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श्रीलंका में गोटाबाया राजपक्षे के राष्ट्रपति चुने जाने से मुसलमान क्यों चिंतित हैं?

Tue, 19 Nov 2019 05:01 PM IST
आसिम खान वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला Published by: आसिम खान Updated Tue, 19 Nov 2019 05:01 PM IST
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Why are Muslims worried about Gotabhaya Rajapaksa being elected President in Sri Lanka
गोटाबाया राजपक्षे - फोटो : ANI

यह एक परिवार का मामला रहा है। गोटाबाया राजपक्षे के भाई और पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे 10 सालों तक यहां रहे और ऐसा अनुमान है कि वह अगले प्रधानमंत्री बन सकते हैं। दोनों भाई पोस्टर्स और बैनर्स में एक साथ नजर आते हैं। राजपक्षे के लिए अभियान चलाने वाले वकीलों के एक समूह में शामिल सगाला अभयाविक्रमे कहती हैं, "ये हमारी जीत का दिन है। मैंने इसके लिए चार साल से अधिक समय तक काम किया है।" वो साफतौर पर कहती हैं कि गोटाबाया ही ऐसे व्यक्ति हैं जो चीजें ठीक कर सकते हैं। "हमने उन्हें रक्षा मंत्री के तौर पर देखा है, उन्होंने 30 साल तक चलने वाले युद्ध को खत्म किया।"

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सगाला अभयाविक्रमे 10 साल पहले एलटीटीई को हराने की लड़ाई का श्रेय भी राजपक्षे टीम को देती हैं। वो कहती हैं कि अगर गोटाबाया राजपक्षे होते तो ईस्टर हमला नहीं होता। राजपक्षे की एक दूसरी समर्थक जनाका अरुणाशंथा कहती हैं, "मुझे लगता है कि यह श्रीलंका के इतिहास में एक ऐतिहासिक मोड़ है।" "अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा पर मेरा मानना है कि अगले पांच सालों में देश हर मामले में बेहतर होगा। हमारी उनसे बहुत सारी उम्मीदें हैं।"
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सात महीने पहले इस्लामी चरमपंथियों द्वारा किए गए सिलसिलेवार बम धमाकों से श्रीलंका अभी भी दहला हुआ है। इन हमलों ने उसकी अर्थव्यवस्था को ही नहीं बल्कि इस द्वीप के नाजुक सांप्रदायिक संबंधों को भी तहस-नहस कर दिया था। इस घटना ने सरकार में जनता के विश्वास में अंतिम कील का काम किया। हालांकि, गोटाबाया राजपक्षे के जीतने की खबर इस देश के अल्पसंख्यक समुदाय के लिए बेचैनी भरी रही होगी जिन्होंने उनके प्रतिद्वंद्वी सजीता प्रेमदासा को वोट दिया था।
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श्रीलंका का मुस्लिम समुदाय सजीता प्रेमदासा को अधिक उदार मानते हैं। श्रीलंका का उत्तरी इलाका जो तमिल बहुसंख्यक है, वहां प्रेमदासा को वोट मिले हैं। विभिन्न समुदायों को एकजुट रखना और युद्ध के बाद मेल-मिलाप की कोशिश करना एक कठिन काम होगा। बीते सात महीनों में कई मुसलमानों का कहना है कि कट्टरपंथी बौद्ध समुदायों ने हाल के सालों में उनके खिलाफ अभियान चलाया है जो अब खुलकर दिखाई दे रहा है।

मुसलमानों का कहना है कि उनकी दुकानों और व्यवसायों का बहिष्कार किया जा रहा है और सड़कों पर खुलेआम उन्हें अपमानित किया जाता है, उनके बच्चों को स्कूलों में खास नामों से बुलाया जाता है। बहुत से लोग सरेआम बोलने से घबराते हैं लेकिन वो विश्वास से कहते हैं कि वो राजपक्षे की जीत से डरे हैं। राजपक्षे बहुसंख्यक बौद्ध समुदायों के हितों को बढ़ावा देते नजर आए हैं। साथ ही उनके आलोचक उन पर मुस्लिम विरोधी चरमपंथियों को बचाने का आरोप लगाते हैं।

एक मुस्लिम महिला ने अपनी चिंता जाहिर की। मुसलमानों की इस बेचैनी को मैंने चुनाव के दौरान लगातार महसूस किया है। वो महिला कहती हैं, "गोटाबाया राजपक्षे अगर जीतते हैं तो मैं हिंसा और नस्लवाद देखूंगी। कई नस्लवादी समूह इस पार्टी के साथ जुड़े हुए हैं।" रविवार को जब चुनावी नतीजे आए तो राजधानी कोलंबो की सड़कें सुनसान और शांत थीं। अधिकारियों ने प्रदर्शनों और लोगों के इकट्ठा होने पर प्रतिबंध लगाया हुआ था। नेता शांति की अपील कर रहे थे।


साथ ही राजपक्षे भी एकता बनाए रखने का वादा कर चुके हैं। यह प्रतिक्रिया उस डर के बाद आई है जो अल्पसंख्यक समुदायों ने बताया है। उनका कहना है कि नागरिक स्वतंत्रता की कीमत पर सुरक्षा को लेकर कड़ी कार्रवाई की जाएगी। भले ही राजनीतिक इरादा वास्तविक हो लेकिन चुनावी परिणामों ने दिखाया है कि यह देश कितना ध्रुवीकृत है। इसलिए एकता हासिल करना कठिन दिखता है।

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