वर्तमान के परिवेश में,
जा टकराते हैं हम अक्सर
बंद खिड़कियों से; अंधी दीवारों से
ढकी रहती हैं जो जमीन से छत तक
अपारदर्शिता के बड़े-बड़े शीशों के
भ्रामक आवरण से।
जाना है हम सबने,
पसरे रहते हैं उन्हीं के पीछे- बेशर्मी से,
बेतरतीबी, लापरवाही, त्रुटि और
विकार के सभी अहसास;
मगर बाहर चलते-फिरते राहगीरों को तो बस
अपने उलझे अक्स ही दिखते हैं
और दिखता है सड़क, बाज़ार का
वही नीरस कारोबार।
वहीं, उन परावर्तक शीशों के पीछे,
ज्यों घात लगाए बैठीं,
अदृश्य पैनी नज़रें ज़रूर भेदती होंगी
पढ़ लेने उस पार के चेहरे-
जाँचने उनके हाव-भाव, और
उन्हें परिहास-जनक दिखते
कोई आकार और व्यवहार;
आईने के स्वभाव के ठीक विपरीत
जहाँ खुद की औकात दिख जाती है
शिकायत सी करती,
दूसरों की हस्ती पर कटाक्ष कसने से पहले।
- बिमल सहगल
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