तूफ़ानों से बचने का अब समय नहीं
ख़तरे हैं पर डरने का अब समय नहीं
भलमनसाहत की भी कोई हद होती
उसके आगे झुकने का अब समय नहीं
ऐसे तो फिर कायर ही कहलाएंगे
यूं चुप बैठे रहने का अब समय नहीं
दुश्मन ने दरवाज़े पर दस्तक दे दी
घर के भीतर छुपने का अब समय नहीं
आगे कुआं है पीछे कहीं न खाईं हो
इस दुविधा में पड़ने का अब समय नहीं
आंसू को बनकर अंगार धधकने दो
भीतर-भीतर कुढ़ने का अब समय नहीं
महफ़िल में दीवाने आस लगाये हैं
सजने और संवरने का अब समय नहीं
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