Pakistan: पाकिस्तान में जारी है अमेरिका बनाम चीन की बहस, हिना रब्बानी के लीक हुए पत्र से मचा बवाल
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विस्तार
पाकिस्तान अमेरिका के प्रति ज्यादा झुकाव रखे या चीन की तरफ, इस सवाल पर देश में बहस लगातार चल रही है। इस बहस की जड़ें कुछ समय पहले अमेरिका में लीक हुए दस्तावेजों से हैं, जिससे जाहिर हुआ था कि अब शहबाज शरीफ सरकार चीन से अपने रिश्तों को ज्यादा अहमियत दे रही है।
यहां कूटनीति विशेषज्ञों की राय है कि आर्थिक संकट से निकलने के लिए जूझ रहे पाकिस्तान को अमेरिका से अपेक्षित मदद नहीं मिली है। इससे शहबाज शरीफ सरकार में असंतोष पैदा हुआ है। लेकिन कुछ दूसरे विशेषज्ञों ने ध्यान दिलाया है कि अगर लीक हुए दस्तावेजों का बारीकी से अध्ययन किया जाए, तो साफ होता है कि पाकिस्तान सरकार के एक बड़े हिस्से के साथ-साथ पाकिस्तान की सेना भी अमेरिका और चीन के बीच संतुलन बना कर चलने के पक्ष में है।
लीक हुए दस्तावेज पाकिस्तान की विदेश राज्यमंत्री हिना रब्बानी खार को यह कहते बताया गया था कि पाकिस्तान अब चीन और अमेरिका से समान दूरी बना कर नहीं चल सकता। अब पाकिस्तान को पश्चिमी देशों को तुष्ट करना छोड़ देना चाहिए, क्योंकि अमेरिका के साथ संबंध बनाने के चक्कर में पाकिस्तान चीन के साथ अपने पार्टनरशिप के पूरे लाभों से वंचित हो जाएगा।
इस्लामाबाद स्थित एक थिंक टैंक के प्रमुख मुशर्रफ जैदी कहा है कि सबसे बड़ा सवाल यह है कि खार का पत्र लीक कैसे हुआ। उन्होंने कहा कि सारे लीक जानबूझ कर कुछ खास मकसद से किए जाते हैं। वेबसाइट निक्कईएशिया.कॉम से बातचीत में जैदी ने कहा- ‘इस मामले में अमेरिका का मकसद संभवतः यह है कि पाकिस्तान चीन की तरफ अपने झुकाव की बात का खंडन करने को मजबूर हो जाए।’
अमेरिका स्थित थिंक टैंक क्विन्सी इंस्टीट्यूट फॉर रेस्पॉन्सिबल स्टेटक्राफ्ट में रिसर्च फेलॉ एडम विंस्टीन के मुताबिक जब चीन और अमेरिका के बीच संतुलन बनाने का मुद्दा आता है, तो पाकिस्तान के राजनयिकों और सेना अधिकारियों के नजरिए में मतभेद का संकेत मिलता है। उन्होंने कहा- ‘सेना अधिकारी मध्य मार्ग पर चलना चाहते हैं, जबकि कूटनीतिज्ञ अमेरिका के साथ संबंध को लेकर नकारात्मक धारणा रखते हैं।’
पाकिस्तान में उग्रवाद के विशेषज्ञ और स्वतंत्र विश्लेषक फखर काकाखेल की राय में पड़ोसी देश अफगानिस्तान में अफरातफरी पैदा करने में अमेरिका और अन्य पश्चिमी देश शामिल रहे हैं। उन्होंने वेबसाइट निक्कईएशिया से कहा- अगस्त 2021 में उनकी सेना के वापस जाने के बाद वहां तालिबान ने सत्ता पर कब्जा जमा लिया। उसके बाद पाकिस्तान को अपेक्षा थी कि अमेरिका इस क्षेत्र में स्थिरता लाने में मदद करेगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उस हालत में तकनीकी रूप से देखा जाए, तो अमेरिका और पश्चिम ने खुद पाकिस्तान से अपने को अलग कर लिया। उसके बाद पाकिस्तान के पास अपने ‘हर हाल खरे उतरे दोस्त’ चीन पर निर्भर करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचा है।
विशेषज्ञों ने कई ऐसे कारणों का उल्लेख किया है, जिनसे पाकिस्तान में अमेरिका को लेकर नकारात्मक राय बनी है। इनमें आईएमएफ से कर्ज दिलवाने में सहायता न करना सबसे प्रमुख है। इस वजह से पाकिस्तान को आर्थिक सहायता पाने के लिए चीन, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के पास जाना पड़ा है। पाकिस्तान सरकार के एक अधिकारी ने निक्कईएशिया से कहा- ‘हम आईएमएफ से कर्ज हासिल करने में अमेरिका की मदद चाहते थे। लेकिन अमेरिका ने हमें निराश किया।’