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US Vs China: चीन की अर्थव्यवस्था को लेकर क्यों हमलावर है अमेरिका, बाइडन इसे क्यों बता रहे टाइम बम? जानें सबकुछ

Sat, 12 Aug 2023 05:01 PM IST
शिवेंद्र तिवारी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिवेंद्र तिवारी Updated Sat, 12 Aug 2023 05:01 PM IST
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सार
US Vs China: इन दिनों अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध छिड़ा हुआ है। एक ओर जहां व्हाइट हॉउस ने एक कार्यकारी आदेश के जरिए चीनी प्रौद्योगिकी में अमेरिकी निवेश को प्रतिबंधित करने की घोषणा की है। वहीं दूसरी ओर राष्ट्रपति बाइडन ने ड्रैगन की अर्थव्यवस्था की तुलना टाइम बम से कर दी है। 
 
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US Vs China: Why is America attacking Dragons economy by calling it a time bomb
चीन और अमेरिका - फोटो : AMAR UJALA

विस्तार

इन दिनों दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध छिड़ा हुआ है। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन द्वारा जारी किया गया एक कार्यकारी आदेश इसकी वजह है। अमेरिका ने यह कदम चीनी प्रौद्योगिकी में अमेरिकी निवेश को प्रतिबंधित करने के लिए उठाया है। वहीं, दूसरी ओर राष्ट्रपति जो बाइडन ने चीन की अर्थव्यवस्था की तुलना एक ऐसे टाइम बम से कर दी है जो कभी भी फट सकता है। 


हालांकि, यह पहली बार नहीं है जब दोनों देशों के आर्थिक रिश्ते खराब हुए हैं। बाइडन प्रशासन के सत्ता में आने के बाद कई फैसलों ने अमेरिका-चीन को आमने-सामने लाने का काम किया है। इस बीच जानते हैं कि आखिर अमेरिका-चीन के बीच आर्थिक मोर्चे पर क्या हो रहा है? नई आर्थिक भिड़ंत की वजह क्या है? अमेरिका के फैसले पर चीन का क्या रुख है? आदेश का असर क्या हो सकता है? बाइडन ने चीनी अर्थव्यवस्था को लेकर क्या कहा है? आइए जानते हैं...

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन।
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन। - फोटो : ANI
अमेरिका-चीन के बीच आर्थिक मोर्चे पर क्या हो रहा है? 
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर करते हुए चीनी प्रौद्योगिकी में अमेरिकी निवेश को प्रतिबंधित करने की घोषणा की है। यह प्रतिबंध सेमीकंडक्टर, क्वांटम कंप्यूटिंग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) सहित कुछ संवेदनशील हाई-टेक क्षेत्रों पर केंद्रित है।

दरअसल, बाइडन प्रशासन हाल के महीनों में सैन्य, आर्थिक और तकनीकी मोर्चों पर चीन के खिलाफ अपनी स्थिति को मजबूत करने का प्रयास कर रहा है। उन्नत तकनीकों तक चीन की पहुंच को रोकने के लिए अमेरिका द्वारा उठाया गया कदम भी इसी श्रृंखला का एक हिस्सा है। 

यह फैसला तब आया है जब बाइडन दशकों के बाद अमेरिकी विनिर्माण को पुनर्जीवित करने की अपनी योजना को बढ़ावा देने के लिए दक्षिण-पश्चिम के देशों के दौरे कर रहे हैं। ये प्रतिबंध अगले साल प्रभावी हो सकता है। 

White House
White House - फोटो : iStock
अमेरिकी आदेश में क्या-क्या है?
इस कार्यकारी आदेश का उद्देश्य चीन को अपनी घरेलू क्षमताएं बनाने में मदद करने से अमेरिकी फंड को रोकना है। इसके तहत, अमेरिकी ट्रेजरी को सेमीकंडक्टर्स और माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक्स, क्वांटम कंप्यूटिंग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता में कुछ अमेरिकी निवेशों को रोकने का निर्देश दिया गया है। आदेश में एक आउटबाउंड निवेश समीक्षा तंत्र बनाने का भी उल्लेख किया गया है।

इसमें चीन, हांगकांग और मकाऊ को 'कंट्रीज ऑफ कंसर्न' के रूप में सूचीबद्ध किया गया है। बाइडन प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा है कि भविष्य में अन्य देशों को भी जोड़ा जा सकता है। नियम भविष्य के निवेश पर लागू होंगे और अधिकारियों का कहना है कि लक्ष्य उन क्षेत्रों में निवेश को विनियमित करना है जो चीन को सैन्य और खुफिया लाभ दे सकते हैं।

xI jinping
xI jinping - फोटो : xI jinping
अमेरिकी फैसले पर चीन का रुख क्या है?
अमेरिकी प्रशासन के हालिया फैसले पर चीन ने भी प्रक्रिया दी है। अमेरिका में चीनी दूतावास के एक प्रवक्ता ने कहा कि व्हाइट हाउस ने योजना के बारे में चीन की बार-बार गहरी चिंताओं को नजरअंदाज कर दिया है। इसके साथ ही दूतावास ने चेतावनी दी कि इससे चीन में कारोबार करने वाली 70,000 से अधिक अमेरिकी कंपनियां प्रभावित होंगी, जिससे चीनी और अमेरिकी दोनों व्यवसायों को नुकसान होगा। वहीं, देश के वाणिज्य मंत्रालय ने कहा कि उसने जवाबी कदम उठाने का अधिकार सुरक्षित रखा है।

जो बाइडन और शी जिनपिंग
जो बाइडन और शी जिनपिंग - फोटो : Social Media
आदेश का असर क्या हो सकता है? 
यह आदेश अमेरिकी निवेश और विशेषज्ञता को चीन द्वारा विकसित की जा रही तकनीक के विकास में मदद से रोकता है, ताकि चीन इस संवेदनशील तकनीक का इस्तेमाल अपने सेना के आधुनिकीकरण में ना कर सके। इस आदेश के तहत अमेरिका के प्राइवेट इक्विटी, वेंचर कैपिटल, जॉइंट वेंचर और ग्रीनफील्ड निवेश चीन की संवेदनशील तकनीक से संबंधी कंपनियों निवेश नहीं कर पाएंगे। 

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने कांग्रेस को लिखे एक पत्र में बताया कि चीन जैसे देशों में संवेदनशील तकनीक और उसके उत्पादों के विकास को रोकने के लिए राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा कर रहे हैं। ये तकनीकें अहम सैन्य, खूफिया सर्विलांस और साइबर क्षमताओं से जुड़ी हैं। 

इस बीच अमेरिकी सांसद चक शूमर ने कहा कि लंबे समय से चीनी सेना, अमेरिकी पैसे से मजबूत हो रही है। अब अमेरिका ने चीनी सेना के आधुनिकीकरण में अमेरिकी पैसे के निवेश को रोकने के लिए पहला रणनीतिक कदम उठाया है। 

शी जिनपिंग, जो बाइडन
शी जिनपिंग, जो बाइडन - फोटो : अमर उजाला
बाइडन ने चीनी अर्थव्यवस्था को लेकर क्या कहा है?
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन गुरुवार को कहा कि चीन की अर्थव्यवस्था एक टाइम बम जैसी है, जिसमें कभी भी धमाका हो सकता है। जो बाइडन ने इसकी वजह चीन की धीमी आर्थिक विकास दर को बताया। अमेरिकी राज्य यूटा में एक कार्यक्रम के दौरान बाइडन ने कहा कि 'उनकी (चीन) कुछ समस्याएं हैं, जो उनके लिए अच्छी नहीं हैं। जब बुरे लोगों के साथ दिक्कतें आती हैं तो वह बुरे काम ही करते हैं।'

G20 Summit in Bali: Xi Jinping and Joe Biden
G20 Summit in Bali: Xi Jinping and Joe Biden - फोटो : Agency
बिगड़ सकते हैं दोनों देशों के संबंध
जानकारों की मानें तो अमेरिका का यह नया आदेश चीन के साथ उसके संबंधों को और खराब कर सकता है। अमेरिका में मौजूद चीनी दूतावास ने इस आदेश को लेकर निराशा भी जाहिर की है। हालांकि चीन की आपत्ति पर अमेरिका ने कहा है कि यह आदेश सिर्फ उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखकर जारी किया गया है लेकिन इससे दोनों देशों की एक दूसरे पर आर्थिक निर्भरता पर असर नहीं होगा। वहीं, अमेरिका की विपक्षी पार्टी रिपब्लिकन ने बयान जारी कर इस आदेश में कई खामियां बताई हैं और इस आदेश को सिर्फ भविष्य के निवेश पर लागू करने पर भी नाराजगी जाहिर की है। 

दोनों देशों के बीच राजनीतिक कड़वाहट भी लगातार बढ़ रही है। जो बाइडन ने बीते साल जून में भी चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को तानाशाह कहा था। जिस पर चीन ने कड़ी आपत्ति जताई थी और बाइडन की टिप्पणी को उकसावे वाली कार्रवाई बताया था। अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकेन हाल ही में चीन का दौरा करके लौटे हैं। दोनों देशों के संबंध कड़वाहट के दौर से गुजर रहे हैं। ऐसे में बाइडन की ताजा टिप्पणी से भी दोनों देशों के संबंधों में तनाव आ सकता है। 

यूएस और चीन
यूएस और चीन - फोटो : पीटीआई
क्या पहले भी ऐसे आर्थिक युद्ध देखने को मिले थे?
इससे पहले अमेरिका ने 2018 में चीन के खिलाफ व्यापार युद्ध शुरू किया था। हालांकि, वह अमेरिका के लिए खुद को नुकसान पहुंचाने वाला कदम साबित हुआ। तत्कालीन डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने तब चीन से आयात होने वाली 300 बिलियन डॉलर की वस्तुओं पर अतिरिक्त शुल्क लगा दिए थे। मकसद अमेरिका में चीन की वस्तुओं का बाजार घटाना था। लेकिन अमेरिका के इंटरनेशनल ट्रेड कमीशन (यूएसआईसी) ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि उस कदम से असल नुकसान अमेरिकी उपभोक्ताओं को हुआ।

आयोग की मानें तो ट्रंप प्रशासन के फैसले के कारण चीन से आयातित ज्यादातर चीजों के दाम बढ़ गए। उनमें कंप्यूटर उपकरण, सेमीकंडक्टर, फर्नीचर और ऑडियो-वीडियो उपकरण शामिल हैं। इन चीजों की कीमत में 2021 तक 25 फीसदी बढ़ोतरी हो चुकी थी। चीनी वस्तुओं पर लगाए शुल्कों का यह नतीजा जरूर हुआ कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपने सप्लाई चेन को अलग स्रोतों से जोड़ना शुरू कर दिया। खासकर वियतनाम और मलेशिया को उन्होंने तरजीह दी।
 
जिन मकसदों से अमेरिका ने यह कदम उठाया था, उन्हें पूरा नहीं किया जा सका। आंकड़ों के मुताबिक जिन वस्तुओं पर शुल्क लगाया गया, 2017 में उनका अमेरिका ने 311 बिलियन डॉलर का आयात किया था। 2021 में यह आयात 265 बिलियन डॉलर का रह गया। मगर इससे बाजार में चीजों की कमी हो गई और उसका नतीजा महंगाई के रूप में सामने आया।
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