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हिसार की निरक्षर महिलाएं राखीगढ़ी के महत्व को पहुंचाएंगी देश- विदेश के कौने कौने तक

नारनौंद के गांव राखीगढ़ी की निरक्षर महिलाएं 6500 से 8000 साल पुरानी सिंधु घाटी सभ्यता -हड़प्पाकालीन संस्कृति को विश्व के कौने कौने तक पहुंचाएंगी। अक्षर ज्ञान से अनजान यह महिलाएं अपनी कला के जरिए अपनी संस्कृति की पहचान को विश्व भर में फैलाएंगी। पिछली तीन पीढि़यों से दरी बनाने का काम करने वाली महिलाएं अब तक दरी पर ऊंट- घोड़े आदि के डिजायन बनाती थी। अब यह महिलाएं रखीगढ़ी से जुड़ी कलाकृतियों को अपनी दरियों पर मूर्त रूप दे रही हैं। राखीगढ़ी की खोदाई में मिले अवशेषों के डिजायन इन महिलाओं को दिए गए हैं। जिसके आधार पर यह रंग-बिरंगे धागों से इन डिजायन को तैयार कर रही हैं। इस कारीगरी में महिलाएं मशीन का उपयोग नहीं कर रही। पूरी हस्तशिल्प आधारित इस कला का लाइव डेमो राखीगढ़ी महोत्सव में दिखाया जा रहा है। शीला, बीरमति, भतेरी, मुन्नी देवी ने बताया कि उनकी दादी सूत की कताई कर हाथ से दरी, खेस ,रजाई आदि बनाती थी। उन्होंने भी घर में अपने बुजुर्गाें से यह कला सीखी। महिलाओं ने बताया कि वह किसी भी डिजायन को देख कर उसे दरी पर उकेर सकती हैं। सामान्य तौर पर दरी में मकान, ऊंट, घोड़े,हाथी, लड़का-लड़की के चित्र बनाती थी। अब उन्हें राखीगढ़ी से चित्र उकरने का काम दिया गया है। भेतरी देवी ने बताया कि उन्हें इसके बारे में ज्यादा जानकारी तो नहीं लेकिन इतना पता है कि यह बैल जैसे आकार बनाने हैं। उनको राखीगढ़ी से जुड़े चित्र दिए गए हैं। जिसके बाद उनको प्रशिक्षण भी दिया गया। अब वह इस डिजायन के हिसाब से दरी तैयार कर रही हैं। उनकी दरी किस भाव पर बिकेंगी अभी उन्हें कोई जानकारी नहीं है। उन्होंने बताया कि छोटे आकार की दरी दो दिन तथा बड़े आकार की दरी एक सप्ताह में तैयार होती है। पूरा काम हाथ से बारीकी से करना होता है इस कारण समय ज्यादा लगता है। दरी तैयार करने के लिए वह बाजार से रंग बिरंगा सूत खरीद कर लाती हैं। सूत खरीदने में विशेष ध्यान रखना होता कि उसका रंग न निकले। अगर रंग निकल गया तो पूरी मेहनत व्यर्थ हो सकती है। सीजेआई ने भी की थी सराहना इस साल जनवरी महीने में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत हिसार दौरे के समय राखीगढ़ी म्यूजियम में भी पहुंचे थे। जहां इन महिलाओं के हाथाें से तैयार रंग -बिरंगी दरी उनको दिखाई थी। सीजेआई ने महिलाओं के हुनर की तारीफ करते हुए उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया था। सीजेआई ने कला के प्रति समर्पित रहने का संदेश भी दिया था। राहुल बना रहे अवशेषों की प्रतिकृति जींद जिले के गांव कालवा के रहने वाले राहुल राखीगढ़ी से मिले अवशेषों की प्रतिकृति टेराकोटा में तैयार कर रहे हैं। जिनको फ्रेम कर पर्यटकों के लिए उपलब्ध कराया जा रहा है। यह 100 रुपये से लेकर एक हजार रुपये तक में उपलब्ध हैं। राहुल ने बताया कि वह हेरिटेज वॉक में आने वाले पर्यटकों को मिट्टी से बर्तन-खिलौने बनाना भी सिखाते हैं। राहुल के हाथों से बनी कलाकृतियां जी 20 सम्मेलन में आए मेहमानों को भी भेंट की जा चुकी हैं। सीएम नायब सिंह सैनी इन कृतियों को कई बार देश-विदेश के प्रतिनिधियों को भेंट कर चुके हैं। अधिकारी के अनुसार हमारे स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिला बीरमति अपनी कुछ सहयोगियों के साथ राखीगढ़ी के चित्र उकेर कर दरी बना रही हैं। यहां भ्रमण के लिए आने वाले पर्यटक इसे खरीद सकेंगे। जिसमें छोटे व बड़े आकार की दरी बनाई जा रही हैं।राखीगढ़ी की स्मृति के तौर पर इसे ले जा सकेंगे। फिलहाल इसे ऑफलाइन ही दिया जा रहा है। भविष्य में इसे ऑनलाइन भी उपलब्ध कराएंगे। -वीरेंद्र श्योराण, जिला परियोजना समन्वयक, हिसार।

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