क्या बताऊँ तुम्हें रात कैसे कटी
रात भर सिर्फ तुमको गाते रहे
कोई था भी नहीं मुझे सुननेवाला
चांद तारों को नगमे सुनाते रहे
गाते गाते फिर सवेरा हुआ
मेरी धरती का आंचल गीला हुआ
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वर्तमान के परिवेश में,
जा टकराते हैं हम अक्सर
बंद खिड़कियों से; अंधी दीवारों से
ढकी रहती हैं जो जमीन से छत तक
अपारदर्शिता के बड़े-बड़े शीशों के
भ्रामक आवरण से।
जाना है हम सबने,
पसरे रहते ह...और पढ़ें
योजनों से हम तुम्हारे साथ आये हैं मगर
हम तुम्हारी योजनाओं में कहीं हैं ही नहीं !
जब तुम्हारे पाँव में
काँटा चुभा, काँधे बिठाया
और अपना दर्द
तुमको भी नहीं हमने बताया
हार में ह...और पढ़ें
इक्कीसवीं सदी के लोग
अस्सी के दशक में खुशियाँ तलाश रहे
क्या उन्हें पता चल गया
इक्कीसवीं सदी में लोग खुश नहीं हैं...
भेड़चाल में भागे
बदल नहीं रहे अंतर्मन को...
आडंबर रचे
पा लिया चाँद से लेकरऔर पढ़ें
नये समय की नयी चुनौती
प्रश्न पुराने, यक्ष ! बदल दो !
वर्तमान पर चर्चा करती
एक सभा है अंधी बहरी
कोई कहता नहीं लोक से
अब इसका अध्यक्ष बदल दो !
राजाओं के सम्मोहन में...और पढ़ें
तुम बोलो और हम दोहराएं
ऐसा रिश्ता नहीं चलेगा
तुम कह दो हम करते जाएं
ऐसा रिश्ता नहीं चलेगा...
तुम अपने मन के राजा हो
हम भी अपना मन रखते हैं
तुम हिमगिरि होगे तो होगे
हम भी तो सावन रखते हैं
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मैं आईना हूं तेरी यादों का
कभी मुझको देख संवर लेना।
मेरे आंसू तुम बनो न बनो
मेरी आंखों में तुम ठहर लेना
मेरी फितरत है पतंगों जैसी
तेरे आसपास ही मंडराऊंगा।
तुम चिराग बन यूं ही जलते रहना
अपन...और पढ़ें
इस समय में बोलना कितना कठिन है
और चुप रहना कठिन उससे अधिक !
खो गयीं जयकार में सौ प्रार्थनाएं
अट्टहासों में घुली हर एक सिसकी
इन्द्रजालों में फँसी है एक पीढ़ी
कौन पहचाने यहाँ आवाज किसकी ...और पढ़ें
होठों पर मल्हार राग है
साँस साँस में भरी आग है
मन के भीतर कोलाहल है
धड़कन धड़कन दौड़ भाग है
मेरी नींद अचानक खुल जाती है आधी रात में
तुम होते तो तुमसे कहता अपने मन की बात मैं
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भले अनभिज्ञता जतला रहा हूँ
मगर सबकुछ समझता जा रहा हूँ
तुझे हर बात समझाना कठिन है
मैं अपने आप को समझा रहा हूँ
तू चेहरे से झलक उठता है पूरा
मैं इसपे डॉक्टरेट करवा रहा हूँ
जहाँ तू सर झुकाने जा रहा...और पढ़ें