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महामारी के बीच दुनिया में छिड़ रहा है ‘वैक्सीन युद्ध’, टीकों की साख पर हो रहे हैं हमले!

Tue, 19 Jan 2021 02:23 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, लंदन
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, लंदन Published by: Harendra Chaudhary Updated Tue, 19 Jan 2021 02:23 PM IST
सार

चीनी मीडिया ने ऐसे सवालों को चीन के खिलाफ पश्चिमी देशों में बने माहौल से जोड़ कर देखा है। वहां छपी रिपोर्टों में कहा गया है कि पश्चिमी देशों ने जानबूझ कर चीनी टीके की छवि को नुकसान पहुंचाने की मुहिम छेड़ दी है...

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vaccine war is spreading in the world, china and US attacked on each other corona vaccines reputation
Coronavirus Vaccine - फोटो : PTI (File Photo)

विस्तार

वैक्सीन राष्ट्रवाद और वैक्सीन कूटनीति के बाद अब ऐसा लगता है कि दुनिया में ‘वैक्सीन युद्ध’ छिड़ रहा है। अमेरिका और चीन ने एक दूसरे के यहां तैयार हुई कोरोना वायरस वैक्सीन की साख पर हमले शुरू कर दिए हैं। चीन के सरकारी मीडिया ने फाइजर कंपनी की वैक्सीन लेने के बाद नॉर्वे में हुई 23 मौतों का हवाला देते हुए ये दावा किया कि यह टीका बुजुर्गों के लिए सुरक्षित नहीं है। अब अमेरिकी मीडिया में चीन में तैयार साइनोवॉक कंपनी की वैक्सीन की साख को लेकर प्रतिकूल रिपोर्टें छपी हैं।

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इसी बीच विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चेतावनी दी है कि सबसे पहले वैक्सीन हड़पने की मची होड़ के कारण दुनिया के गरीब और कमजोर तबकों के लोग इससे वंचित हो रहे हैं। धनी देशों में वैक्सीन सप्लाई तेज करने की होड़ लगी है, जबकि इन कमजोर समूहों के लोगों के लिए जोखिम बढ़ रहा है। सोमवार को विश्व स्वास्थ्य संगठन के महासचिव तेद्रोस अधनॉम घब्रेयसस ने कहा कि दुनिया विनाशकारी नैतिक विफलता के कगार पर है। उन्होंने कहा कि कोविड- 19 के वैक्सीन के न्यायपूर्ण वितरण की संभावना खतरे में पड़ गई है। उन्होंने दुनिया भर के देशों से अपील की कोविड-19 के वैक्सीन को वे न्यायपूर्ण ढंग से आपस में बांटें, ताकि गरीब देशों को भी यह प्राप्त हो सके।
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अभी तक की हकीकत यही है कि धनी देशों में तैयार हुए टीकों से गरीब देश वंचित हैं। ऐसे में चीन में तैयार वैक्सीन पर उनकी निर्भरता बढ़ती जा रही है। अमेरिकी टीवी चैनल सीएनएन की एक रिपोर्ट में ये बताया गया है कि टर्की और इंडोनेशिया में लाखों लोगों को चीन की कंपनी साइनोवॉक की बनाई वैक्सीन कोरोनावाक को लगाने का काम शुरू हो चुका है। टर्की के राष्ट्रपति रजिब तैयिब आर्दोआन और इंडोनेशिया के राष्ट्रपति जोको विडोडो ने खुद ये वैक्सीन लगवा कर अपने-अपने देश में टीकाकरण अभियान की शुरुआत की।
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सीएनएन का दावा है कि चीनी वैक्सीन कितनी प्रभावी है, इसको लेकर कई सवाल अभी मौजूद हैं। उसकी रिपोर्ट के मुताबिक पिछले ब्राजील में आखिर दौर के परीक्षण में जाहिर हुआ कि ये टीका सिर्फ 50.38 फीसदी ही प्रभावी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के पैमाने के मुताबिक टीका के कम से कम 78 फीसदी प्रभावी होना जरूरी है। लेकिन टर्की से मिली एक रिपोर्ट के मुताबिक वहां पिछले हफ्ते आपातकालीन इस्तेमाल के दौरान साइनोवॉक का टीका 91.25 फीसदी प्रभावी पाया गया। इंडोनेशिया में इसे 65.3 फीसदी प्रभावी देखा गया है। ब्राजील में 50.38 फीसदी प्रभावशीलता उन लोगों में पाई गई, जिन्हें कोरोना वायरस का हल्का संक्रमण हुआ था। जो लोग गंभीर रूप से संक्रमित थे, उनमें इसकी प्रभावशीलता 78 फीसदी देखी गई।

ब्रिटने में यूनिवर्सिटी ऑफ वॉरविक में वायरोलॉजिस्ट प्रोफेसर लॉरेन्स यंग ने कहा है कि प्रभावशीलता के इन आंकड़ों की तब तक व्याख्या नहीं की जा सकती, जब तक पूरा डाटासेट उपलब्ध ना कराया जाए। उन्होंने कहा कि समस्या यह है कि आंकड़े समकक्ष समीक्षा के बाद वैज्ञानिक जर्नल में प्रकाशित करने के बजाय प्रेस विज्ञप्ति के जरिए जारी किए जा रहे हैं। इससे इस बात पर रोशनी पड़ती है कि टीकों को मंजूरी देने में अलग-अलग नजरिया अपनाया गया है।

अमेरिकी मीडिया में वहां के विशेषज्ञों के हवाले से कहा गया है कि आंकड़ों में इन विसंगतियों के कारण चीन में बनी वैक्सीन से लोगों का भरोसा हिल गया है। अमेरिकी थिंक टैंक काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशन्स में सीनियर फेलॉ यानझोंग हुआंग ने सीएनएन से कहा- बहुत से देश टीके के लिए साइनोवॉक को या तो ऑर्डर दे चुके हैं, या देने की योजना बना रहे हैं। लेकिन अब इन टीकों को लगवाने की इच्छा कमजोर पड़ सकती है। लोग पूछ सकते हैं कि आखिर इन्हें लगवाने का फायदा क्या है। इससे इस टीके के प्रसार में रुकावट आ सकती है।

चीनी मीडिया ने ऐसे सवालों को चीन के खिलाफ पश्चिमी देशों में बने माहौल से जोड़ कर देखा है। वहां छपी रिपोर्टों में कहा गया है कि पश्चिमी देशों ने जानबूझ कर चीनी टीके की छवि को नुकसान पहुंचाने की मुहिम छेड़ दी है, जबकि फाइजर कंपनी के टीके से लोगों की जो मौत हुई, उन खबरों को दबा दिया गया। फाइजर-बायोएनटेक और मॉडेरना कंपनियों का दावा है कि उनका टीका 95 फीसदी प्रभावी है। रूस का दावा है कि उसका टीका स्पुतनिक 91 फीसदी तक प्रभावी है। ब्रिटेन की कंपनी एस्ट्राजेनेका के टीके को 70 फीसदी तक प्रभावी बताया गया है। चीन की कंपनी साइनोफार्म का दावा है कि उसका टीका 79.34 फीसदी तक प्रभावी है। इसके बीच साइनोवॉक के टीके को लेकर तस्वीर विवादास्पद हो गई है।


लेकिन साइनोवॉक को छह देशों की सरकारों से सप्लाई के ऑर्डर मिल चुके हैं। इसकी वजह यह है कि इसे किफायती माना गया है। अलग-अलग देशों में प्रभावशीलता के दिखे अलग-अलग नतीजों के बारे में साइनोवॉक का कहना है कि ऐसा अलग-अलग स्थितियों में हुए परीक्षण के कारण हुआ। कंपनी का दावा है कि अलग जगह, अलग आबादी और रोग की अलग दर का टीके की प्रभावशीलता पर असर पड़ता है।

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