योजनों से हम तुम्हारे साथ आये हैं मगर
हम तुम्हारी योजनाओं में कहीं हैं ही नहीं !
जब तुम्हारे पाँव में
काँटा चुभा, काँधे बिठाया
और अपना दर्द
तुमको भी नहीं हमने बताया
हार में हमने सदा आँसू बहाये हैं मगर
हम विजय की इन कथाओं में कहीं हैं ही नहीं !
मानते हैं हम कि
तुमने भी हमें संबल दिया था
आज जड़ से काटने
को ही हमें कल जल दिया था
उम्र भर हमने तुम्हारे गीत गाये हैं मगर
हम तुम्हारी ही सभाओं में कहीं हैं ही नहीं !
देर से ही पर सही
आँखें खुली अब ठीक है
अब दिखाई दे रहा है
दूर क्या नजदीक है
खोजना!मन है दुखी हम लौट आए हैं मगर
हम तुम्हारी आत्माओं में कहीं हैं ही नहीं !
साभार: ज्ञानप्रकाश आकुल की फेसबुक वाल से
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