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बिमल सहगल: बहुत शौक था माँ को बागबानी का; रखती थी हरा-भरा घर का बगीचा

bimal saigal hindi kavita bahut shauq tha maa ko baghbani ka rakhti thi hara bhara ghar ka bageecha
                
                                                         
                            

बहुत शौक था 
माँ को बागबानी का;
रखती थी, हरा-भरा,
घर का बगीचा,
माली को मशवरा देते:
भला, कहाँ लगेगी घास
नीलगिरी या जापानी; 
कहाँ बनेंगी क्यारियां कितनीं-
किस जगह, और कब-कब;
कौन-कौन से फूल खिलेंगे उनमें,
तय कर लेती थी, बख़ूबी 
खुद से ही वह ये सब।

आत्मसंतोष, 
इस में पाती थी, माँ, 
और फिर बाँटते हुए  
निष्ठा की वो 
सारी उत्पत्ति भी- 
घर में ही नहीं,
आने-जाने वालों, और
गली से गुजरने वालों में भी,
लपेट अपनी मुस्कानें 
उन्हीं खिलते, खुशनुमा
फूलों की खुशबू में। 
 
मातृत्व धर्म ही निभाते, 
सुनिश्चित करती थी
हवा और हौसला भी, अपनी
उस अपनाई औलाद के 
पंखों में भरना,
उसे प्रेरित करना,
निज बल को आजमाने-
दुनियावी परवाज़ की 

जिम्मेदारी अपनी,
खुद ही उठाने;
तोड़ जमीनी रिश्तों के बंधन, 
खुले नभ में 
उन्मुक्त उड़ जाने।

बेशक, कुदरत की नेमतें-
हरियाली, ताज़गी और खुशबू,
कैद नहीं हो सकतीं 
किसी बगीचे की ज़ाती रौनक में;
बनीं ही होतीं हैं वे तो बस 
बहती हवा संग उड़ जाने, 
दूर कहीं, किन्हीं, 
वीरान प्रांगणों के
ऊपर भी जा मंडराने
और, ताज़गी की बयार बन 
वहाँ उतर जाने। 
 

4 घंटे पहले

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