{"_id":"597c80f84f1c1b24468b466a","slug":"why-people-sleep-around-the-world","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"क्यों कम सोने लगे हैं दुनिया भर के लोग","category":{"title":"World","title_hn":"दुनिया","slug":"world"}}
क्यों कम सोने लगे हैं दुनिया भर के लोग
बीबीसी हिन्दी
Updated Sat, 29 Jul 2017 06:05 PM IST
विज्ञापन
सेहत के लिए नुकसानदेह
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
क्या आपको पता है कि आज दुनिया पहले के मुक़ाबले बहुत कम सो रही है? पिछले सत्तर सालों में इंसान के नींद का औसत वक़्त बीस फ़ीसद तक घट गया है। एक रिसर्च के मुताबिक़ 1940 के दशक तक दुनिया में ज़्यादातर लोग रात में क़रीब आठ घंटे की नींद लेते थे।
लेकिन, आज लोगों की नींद के घंटे घटते जा रहे हैं। अमरीका के बर्कले स्थित कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर मैट वॉकर के मुताबिक़, अब हम रात में औसतन 6।7 या 6।8 घंटे ही सो पाते हैं। यानी पिछले 70-80 सालों में इंसान की नींद क़रीब 20 फ़ीसद कम हो गई है।
हम सब की ज़िंदगी में नींद सबसे क़ीमती चीज़ है। आज हम सब के पास उसकी कमी है। सारी दुनिया में आज ज़्यादातर लोग कम नींद आने से परेशान हैं। इसके नतीजे बहुत ख़तरनाक हो सकते हैं।
विज्ञापन
दरअसल आज हमारी ज़िंदगी गैजेट्स के जाल में फंस कर रह गई है। कंप्यूटर हमारी ज़िंदगी में एक बहुत बड़ा बदलाव लाया। इंटरनेट ने भी दुनिया में इंक़लाब लाने का काम काम किया। इससे हमारी ज़िंदगी में बहुत सी नई चीज़ें आ गई हैं। इसके आ जाने से अर्थव्यवस्था भी बदली है। अब दुनिया में चौबीसों घंटे काम चलता रहता है।
आपका ऑफ़िस आपको रात-रात भर उल्लुओं की तरह जगाता है। कई बार काम इतना ज़्यादा होता है कि उसे पूरा करने के लिए लोग रात-रात भर जागते रहते हैं। ख़ुद को जगाए रखने के लिए आप कॉफ़ी और चाय का सहारा लेते हैं। कुछ लोग शराब और सिगरेट की मदद लेते हैं। लेकिन हम ये भूल जाते हैं कि ये वक़्ती सहारे लंबे वक़्त के लिए हमारी नींद ख़राब कर रहे हैं। इंटरनेट ने असल में हमारा चैन सुकून हम से छीन लिया है।
हमारी नींद का दूसरा बड़ा दुश्मन है हमारा मोबाइल फ़ोन। अगर हम कंप्यूटर पर काम नहीं कर रहे हैं तो भी हम फ़ोन पर व्यस्त रहते हैं। क्योंकि फ़ोन भी अब मिनी कंप्यूटर ही बन गया। हालत तो ये हो गई है कि सोते-सोते भी हम फ़ोन चेक करते रहते हैं।
बात सिर्फ़ फ़ेसबुक देख लेने भर पर नहीं रुकती है। बातों का सिलसिला चल निकलता है। अंगुलियां मोबाइल पर व्यस्त हो जाती हैं, नींद से बोझिल पलकें आपके मोबाइल रखकर सोने का ही इंतज़ार करती रह जाती है। कई बार आंखों का ये इंतज़ार दिन निकलने तक लंबा हो जाता है।
हमारी ये आदतें हमारी नींद में ख़लल डालती हैं। प्रोफ़ेसर वॉकर के मुताबिक़ हमारा रहन-सहन भी हमारी नींद ख़राब करने लिए बहुत हद तक ज़िम्मेदार है। मिसाल के लिए आज हर दफ़्तर को ज़रूरत के मुताबिक़ गर्म और ठंडा करने के लिए एयरकंडीशनर और हीटिंग सिस्टम लगे हैं। घरों का भी यही हाल है।
विज्ञापन
लेकिन, आज लोगों की नींद के घंटे घटते जा रहे हैं। अमरीका के बर्कले स्थित कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर मैट वॉकर के मुताबिक़, अब हम रात में औसतन 6।7 या 6।8 घंटे ही सो पाते हैं। यानी पिछले 70-80 सालों में इंसान की नींद क़रीब 20 फ़ीसद कम हो गई है।
विज्ञापन
हम सब की ज़िंदगी में नींद सबसे क़ीमती चीज़ है। आज हम सब के पास उसकी कमी है। सारी दुनिया में आज ज़्यादातर लोग कम नींद आने से परेशान हैं। इसके नतीजे बहुत ख़तरनाक हो सकते हैं।
विज्ञापन
दरअसल आज हमारी ज़िंदगी गैजेट्स के जाल में फंस कर रह गई है। कंप्यूटर हमारी ज़िंदगी में एक बहुत बड़ा बदलाव लाया। इंटरनेट ने भी दुनिया में इंक़लाब लाने का काम काम किया। इससे हमारी ज़िंदगी में बहुत सी नई चीज़ें आ गई हैं। इसके आ जाने से अर्थव्यवस्था भी बदली है। अब दुनिया में चौबीसों घंटे काम चलता रहता है।
आपका ऑफ़िस आपको रात-रात भर उल्लुओं की तरह जगाता है। कई बार काम इतना ज़्यादा होता है कि उसे पूरा करने के लिए लोग रात-रात भर जागते रहते हैं। ख़ुद को जगाए रखने के लिए आप कॉफ़ी और चाय का सहारा लेते हैं। कुछ लोग शराब और सिगरेट की मदद लेते हैं। लेकिन हम ये भूल जाते हैं कि ये वक़्ती सहारे लंबे वक़्त के लिए हमारी नींद ख़राब कर रहे हैं। इंटरनेट ने असल में हमारा चैन सुकून हम से छीन लिया है।
हमारी नींद का दूसरा बड़ा दुश्मन है हमारा मोबाइल फ़ोन। अगर हम कंप्यूटर पर काम नहीं कर रहे हैं तो भी हम फ़ोन पर व्यस्त रहते हैं। क्योंकि फ़ोन भी अब मिनी कंप्यूटर ही बन गया। हालत तो ये हो गई है कि सोते-सोते भी हम फ़ोन चेक करते रहते हैं।
बात सिर्फ़ फ़ेसबुक देख लेने भर पर नहीं रुकती है। बातों का सिलसिला चल निकलता है। अंगुलियां मोबाइल पर व्यस्त हो जाती हैं, नींद से बोझिल पलकें आपके मोबाइल रखकर सोने का ही इंतज़ार करती रह जाती है। कई बार आंखों का ये इंतज़ार दिन निकलने तक लंबा हो जाता है।
हमारी ये आदतें हमारी नींद में ख़लल डालती हैं। प्रोफ़ेसर वॉकर के मुताबिक़ हमारा रहन-सहन भी हमारी नींद ख़राब करने लिए बहुत हद तक ज़िम्मेदार है। मिसाल के लिए आज हर दफ़्तर को ज़रूरत के मुताबिक़ गर्म और ठंडा करने के लिए एयरकंडीशनर और हीटिंग सिस्टम लगे हैं। घरों का भी यही हाल है।
नीली रौशनी से समस्या
सूरज के निकलने और डूबने के साथ ही तापमान में भी उतार-चढ़ाव आता है। ऐसे में हमारा शरीर आराम का तलबगार होता है। लेकिन हम उसकी इस ख़्वाहिश को नज़रअंदाज़ कर अपने काम पूरा करते रहते हैं। क़ुदरती निज़ाम के मुताबिक़ जब हमारा शरीर सोना चाहता है हम उसे सोने नहीं देते। जब हम सोना चाहते हैं तो शरीर उसके लिए तैयार नहीं होता।
नींद के लिए हम तरह तरह के उपाय करते हैं। महंगे-महंगे गद्दे ख़रीदते हैं। घर में ऐसा माहौल तैयार करते हैं, जिसमें हमें तुरंत नींद आ जाए। लेकिन, अफ़सोस कि ऐसा हो नहीं पाता। रौशनी के लिए घर में लगाई जाने वाली लाइट भी इसके लिए बहुत हद तक ज़िम्मेदार होती हैं। इसके अलावा नीले रंग की एलईडी स्क्रीन भी हमारी नींद पर ब्रेक लगाती है। मेलाटोनिन नाम का हार्मोन हमारे शरीर को नींद का सिग्नल देता है। लेकिन ये नीली रोशनी उसे अपना काम करने से रोकती है।
कई बार सामाजिक दबाव भी हमारी नींद पर असर डालता है। अब आप सोच रहे होंगे वो कैसे? हमारे सामने बड़े कामयाब लोगों की मिसालें पेश की जाती है। जैसे कि बार-बार ये बताया जाता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सिर्फ़ चार-पांच घंटे की नींद लेते हैं। यही बात डोनल्ड ट्रंप, बराक ओबामा और दूसरे बड़े नेताओं के बारे में भी कही जाती है।
बॉलीवुड स्टार शाहरूख़ ख़ान का कहना है कि वो सिर्फ़ चार घंटे ही सोते हैं। कामयाब होने के लिए उन्हें ज़्यादा मेहनत करनी पड़ती है। लिहाज़ा हमारे ऊपर भी ये दबाव बन जाता है कि हम ज़्यादा से ज़्यादा काम करें। इस चक्कर में हम पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश की मिसाल को दरकिनार कर देते हैं। बुश रोज़ाना नौ घंटे की नींद लेकर भी अमरीका के राष्ट्रपति बन ही गए न! तो, क्या हम उनके नक़शे क़दम पर नहीं चल सकते।
क़रीब दस हज़ार रिसर्च पेपर ये साबित कर चुके हैं कि जो लोग छह घंटे या उससे कम की नींद लेते हैं, वो अपनी सेहत के साथ खिलवाड़ करते हैं। प्रोफ़ेसर मैट वॉकर के मुताबिक अलज़ाइमर, कैंसर, मोटापा, शुगर की बीमारी और हर वक़्त तनाव रहना कम नींद लेने की वजह से भी होते हैं।
यहां तक कि कई बार नींद की कमी ख़ुदकशी जैसे भयानक ख़्याल को भी ज़हन में जगह देती है। इससे पहले कि आप भी ऐसे किसी ख़्याल से दो चार हों, अपनी आदतें बदल लीजिए। सही वक़्त पर खाना खाएं। वक़्त पर सोएं। याद रखें, नींद एक बहुत बड़ी नेमत है। इसकी क़ीमत वही बता सकता है जो इस नेमत से महरूम है।
नींद के लिए हम तरह तरह के उपाय करते हैं। महंगे-महंगे गद्दे ख़रीदते हैं। घर में ऐसा माहौल तैयार करते हैं, जिसमें हमें तुरंत नींद आ जाए। लेकिन, अफ़सोस कि ऐसा हो नहीं पाता। रौशनी के लिए घर में लगाई जाने वाली लाइट भी इसके लिए बहुत हद तक ज़िम्मेदार होती हैं। इसके अलावा नीले रंग की एलईडी स्क्रीन भी हमारी नींद पर ब्रेक लगाती है। मेलाटोनिन नाम का हार्मोन हमारे शरीर को नींद का सिग्नल देता है। लेकिन ये नीली रोशनी उसे अपना काम करने से रोकती है।
कई बार सामाजिक दबाव भी हमारी नींद पर असर डालता है। अब आप सोच रहे होंगे वो कैसे? हमारे सामने बड़े कामयाब लोगों की मिसालें पेश की जाती है। जैसे कि बार-बार ये बताया जाता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सिर्फ़ चार-पांच घंटे की नींद लेते हैं। यही बात डोनल्ड ट्रंप, बराक ओबामा और दूसरे बड़े नेताओं के बारे में भी कही जाती है।
बॉलीवुड स्टार शाहरूख़ ख़ान का कहना है कि वो सिर्फ़ चार घंटे ही सोते हैं। कामयाब होने के लिए उन्हें ज़्यादा मेहनत करनी पड़ती है। लिहाज़ा हमारे ऊपर भी ये दबाव बन जाता है कि हम ज़्यादा से ज़्यादा काम करें। इस चक्कर में हम पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश की मिसाल को दरकिनार कर देते हैं। बुश रोज़ाना नौ घंटे की नींद लेकर भी अमरीका के राष्ट्रपति बन ही गए न! तो, क्या हम उनके नक़शे क़दम पर नहीं चल सकते।
क़रीब दस हज़ार रिसर्च पेपर ये साबित कर चुके हैं कि जो लोग छह घंटे या उससे कम की नींद लेते हैं, वो अपनी सेहत के साथ खिलवाड़ करते हैं। प्रोफ़ेसर मैट वॉकर के मुताबिक अलज़ाइमर, कैंसर, मोटापा, शुगर की बीमारी और हर वक़्त तनाव रहना कम नींद लेने की वजह से भी होते हैं।
यहां तक कि कई बार नींद की कमी ख़ुदकशी जैसे भयानक ख़्याल को भी ज़हन में जगह देती है। इससे पहले कि आप भी ऐसे किसी ख़्याल से दो चार हों, अपनी आदतें बदल लीजिए। सही वक़्त पर खाना खाएं। वक़्त पर सोएं। याद रखें, नींद एक बहुत बड़ी नेमत है। इसकी क़ीमत वही बता सकता है जो इस नेमत से महरूम है।