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US: रूस-यूक्रेन युद्ध पर क्या असर डालेगी ट्रंप की जीत, पश्चिम एशिया और चीन के साथ कैसे होंगे रिश्ते? जानें

Thu, 07 Nov 2024 12:59 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वॉशिंगटन
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वॉशिंगटन Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Thu, 07 Nov 2024 12:59 PM IST
सार

माना जा रहा है कि अमेरिका के राष्ट्रपति के तौर पर डोनाल्ड ट्रंप रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध रुकवाने के वादे पर टिके रहेंगे। वहीं, इस्राइल के संघर्षों पर उनका रुख पूरी तरह अलग हो सकता है।

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What Trump’s victory means for Ukraine, Middle East, China and rest of world news and updates
शी जिनपिंग, डोनाल्ड ट्रंप और व्लादिमीर पुतिन। - फोटो : ANI

विस्तार

अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में जीत का असर अब इस देश की विदेश नीति पर दिखने की भी संभावना है। खासकर जनवरी 2025 से, जब डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति पद की शपथ ले लेंगे। इस बीच कई हलकों में चर्चा है कि आखिर रूस-यूक्रेन युद्ध को रुकवाने का दावा करने वाले ट्रंप अब राष्ट्रपति बनने के बाद क्या करेंगे। इसके अलावा इस्राइल-हमास और इस्राइल-हिजबुल्ला संघर्ष रोकने में उनकी क्या भूमिका होगी। लोगों के मन में यह भी सवाल हैं कि चीन के लिए ट्रंप का क्या रुख होगा।
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1. रूस-यूक्रेन युद्ध पर
माना जा रहा है कि अमेरिका के राष्ट्रपति के तौर पर डोनाल्ड ट्रंप रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध रुकवाने के वादे पर टिके रहेंगे। वह इसके लिए दोनों देशों को उन्हीं जगहों पर रुकने का प्रस्ताव दे सकते हैं, जहां उनकी सेनाएं अभी मौजूद हैं। हालांकि, ट्रंप की इस कोशिश से रूस को यूक्रेन के क्षेत्र में कब्जा करने में मदद मिलेगी, क्योंकि रूसी सेना फरवरी 2022 में हमले के बाद से अब तक यूक्रेन का काफी इलाका घेर चुकी है। इतना ही नहीं ट्रंप रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की उस मांग को भी मान सकते हैं, जिससे यूक्रेन को नाटो की सदस्यता नही मिलेगी। 
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2. पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष पर
दूसरी तरफ पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष को लेकर ट्रंप का रुख रूस-यूक्रेन संघर्ष के मुकाबले पूरी तरह अलग रह सकता है। ट्रंप इस्राइल और सऊदी अरब के कट्टर समर्थक रहे हैं। ऐसे में ईरान के मामले में उनका रुख और भी कड़ा हो सकता है। 

इसके लिए वह इस्राइल की हमास और हिजबुल्ला के खिलाफ जंग का भी समर्थन कर सकते हैं। दरअसल, हमास और हिजबुल्ला दोनों को ही ईरान का प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से समर्थन जारी रहा है। इसके अलावा यमन में हूती भी ईरानी समर्थन से काफी बढ़े हैं। ऐसे में ट्रंप पश्चिम एशिया में ईरान समर्थित संगठनों के खिलाफ संघर्ष का समर्थन कर सकते हैं। 

इतना ही नहीं इस्राइल का समर्थन ट्रंप को रूस के खिलाफ भी अहम बढ़त दिला सकता है। दरअसल, यूक्रेन के खिलाफ जंग में रूस को बड़े स्तर पर ईरानी हथियारों पर निर्भर होना पड़ रहा है। ऐसे में इस्राइल को मजबूत करने से ईरान कमजोर पड़ेगा और इसका असर रूस की हथियारों की आपूर्ति पर भी पड़ेगा। ऐसे में ट्रंप रूस-यूक्रेन युद्ध में भी इस्राइल के युद्ध को रुकवाने का इस्तेमाल कर सकते हैं।

जहां यूक्रेन और पश्चिम एशिया में स्थितियों को लेकर अब अमेरिकी नीति में बदलाव होगा, वहीं चीन के मुद्दे पर ट्रंप अपनी पुरानी नीति ही अपना सकते हैं। इससे पहले बाइडन सरकार ने भी ट्रंप के पहले कार्यकाल की नीतियों के जरिए चीन के मुद्दे को संभाला। यानी चीन के मामले में अमेरिकी रुख में बदलाव मुश्किल है। इतना ही नहीं चीन के मामले में आगे और सख्त हो सकते हैं और अमेरिकी हितों की रक्षा के लिए चीन पर आयात शुल्क बढ़ा सकते हैं। 

इसके अलावा चीन के साथ टकराव के दौरान वे ताइवान के मुद्दे पर भी मुखर हो सकते हैं। दरअसल, अपनी अमेरिका फर्स्ट नीति के तहत ट्रंप किसी भी देश की सुरक्षा के लिए खुद से आगे न आने की बात कहते रहे हैं। ऐसे में चीन से कुछ ही दूरी पर स्थित ताइवान के लिए ट्रंप का रवैया मुश्किलें पैदा कर सकता है। ट्रंप अपनी नीतियों के तहत एशिया में अमेरिका के पारंपरिक साथियों- फिलीपींस, दक्षिण कोरिया और जापान से संधि करने और इसके बाद ही उन्हें सुरक्षा गारंटी देने का वादा कर सकते हैं।
 
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इसी तरह उत्तर कोरिया का मामला देखा जाए तो ट्रंप अपने पुराने कार्यकाल की नीति पर ही चल सकते हैं। पहली बार राष्ट्रपति बनने के बाद ट्रंप ने कई बार उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया के बीच विवाद खत्म कराने के लिए किम जोंग-उन के साथ बैठक भी की। माना जाता है कि उत्तर कोरिया के बर्ताव में अनिश्चितता की वजह से आने वाले समय में ट्रंप को भी उसको साथ लाने में दिक्कत हो सकती है। 

खासकर उत्तर कोरिया को परमाणु हथियारों के मामले में बातचीत की मेज पर लाना कठिन काम होगा। हालांकि, अगर ट्रंप रूस-यूक्रेन युद्ध को खत्म करवाने और पुतिन के साथ बेहतर रिश्ते स्थापित करते हैं तो तानाशाह किम जोंग-उन के साथ उनकी बातचीत का रास्ता आसान हो सकता है, क्योंकि रूस और उत्तर कोरिया के बीच संबंध काफी अच्छे हैं। 

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