{"_id":"69ca967763f05db37a09729b","slug":"west-asia-crisis-iran-raises-global-concerns-seeks-to-pressure-america-to-its-knees-2026-03-30","type":"story","status":"publish","title_hn":"पश्चिम एशिया संकट: ईरान ने बढ़ाई दुनिया की चिंता, अमेरिका को दबाव में लाकर घुटने पर लाने की रणनीति","category":{"title":"World","title_hn":"दुनिया","slug":"world"}}
पश्चिम एशिया संकट: ईरान ने बढ़ाई दुनिया की चिंता, अमेरिका को दबाव में लाकर घुटने पर लाने की रणनीति
विज्ञापन
पश्चिम एशिया संकट
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक
पश्चिम एशिया का संकट लगातार नए और खतरनाक मोड़ पर जा रहा है। सामरिक और रणनीतिक मामलों के भारतीय विशेषज्ञों के माथे पर चिंता की लकीरें हैं। अमेरिका और इस्राइल की ईरान में सैन्य कमांडो भेजकर सैन्य अभियान चलाने की तैयारी से दुनिया वैश्विक भू-आर्थिक भंवर में फंस सकती है। जानिए ऐसा हुआ तो आगे क्या?
हाइड्रोकार्बन मामलों के विशेषज्ञ एके जैन कहते हैं कि सवाल केवल पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस का नहीं है। समस्या इससे भी कहीं अधिक बड़ी है। खाड़ी देशों में भारत के थोड़े बहुत लोग नहीं रहते। इससे बड़ी बात है कि कारोबार, व्यापार के रास्ते बंद हैं। दुनिया केवल युद्ध लड़ रही है। इसका असर महाराष्ट्र के अलफांसो आम, भारत के बासमती चावल से लेकर सभी पर पड़ रहा है। फार्मा से लेकर कपड़ा, इस्पात, एल्यूमीनियम, प्लास्टिक समेत सभी उद्योगों पर इसका असर पड़ना शुरू हो चुका है। एके जैन कहते हैं कि इस दुनिया में करोड़ों लोगों के सामने पेट की भूख मिटाने का संकट खड़ा हो रहा है। लाखों लोग जान की सुरक्षा के लिए पलायन कर रहे हैं।
ईरान दबा रहा है भू-आर्थिक संकट की नस
पूर्व विदेश सचिव शशांक पश्चिम एशिया में बढ़ रहे संकट को अच्छा नहीं मानते। वायु सेना के पूर्व एयर वाइस मार्शल एनबी सिंह कहते हैं कि ईरान ने भी तेजी से अपना लक्ष्य बदला है। अमेरिका को अपने कई अभियान से पीछे हटना पड़ा है। अमेरिका के राष्ट्रपति पहले ईरान में सत्ता परिवर्तन का एजेंडा लेकर चल रहे थे। अमेरिका और इस्राइल ने ईरान के शीर्ष नेतृत्व को खत्म कर दिया। अच्छा खासा इंतजार किया, लेकिन युद्ध के 30 दिन बीतने के बाद भी ईरान में हिंसक या फिर विरोध प्रदर्शन नहीं हुआ। वहां के रणनीतिकारों ने इस पर काबू पा रखा है। बदले में ईरान ने अमेरिका पर दबाव बढ़ाने के लिए पहले अपनी मारक ताकत दिखाई। इस्राइल के भीतर हमले किए। अमेरिका को अपनी रणनीतिक, तकनीकी, मारक क्षमता का संदेश दिया। इसके बाद अमेरिका के सैन्य अड्डों को इराक, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, कतर में निशाना बनाना शुरू किया। अमेरिका के अत्याधुनिक लड़ाकू विमान एफ-35 लाइटेनिंग, एफ-16 फाल्कान, अवाक्स समेत अन्य को निशाना बनाया। अब ईरान यहां से भी लक्ष्य बदल रहा है। उसने होर्मुज जडमरूमध्य को बंद कर दिया। विदेश मामलों के जानकार रंजीत कुमार कहते हैं कि थोड़ा पहले चले जाइए। पिछले साल तक इस्राइल से हिज्बुल्ला लड़ रहा था। हूती विद्रोही फलस्तीन के समर्थन में इस्राइल पर हमला बोल रहे थे। हमास हमला बोल रहा था। धीरे-धीरे सब रणनीतिक रूप से शांत होते चले गए। रंजीत कुमार कहते हैं कि 28 फरवरी 2026 को अमेरिका-इस्राइल के संयुक्त हमले के बाद ईरान ने प्रतिक्रिया दी। अब उसकी रणनीति के तहत हिजबुल्ला, हूती संगठन आगे आ रहे हैं।
विज्ञापन
ईरान का ध्यान इस्राइल के बजाय अमेरिका पर है
विदेश सेवा के पूर्व अधिकारी एसके शर्मा का कहना है कि ईरान के निशाने पर इस समय इस्राइल से ज्यादा अमेरिका है। उसके रणनीतिकार लगातार अमेरिका पर दबाव बना रहे हैं। सुप्रीम नेता मोजतबा खामेनेई समेत अन्य अमेरिका को वियतनाम की याद दिला रहे हैं। उन्हें पता है कि इस्राइल अमेरिका के आर्थिक समेत अन्य मोर्चे का नियंत्रण करता है। इसलिए अमेरिका को पीछे धकेलना जरूरी है। शर्मा कहते हैं कि ईरान को अमेरिका के पीछे धकेलने के बाद इस्राइल के साथ निपटने में अधिक मुश्किल नहीं आएगी। क्योंकि इस्राइल की अमेरिका रीढ़ है। ऐसा लग रहा है कि ईरान अब इस्राइल को उलझाने के लिए हिज्बुल्ला और हूती संगठन का अधिक इस्तेमाल कर रहा है। पश्चिम एशिया मामलों पर नजर रख रहे पूर्व सैन्य अधिकारी एनबी सिंह का कहना है कि इस्राइल के पास हवाई हमलों से बचने के संसाधन घट रहे हैं। इसलिए इस्राइल चुनिंदा हमलों को रोकने पर फोकस कर रहा है।
कितना सफल हो पाएगा अमेरिका और इस्राइल का जमीनी सैन्य अभियान
रक्षा मामलों के विशेषज्ञ इसको लेकर बहुत आश्वस्त नहीं है। उनका कहना है कि ईरान में वहां की सत्ता के खिलाफ जब तक जन विद्रोह नहीं उभरता, अमेरिका और इस्राइल के लिए काफी मुश्किल होगी। ईरान के पास लड़ने, शहादत के लिए तैयार रहने वाले योद्धा हैं। ईरान की भौगोलिक स्थिति भी उनके अनुकूल है और वह जमीनी मुकाबले की तेजी से तैयारी कर रहे हैं। इस्राइल की सेना (आईडीएफ) ने लेबनान में मोर्चा खोल रखा है। दुनिया के देशों की आर्थिक चिंता बढ़ाने के लिए हूती लड़ाके लाल सागर बाधित कर सकते हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य के लिए ईरान तैयारी कर चुका है। दूसरा, ईरान सीरिया, लीबिया, इराक नहीं है। न ही वह अफगानिस्तान है, जिसके तालिबानी लड़ाकों के पास लड़ने के सीमित हथियार थे। यहां अमेरिका और इस्राइल के जमीनी अभियान में संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) जैसे देश भी खुलकर नहीं आ रहे हैं। अमेरिका को चाहकर भी नाटो समेत अन्य का सैन्य समर्थन नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में लड़ाई लंबी खिंच सकती है। काफी खर्चीली हो सकती है। यही कारण है कि राष्ट्रपति ट्रंप और उनके योजनाकार ईरान को डराकर बातचीत की मेज पर लाना चाहते हैं। रंजीत कुमार कहते हैं कि ईरान के पास ऐसा अवसर अब नहीं आने वाला है। इसलिए इतनी कुर्बानी देने के बाद वह सम्मान के साथ ही युद्ध की समाप्ति पर अड़ा है। उसे भी लग रहा है कि जब अमेरिकी सैनिकों की शहादत बढ़ेगी तो बात उसके पक्ष में आ जाएगी।
क्या होगा आगे?
पश्चिम एशिया में मिस्र एक अच्छा, भरोसेमंद वार्ताकार है। तुर्किये के राष्ट्रपति ने अपनी भूमिका को ईरान के संतुलन बनाने की दिशा में बढ़ाया है। दोनों देशों के ईरान के सुप्रीम नेता से अच्छे संबंध हैं। सऊदी अरब और कतर पर ईरान उतना भरोसा नहीं कर पा रहा है। ईरान के मुख्य सहयोगी के रूप में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के शी जिनपिंग हैं। ईरान को भरोसा है कि संकट के समय ये दोनों अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ईरान का साथ देंगे। अमेरिका इसे समझता है। राष्ट्रपति ट्रंप के रणनीतिकार इस विंडो को खुला रखकर चल रहे हैं। दूसरी तरफ, राष्ट्रपति ट्रंप के दामाद जरेड कुशनर, सलाकार स्टीव विटकॉफ जैसे लोग हैं। मजबूत इस्राइली लॉबी है। इसे इस्राइल का भविष्य महत्वपूर्ण लग रहा है। उसे अकेला नहीं छोड़ा जा सकता। ऐसे में बातचीत का कोई सकारात्मक रास्ता न निकलने पर युद्ध का खतरनाक मोड़ पर जाना तय है। सामरिक विशेषज्ञों का मानना है कि जमीनी सैन्य अभियान, समुद्री कमांडो अभियान शुरू होने के बाद शांति वार्ता को एक बार बड़ा झटका लग सकता है। इसके शुरू होने के बाद शांति के प्रयास पर लौटना मुश्किल हो सकता है। अभियान लंबा चल सकता है। इसका असर पूरी दुनिया को बड़ी आर्थिक मंदी में झोंक सकता है।
विज्ञापन
हाइड्रोकार्बन मामलों के विशेषज्ञ एके जैन कहते हैं कि सवाल केवल पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस का नहीं है। समस्या इससे भी कहीं अधिक बड़ी है। खाड़ी देशों में भारत के थोड़े बहुत लोग नहीं रहते। इससे बड़ी बात है कि कारोबार, व्यापार के रास्ते बंद हैं। दुनिया केवल युद्ध लड़ रही है। इसका असर महाराष्ट्र के अलफांसो आम, भारत के बासमती चावल से लेकर सभी पर पड़ रहा है। फार्मा से लेकर कपड़ा, इस्पात, एल्यूमीनियम, प्लास्टिक समेत सभी उद्योगों पर इसका असर पड़ना शुरू हो चुका है। एके जैन कहते हैं कि इस दुनिया में करोड़ों लोगों के सामने पेट की भूख मिटाने का संकट खड़ा हो रहा है। लाखों लोग जान की सुरक्षा के लिए पलायन कर रहे हैं।
विज्ञापन
ईरान दबा रहा है भू-आर्थिक संकट की नस
पूर्व विदेश सचिव शशांक पश्चिम एशिया में बढ़ रहे संकट को अच्छा नहीं मानते। वायु सेना के पूर्व एयर वाइस मार्शल एनबी सिंह कहते हैं कि ईरान ने भी तेजी से अपना लक्ष्य बदला है। अमेरिका को अपने कई अभियान से पीछे हटना पड़ा है। अमेरिका के राष्ट्रपति पहले ईरान में सत्ता परिवर्तन का एजेंडा लेकर चल रहे थे। अमेरिका और इस्राइल ने ईरान के शीर्ष नेतृत्व को खत्म कर दिया। अच्छा खासा इंतजार किया, लेकिन युद्ध के 30 दिन बीतने के बाद भी ईरान में हिंसक या फिर विरोध प्रदर्शन नहीं हुआ। वहां के रणनीतिकारों ने इस पर काबू पा रखा है। बदले में ईरान ने अमेरिका पर दबाव बढ़ाने के लिए पहले अपनी मारक ताकत दिखाई। इस्राइल के भीतर हमले किए। अमेरिका को अपनी रणनीतिक, तकनीकी, मारक क्षमता का संदेश दिया। इसके बाद अमेरिका के सैन्य अड्डों को इराक, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, कतर में निशाना बनाना शुरू किया। अमेरिका के अत्याधुनिक लड़ाकू विमान एफ-35 लाइटेनिंग, एफ-16 फाल्कान, अवाक्स समेत अन्य को निशाना बनाया। अब ईरान यहां से भी लक्ष्य बदल रहा है। उसने होर्मुज जडमरूमध्य को बंद कर दिया। विदेश मामलों के जानकार रंजीत कुमार कहते हैं कि थोड़ा पहले चले जाइए। पिछले साल तक इस्राइल से हिज्बुल्ला लड़ रहा था। हूती विद्रोही फलस्तीन के समर्थन में इस्राइल पर हमला बोल रहे थे। हमास हमला बोल रहा था। धीरे-धीरे सब रणनीतिक रूप से शांत होते चले गए। रंजीत कुमार कहते हैं कि 28 फरवरी 2026 को अमेरिका-इस्राइल के संयुक्त हमले के बाद ईरान ने प्रतिक्रिया दी। अब उसकी रणनीति के तहत हिजबुल्ला, हूती संगठन आगे आ रहे हैं।
विज्ञापन
ईरान का ध्यान इस्राइल के बजाय अमेरिका पर है
विदेश सेवा के पूर्व अधिकारी एसके शर्मा का कहना है कि ईरान के निशाने पर इस समय इस्राइल से ज्यादा अमेरिका है। उसके रणनीतिकार लगातार अमेरिका पर दबाव बना रहे हैं। सुप्रीम नेता मोजतबा खामेनेई समेत अन्य अमेरिका को वियतनाम की याद दिला रहे हैं। उन्हें पता है कि इस्राइल अमेरिका के आर्थिक समेत अन्य मोर्चे का नियंत्रण करता है। इसलिए अमेरिका को पीछे धकेलना जरूरी है। शर्मा कहते हैं कि ईरान को अमेरिका के पीछे धकेलने के बाद इस्राइल के साथ निपटने में अधिक मुश्किल नहीं आएगी। क्योंकि इस्राइल की अमेरिका रीढ़ है। ऐसा लग रहा है कि ईरान अब इस्राइल को उलझाने के लिए हिज्बुल्ला और हूती संगठन का अधिक इस्तेमाल कर रहा है। पश्चिम एशिया मामलों पर नजर रख रहे पूर्व सैन्य अधिकारी एनबी सिंह का कहना है कि इस्राइल के पास हवाई हमलों से बचने के संसाधन घट रहे हैं। इसलिए इस्राइल चुनिंदा हमलों को रोकने पर फोकस कर रहा है।
कितना सफल हो पाएगा अमेरिका और इस्राइल का जमीनी सैन्य अभियान
रक्षा मामलों के विशेषज्ञ इसको लेकर बहुत आश्वस्त नहीं है। उनका कहना है कि ईरान में वहां की सत्ता के खिलाफ जब तक जन विद्रोह नहीं उभरता, अमेरिका और इस्राइल के लिए काफी मुश्किल होगी। ईरान के पास लड़ने, शहादत के लिए तैयार रहने वाले योद्धा हैं। ईरान की भौगोलिक स्थिति भी उनके अनुकूल है और वह जमीनी मुकाबले की तेजी से तैयारी कर रहे हैं। इस्राइल की सेना (आईडीएफ) ने लेबनान में मोर्चा खोल रखा है। दुनिया के देशों की आर्थिक चिंता बढ़ाने के लिए हूती लड़ाके लाल सागर बाधित कर सकते हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य के लिए ईरान तैयारी कर चुका है। दूसरा, ईरान सीरिया, लीबिया, इराक नहीं है। न ही वह अफगानिस्तान है, जिसके तालिबानी लड़ाकों के पास लड़ने के सीमित हथियार थे। यहां अमेरिका और इस्राइल के जमीनी अभियान में संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) जैसे देश भी खुलकर नहीं आ रहे हैं। अमेरिका को चाहकर भी नाटो समेत अन्य का सैन्य समर्थन नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में लड़ाई लंबी खिंच सकती है। काफी खर्चीली हो सकती है। यही कारण है कि राष्ट्रपति ट्रंप और उनके योजनाकार ईरान को डराकर बातचीत की मेज पर लाना चाहते हैं। रंजीत कुमार कहते हैं कि ईरान के पास ऐसा अवसर अब नहीं आने वाला है। इसलिए इतनी कुर्बानी देने के बाद वह सम्मान के साथ ही युद्ध की समाप्ति पर अड़ा है। उसे भी लग रहा है कि जब अमेरिकी सैनिकों की शहादत बढ़ेगी तो बात उसके पक्ष में आ जाएगी।
क्या होगा आगे?
पश्चिम एशिया में मिस्र एक अच्छा, भरोसेमंद वार्ताकार है। तुर्किये के राष्ट्रपति ने अपनी भूमिका को ईरान के संतुलन बनाने की दिशा में बढ़ाया है। दोनों देशों के ईरान के सुप्रीम नेता से अच्छे संबंध हैं। सऊदी अरब और कतर पर ईरान उतना भरोसा नहीं कर पा रहा है। ईरान के मुख्य सहयोगी के रूप में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के शी जिनपिंग हैं। ईरान को भरोसा है कि संकट के समय ये दोनों अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ईरान का साथ देंगे। अमेरिका इसे समझता है। राष्ट्रपति ट्रंप के रणनीतिकार इस विंडो को खुला रखकर चल रहे हैं। दूसरी तरफ, राष्ट्रपति ट्रंप के दामाद जरेड कुशनर, सलाकार स्टीव विटकॉफ जैसे लोग हैं। मजबूत इस्राइली लॉबी है। इसे इस्राइल का भविष्य महत्वपूर्ण लग रहा है। उसे अकेला नहीं छोड़ा जा सकता। ऐसे में बातचीत का कोई सकारात्मक रास्ता न निकलने पर युद्ध का खतरनाक मोड़ पर जाना तय है। सामरिक विशेषज्ञों का मानना है कि जमीनी सैन्य अभियान, समुद्री कमांडो अभियान शुरू होने के बाद शांति वार्ता को एक बार बड़ा झटका लग सकता है। इसके शुरू होने के बाद शांति के प्रयास पर लौटना मुश्किल हो सकता है। अभियान लंबा चल सकता है। इसका असर पूरी दुनिया को बड़ी आर्थिक मंदी में झोंक सकता है।