपनी मनोकामनाएं लेकर मां के दरबार में पहुंचते हैं और पूरी श्रद्धा के साथ पूजा-अर्चना करते हैं। मंदिर से जुड़े लोगों ने कहा कि मां भगवती के प्रति श्रद्धालुओं की गहरी आस्था है। उनकी कामना है कि मां की कृपा सभी पर बनी रहे, संसार में सुख-शांति और समृद्धि आए तथा सनातन धर्म की धार्मिक परंपराएं आने वाली पीढ़ियों तक इसी तरह जीवित रहें।