क्या बताऊँ तुम्हें रात कैसे कटी
रात भर सिर्फ तुमको गाते रहे
कोई था भी नहीं मुझे सुननेवाला
चांद तारों को नगमे सुनाते रहे
गाते गाते फिर सवेरा हुआ
मेरी धरती का आंचल गीला हुआ
रात भर नीले अम्बर में रोया कोई
ओस की-बूंद ये कहानी सुनाते रहे
क्या बताऊं तुम्हें रात कैसे कटी
फिर पुरवा पवन धीरे से बह गई
फूल कलियों से ये दास्तां कह गई
दिल की किताब पर जिसको अश्कों से लिख
गीत गजलों के अश्रु लौटाते रहे
क्या बताऊं तुम्हें रात कैसे कटी
रात भर सिर्फ तुमको गाते रहे
- राकेश धर द्विवेदी
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