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पाकिस्तान और तालिबान के झांसे में फंसा अमेरिका, अफीम किंग की रिहाई पड़ेगी सभी पर भारी!

Thu, 10 Oct 2019 11:32 AM IST
Harendra Chaudhary हरेंद्र, अमर उजाला
हरेंद्र, अमर उजाला Published by: Harendra Chaudhary Updated Thu, 10 Oct 2019 11:32 AM IST
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zalmay khalilzad and Taliban meeting in Pakistan could trouble for India, impact on Terror funding
तालिबानी नेतओं से गले मिलते पाक विदेश मंत्री और आईएसआई चीफ - फोटो : Twitter

हाल ही में पाकिस्तान में अमेरिकी वार्ताकार जिल्मे खलीलजाद और तालिबानी नेताओं की बीच हुई बैठक के बाद तीन भारतीय इंजीनियरों को रिहा करने के बदले 11 तालिबानी कमांडर्स को छोड़ा गया। ये सभी तालिबानी आतंकी अफगानिस्तान की हाई सिक्योरिटी जेल में बंद थे। इन रिहा हुए 11 तालिबानियों में अब्दुल रहमान और मौलवी अब्दुल राशिद बलूच की रिहाई चौंकाने वाली थी।

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अफीम किंग है अब्दुल राशिद बलूच

मौलवी अब्दुल राशिद बलूच का नाम प्रतिबंधित अंतरराष्ट्रीय आतकिंयों की सूची में शामिल है। अब्दुल रहमान और राशिद बलूच, दोनों तालिबान शासन के दौरान कुनार और निम्रोज प्रांत के गवर्नर थे और इन्हें अमेरिकी सेना ने बरगम एयरबेस से रिहा किया। इनमें से राशिद बलूच को अफीम किंग के नाम से जाना जाता है और इसे टनों अफीम के शिपमेंट के साथ रंगेहाथों पकड़ा गया था। अदालत ने उसे 18 साल की सजा सुनाई थी। खास बात यह है अफगानिस्तान ने पाकिस्तान पर तालिबानी नेताओं की मेजबानी करने का आरोप लगाया है। अफगानिस्तान का आरोप है कि किसी विद्रोही समूह की मेजबानी करना नियमों और सिद्धांतों के खिलाफ है। वहीं तालिबानियों को रिहा करने के इस फैसले में मौजूदा अफगान सरकार से कोई सलाह-मशविरा तक नहीं किया गया।      

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टेरर फंडिग में होगी बढ़ोतरी

राशिद बलूच का छोड़ा जाना न तो अफगानिस्तान और न ही भारत के हित में है। तमाम ऐसे सबूत मौजद हैं कि जिसमें बलूच के आतंकी हमलों में शामिल होने का गठजोड़ सामने आया था। वहीं बलूच के पकड़े जाने के बाद तालिबान को मिलने वाले टेरर फंडिग में भी कमी आई थी और तालिबान की कमर टूटी थी। वहीं बलूच का रिहा होने से ड्रग ट्रैफिकिंग के जरिए टेरर फंडिग में बढ़ोतरी होगी। साथ ही, भारत में हुए तमाम आतंकी हमलों में अफीम की खेती से मिले पैसों का इस्तेमाल की सूचनाएं सामने आई थीं। दिसंबर 2015 में पठानकोट एयरबेस और 26/11 मुंबई आतंकी हमलों में अफगान ड्रग ट्रैफिकिंग का कनेक्शन सामने आया था।

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कमर बाजवा और आईएसआई चीफ की भूमिका

चिंताजनक बात यह है कि अमेरिकी शांति वार्ताकार खलीलजाद की तालिबानी नेताओं के साथ पाकिस्तान में बैठक बड़े सवाल खड़े कर रही है। वहीं मौजूदा अफगान सरकार का इसमें शामिल न होना इस बैठक पर सवाल खड़े कर रहा है। राष्ट्रपति ट्रंप ने 9/11 को काबुल में आत्मघाती हमले के बाद तालिबानी नेताओं के साथ शांतिवार्ता रद्द कर दी थी, जिसके बाद से पाकिस्तान समेत रूस एवं चीन वार्ता की बहाली के प्रयासों में जुटे हुए थे। जिसके बाद तालिबानी नेता रूस भी गए थे। शांति टूटने के बाद तालिबानी नेताओं के साथ खलीलजाद की यह पहली बैठक है।

पाकिस्तान में हुई इस बैठक में पाकिस्तान विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी के अलावा पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा भी शामिल हुए थे। यह भी खबरें सामने आई कि इस बैठक में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के चीफ लेंफ्टिनेंट जनरल फैज हमीद ने भी हिस्सा लिया।

जिंदा हो सकता है हक्कानी नेटवर्क

तालिबान के बारह सदस्यीय राजनीतिक प्रतिनिमंडल का नेतृत्व करने वाले मुल्ला अब्दुल गनी बरादर को पिछले साल ही आठ साल की हिरासत के बाद पाकिस्तान की जेल से रिहा किया था। बरादर को 2010 में कराची में गिररफ्तार किया गया था। इसी साल तालिबान ने कतर में उसे पॉलिटिकल ऑफिस का प्रमुख बनाया था। ओसामा बिन लादेन और मुल्ला उमर के करीबी रह चुके बरादर को बरादर तालिबान का संस्थापक और नंबर टू माना जाता है। इस प्रतिनिधिमंडल में हक्कानी गुट के नेता का भाई अनस हक्कानी भी है, जिस पर कभी अफगान सरकार ने सबसे ज्यादा ईनाम रखा था।

अनस को 2016 में तालिबानियों ने बंधक बनाए एक अमेरिकी प्रोसेफर के बदले रिहा किया गया था। अनस हक्कानी असल में हक्कानी नेटवर्क के संस्थापक जलालुद्दीन हक्कानी का बेटा है। जलालुद्दीन हक्कानी पूर्व एंटी सोवियत गुरिल्ला कमांडर था और तालिबानी लीडर मुल्ला उमर का खास था। वहीं अनस के पास अरब देशों से फंड एकत्र करने की जिम्मेदारी थी और वह सोशल मीडिया के जरिए भर्तियां करता था। अनस पर 2011 में काबुल स्थिति भारतीय दूतावस पर हमले का आरोप था, जिसके बाद उसे गिरफ्तार किया गया था।

तालिबान और अल-कायदा एकजुट!

वहीं अफगानिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हमदुल्लाह मोहिब का कहना है कि भले ही तालिबान के इस प्रतिनिधिमंडल में कई तालिबानी नेता शामिल हों, लेकिन तालिबान की विचारधारा से ताल्लुक रखने वाले कई नेता इस शांति वार्ता के साथ नहीं है। मोहिब का दावा है कि तालिबान के कई लड़ाके अल-कायदा में शामिल हो गए हैं। इसके अलावा कई नेता इस्लामिक स्टेट ऑफ खुरासान में शामिल हो चुके हैं, जिसके बाद इस इलाके में खतरा बढ़ जाएगा और अमेरिका और बाकी हिस्सेदार देशों पर इसका असर पड़ेगा। वहीं उनका यह भी दावा है कि तालिबान और अल-कायदा के बीच सीमाएं घट रही हैं और उनकी विचारधारा भी एकजुट हो रही है।

Mullah Abdul Ghani Baradar, the Taliban group's top political leader and Sher Mohammad Abbas Stanikzai
अफगानिस्तान का दावा कुछ और है

हालांकि पाकिस्तान में हुई तालिबान और मुख्य वार्ताकार खलीलजाद की इस बैठक के कई मायने निकाले जा रहे हैं। अफगानिस्तान के उप-विदेश मंत्री इदरिस जमान का कहना है कि इसका शांति वार्ता से कोई लेनादेना नहीं है। उनका दावा है कि दो अमेरिकी बंधकों को रिहाई लेकर यह बातचीत हुई थी, 2016 में अमेरिकी प्रोफेसर केविन किंग और आस्ट्रेलियाई टिमोथी जॉन वीक का तालिबान ने काबुल में अपहरण कर लिया था। हालांकि उऩकी रिहाई को लेकर इस वार्ता में कोई फैसला नहीं हुआ, लेकिन 17 माह से तालिबान की कैद में फंसे तीन भारतीय इंजीनियरों के बदले तालिबानी लोगों को छुड़ाने को अलग नजरिये से देखा जा रहा है।

पाकिस्तान में कब्जे में तालिबान

पाकिस्तान ने एक तरह से शांति वार्ता का माहौल तैयार करके न केवल अमेरिका की नजरों में चढ़ने की कोशिश की है, बल्कि भारत को भी बता दिया है कि अगर शांति वार्ता की बहाली होती है, तो इसका मुख्य श्रेय पाकिस्तान को जाएगा। वहीं तालिबान पर उसका पूर्ण प्रभाव रहेगा और उनका इस्तेमाल वह भविष्य में भारत के खिलाफ कर सकता है। साथ ही, भारतीय इंजीनियरों की रिहाई करवा कर उसने यह दिखाने की कोशिश की है, वह भारतीय हितों का ख्याल रखता है। जिसका फायदा वह पेरिस में 13 से 18 अक्टूबर के बीच एफएटीएफ की बैठक में ब्लैक लिस्टिंग से बचने में उठा सकता है।   

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