पेड़, परिंदे और बारिश
जब-जब सूरज ने इस
धरती को बेइंतहा तपाया है।
मुझे शहर में काटा गया
एक-एक पेड़ याद आया है।
क्या विकास पर केवल
मानव का ही हक होता है?
उजड़े पेड़ों के परिंदों का
सवाल अदालत तक आया है।
बादलों ने भी की है शिकायत
जब-जब वे बरसने को निकले
हरे-भरे ऊंचे पेड़ों का कोई झुंड
उनकी अगवानी में न लहलहाया है।
कटे हुए पेड़ों के स्थान पर मानव ने
रोपे हजारों-लाखों नन्हे पौधे
मधुमक्खियां कर रही हैं शिकायत
फूलों को तोड़ मंदिरों में चढ़ाया है।
नीति निर्धारकों से भी है एक प्रश्न
क्या उनके घर का चिराग़
रिमझिम-रिमझिम बारिश में कभी
क्या भीगकर नहीं नहाया है?
दूरदर्शी और जनहितकारी निर्णय
जिन नेताओं और प्रशासकों ने लिए
इतिहास सदैव ही उन्हें शिद्दत से
अपनी यादों में संजोता आया है।
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