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भारत को लेकर ट्रंप का दोहरा रवैया: रूस-यूक्रेन संघर्ष के बाद US-यूरोप का मॉस्को से कितना कारोबार, आंकड़े क्या?
Wed, 06 Aug 2025 03:40 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Wed, 06 Aug 2025 03:40 PM IST
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सार
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अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, रूस के व्लादिमीर पुतिन और भारत के पीएम नरेंद्र मोदी।
- फोटो :
अमर उजाला
विस्तार
रूस से कारोबार को लेकर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार भारत पर भारी-भरकम टैरिफ और जुर्माना लगाने की धमकी दे रहे हैं। भारत ने बीते कुछ महीनों से लगातार अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का हवाला देते हुए रूस से तेल और हथियारों की खरीद को लेकर किसी भी दबाव में न झुकने की बात कही है। हालांकि, ट्रंप की तरफ से लगातार तीखी होती टिप्पणियों के बाद भारत ने सोमवार को पहली बार पलटवार किया और भारत को निशाना बनाए जाने को अन्यापूर्ण और अनुचित करार दे दिया।नई दिल्ली ने कहा कि अमेरिका और यूरोपीय संघ रूस-यूक्रेन संघर्ष जारी रहने के बावजूद रूस से अलग-अलग उत्पाद खरीद रहे हैं। भारत ने अमेरिका पर परमाणु कार्यक्रम के लिए उत्पाद खरीदने और ईयू पर ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए रूस से लगातार कारोबार जारी रखने की बात कही। साथ ही तेल खरीद के लिए भारत को बेवजह निशाना बनाए जाने की आलोचना की।
भारत की तरफ से अमेरिका और ईयू को इस तरह तथ्यों के साथ जवाब देने की मुख्यतः दो वजहें हैं। पहला- ट्रंप ने हाल ही में रूस से तेल खरीदने के लिए भारत पर टैरिफ के साथ-साथ जुर्माना लगाने की धमकी दी है। मंगलवार को उन्होंने एक न्यूज चैनल के साथ इंटरव्यू में कहा कि भारत पर बढ़े हुए टैरिफ का एलान अगले 24 घंटे में हो सकता है। दूसरी तरफ यूरोपीय संघ ने जुलाई के अंतिम हफ्ते में भारत की बड़ी तेल रिफाइनिंग कंपनी नायरा पर प्रतिबंध लगाने का एलान किया था। इतना ही नहीं ईयू ने भारत से रिफाइन होकर आने वाले रूसी तेल के आयात को भी प्रतिबंधित कर दिया था। ईयू के इस फैसले के बाद अमेरिकी कंपनी माइक्रोसॉफ्ट ने नायरा एनर्जी के अकाउंट्स को बंद कर दिया।
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर अमेरिका और यूरोपीय संघ के जो देश लगातार रूस से कारोबार के लिए भारत की आलोचना कर रहे हैं, क्या वे खुद रूस से कारोबार में जुटे हैं? अगर हां तो यह कारोबार कितना है? अगर अमेरिका और यूरोप भारत पर प्रतिबंध और टैरिफ बढ़ाने का एलान करते हैं तो इससे भारत को कितने नुकसान की आशंका है? आइये जानते हैं...
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर अमेरिका और यूरोपीय संघ के जो देश लगातार रूस से कारोबार के लिए भारत की आलोचना कर रहे हैं, क्या वे खुद रूस से कारोबार में जुटे हैं? अगर हां तो यह कारोबार कितना है? अगर अमेरिका और यूरोप भारत पर प्रतिबंध और टैरिफ बढ़ाने का एलान करते हैं तो इससे भारत को कितने नुकसान की आशंका है? आइये जानते हैं...
पहले जानें- भारत ने अमेरिका-ईयू की पोल कैसे खोली?
भारत ने ट्रंप की धमकियों पर कई दिनों तक संयम रखने के बाद सोमवार को वॉशिंगटन और ब्रसेल्स पर सीधे निशाना साधा। नई दिल्ली की ओर से बयान जारी कर कहा गया, "एक अहम अर्थव्यवस्था के तौर पर भारत अपने हितों और अर्थव्यवस्था की सुरक्षा के लिए हर जरूरी कदम उठाएगा। लेकिन असल तथ्य यह है कि भारत ने रूस से तेल का आयात इसलिए शुरू किया, क्योंकि रूस-यूक्रेन संघर्ष शुरू होने के बाद हमारे पारंपरिक स्रोत यूरोप को तेल बेचने लगे। वैश्विक ऊर्जा बाजार को स्थिर रखने के लिए खुद अमेरिका ने उस वक्त भारत की तरफ से रूसी तेल की खरीद को बढ़ावा दिया था।"
भारत ने ट्रंप की धमकियों पर कई दिनों तक संयम रखने के बाद सोमवार को वॉशिंगटन और ब्रसेल्स पर सीधे निशाना साधा। नई दिल्ली की ओर से बयान जारी कर कहा गया, "एक अहम अर्थव्यवस्था के तौर पर भारत अपने हितों और अर्थव्यवस्था की सुरक्षा के लिए हर जरूरी कदम उठाएगा। लेकिन असल तथ्य यह है कि भारत ने रूस से तेल का आयात इसलिए शुरू किया, क्योंकि रूस-यूक्रेन संघर्ष शुरू होने के बाद हमारे पारंपरिक स्रोत यूरोप को तेल बेचने लगे। वैश्विक ऊर्जा बाजार को स्थिर रखने के लिए खुद अमेरिका ने उस वक्त भारत की तरफ से रूसी तेल की खरीद को बढ़ावा दिया था।"
ईयू को लेकर भारत ने कहा, "यूरोपीय संघ ने 2024 में रूस के साथ भारत से ज्यादा व्यापार किया है। 2024 में यूरोप ने 1.64 करोड़ टन एलएनजी (लिक्विफाइड नेचुरल गैस) का आयात किया, जो कि उसके 2022 के 1.52 करोड़ टन आयात के पिछले रिकॉर्ड से भी ज्यादा है।"
वहीं, अमेरिका के लिए भारत ने कहा, "अमेरिका ने अपने परमाणु उद्योग के लिए रूस से यूरेनियम हेक्साफ्लोराइड और इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) उद्योग के लिए पैलेडियम खरीदना जारी रखा है। इसके अलावा वह रूस से फर्टिलाइजर और केमिकल्स भी खरीद रहा है।"
वहीं, अमेरिका के लिए भारत ने कहा, "अमेरिका ने अपने परमाणु उद्योग के लिए रूस से यूरेनियम हेक्साफ्लोराइड और इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) उद्योग के लिए पैलेडियम खरीदना जारी रखा है। इसके अलावा वह रूस से फर्टिलाइजर और केमिकल्स भी खरीद रहा है।"
अमेरिका-ईयू के व्यापार को लेकर आंकड़े क्या कहते हैं?
रूस और यूक्रेन के बीच 2022 में संघर्ष शुरू होने के बाद 2023 में रूस ने करीब 394 अरब डॉलर का निर्यात किया। रूस से सबसे ज्यादा खरीद चीन ने की थी, जबकि दूसरे नंबर पर भारत था।
रूस और यूक्रेन के बीच 2022 में संघर्ष शुरू होने के बाद 2023 में रूस ने करीब 394 अरब डॉलर का निर्यात किया। रूस से सबसे ज्यादा खरीद चीन ने की थी, जबकि दूसरे नंबर पर भारत था।
अमेरिका-ईयू के प्रतिबंध भारत पर कितना बड़ा खतरा?
1. अमेरिका
बीते कुछ वर्षों में भारत के लिए अमेरिका सबसे बड़ा आयातक रहा है। दोनों देशों के बीच वित्त वर्ष 2024 में करीब 130 अरब डॉलर का कारोबार हुआ है। इसमें से 87 अरब डॉलर का निर्यात भारत की तरफ से अमेरिका को होता है। वहीं, भारत कुल मिलाकर अमेरिका से 42 अरब डॉलर के उत्पादों का आयात करता है। यानी अमेरिका का व्यापार घाटा करीब 46 अरब डॉलर का है।
1. अमेरिका
बीते कुछ वर्षों में भारत के लिए अमेरिका सबसे बड़ा आयातक रहा है। दोनों देशों के बीच वित्त वर्ष 2024 में करीब 130 अरब डॉलर का कारोबार हुआ है। इसमें से 87 अरब डॉलर का निर्यात भारत की तरफ से अमेरिका को होता है। वहीं, भारत कुल मिलाकर अमेरिका से 42 अरब डॉलर के उत्पादों का आयात करता है। यानी अमेरिका का व्यापार घाटा करीब 46 अरब डॉलर का है।
ऐसे में अगर ट्रंप प्रशासन की तरफ से भारत के उत्पादों पर 25 फीसदी आयात शुल्क लगाने का एलान किया जाता है, तो इससे भारत की चीजें अमेरिका में महंगी हो जाएंगी और जिन देशों पर ट्रंप की तरफ से कम टैरिफ लगाया गया है, उन देशों के उत्पादों को अमेरिकी बाजार में फायदा होगा। नतीजतन भारत के उत्पाद अमेरिका में कम प्रतियोगी हो सकते हैं और इससे भारत के निर्यात में भी गिरावट आ सकती है। दूसरी तरफ अगर ट्रंप ने रूस से तेल खरीदने के लिए भारत पर और बढ़ा हुआ टैरिफ लगाया तो इससे अमेरिका को होने वाले निर्यात सेक्टर के मुश्किल में पड़ने की आशंका है।
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2. यूरोपीय संघ
दूसरी तरफ यूरोप की तरफ से हाल ही में फैसला किया गया है कि वह न तो रूस से खुद तेल खरीदेगा और न ही दूसरे देशों से रूस से लिए गए रिफाइन किए हुए तेल को खरीदेगा। इससे आने वाले समय में भारतीय रिफाइनरियों को बड़ा नुकसान होने की आशंका है। स्टैंडर्ड्स एंड पूअर्स ग्लोबल मार्केट इंटेलिजेंस की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत ने जहां 2019 में यूरोप को 5.9 अरब डॉलर का तेल निर्यात किया था, तो इस वित्त वर्ष में उसने ईयू को 20.5 अरब डॉलर का तेल निर्यात किया। एसएंडपी के मुताबिक, भारत की यह क्षमता उसके रूस से तेल खरीदने, उसके तेल को रिफाइन करने और उसे पश्चिमी देशों को बेचने की वजह से पैदा हुई है।
गौरतलब है कि रूस अब तक भारत को काफी सस्ती दरों पर तेल मुहैया करा रहा है। ऐसे में अगर भारत ने रूस से तेल खरीदना बंद कर दिया तो पश्चिम एशियाई देशों से तेल की मांग बढ़ जाएगी। यानी पहले से ही ओपेक में शामिल जो देश यूरोप को बढ़ी हुई मात्रा में तेल सप्लाई कर रहे हैं, उन पर भारत की तेल जरूरतों को पूरा करने का दबाव बनेगा। भारत की बड़ी आबादी की मांग और पश्चिम एशिया के देशों की तरफ से तेल के कम खनन के कारण भारत को इसकी ज्यादा कीमत चुकानी पड़ सकती है।
दूसरी तरफ यूरोप की तरफ से हाल ही में फैसला किया गया है कि वह न तो रूस से खुद तेल खरीदेगा और न ही दूसरे देशों से रूस से लिए गए रिफाइन किए हुए तेल को खरीदेगा। इससे आने वाले समय में भारतीय रिफाइनरियों को बड़ा नुकसान होने की आशंका है। स्टैंडर्ड्स एंड पूअर्स ग्लोबल मार्केट इंटेलिजेंस की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत ने जहां 2019 में यूरोप को 5.9 अरब डॉलर का तेल निर्यात किया था, तो इस वित्त वर्ष में उसने ईयू को 20.5 अरब डॉलर का तेल निर्यात किया। एसएंडपी के मुताबिक, भारत की यह क्षमता उसके रूस से तेल खरीदने, उसके तेल को रिफाइन करने और उसे पश्चिमी देशों को बेचने की वजह से पैदा हुई है।
गौरतलब है कि रूस अब तक भारत को काफी सस्ती दरों पर तेल मुहैया करा रहा है। ऐसे में अगर भारत ने रूस से तेल खरीदना बंद कर दिया तो पश्चिम एशियाई देशों से तेल की मांग बढ़ जाएगी। यानी पहले से ही ओपेक में शामिल जो देश यूरोप को बढ़ी हुई मात्रा में तेल सप्लाई कर रहे हैं, उन पर भारत की तेल जरूरतों को पूरा करने का दबाव बनेगा। भारत की बड़ी आबादी की मांग और पश्चिम एशिया के देशों की तरफ से तेल के कम खनन के कारण भारत को इसकी ज्यादा कीमत चुकानी पड़ सकती है।
क्या अमेरिका ने ही भारत को ज्यादा तेल खरीदने के लिए मजबूर किया?
भारत की ओर से कहा गया है कि पहले अमेरिका और यूरोपीय संघ ने ही उसे रूस से तेल खरीद बढ़ाने के लिए प्रेरित किया था। हालांकि, अब पश्चिमी देश इस तेल खरीद के लिए भारत पर जुर्माना लगाने की धमकी दे रहे हैं।
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इसे लेकर भारत में अमेरिका के राजदूत रहे एरिक गार्सेटी ने मई 2024 में वॉशिंगटन स्थित थिंक-टैंक काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशन (सीएफआर) के एक कार्यक्रम में कहा था,
अमेरिका की इस नीति को लाने की वजह आसान थी- जहां पश्चिमी देश धीरे-धीरे रूस से तेल आयात को कम करने का लक्ष्य रख रहे थे, वहीं भारत रूस से तेल खरीद बढ़ाकर वैश्विक तेल सप्लाई चेन को स्थिर करने में मदद कर रहा था। इस साल जुलाई तक यूरोपीय संघ ने रूस के कच्चे तेल से रिफाइन किए हुए पेट्रोलियम उत्पादों पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया था। हालांकि, अब अमेरिका और यूरोपीय संघ ने अपने दावों से पलट गए हैं।
भारत की ओर से कहा गया है कि पहले अमेरिका और यूरोपीय संघ ने ही उसे रूस से तेल खरीद बढ़ाने के लिए प्रेरित किया था। हालांकि, अब पश्चिमी देश इस तेल खरीद के लिए भारत पर जुर्माना लगाने की धमकी दे रहे हैं।
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इसे लेकर भारत में अमेरिका के राजदूत रहे एरिक गार्सेटी ने मई 2024 में वॉशिंगटन स्थित थिंक-टैंक काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशन (सीएफआर) के एक कार्यक्रम में कहा था,
अमेरिका की इस नीति को लाने की वजह आसान थी- जहां पश्चिमी देश धीरे-धीरे रूस से तेल आयात को कम करने का लक्ष्य रख रहे थे, वहीं भारत रूस से तेल खरीद बढ़ाकर वैश्विक तेल सप्लाई चेन को स्थिर करने में मदद कर रहा था। इस साल जुलाई तक यूरोपीय संघ ने रूस के कच्चे तेल से रिफाइन किए हुए पेट्रोलियम उत्पादों पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया था। हालांकि, अब अमेरिका और यूरोपीय संघ ने अपने दावों से पलट गए हैं।
क्या भारत के मुकाबले रूस से ज्यादा कारोबार कर रहे पश्चिमी देश?
भारत ने कहा कि अमेरिका और यूरोपीय संघ लगातार रूस से कारोबारी रिश्ते बनाए हुए हैं। भारत की यह बात एकदम सही है।
1. यूरोप
यूरोपीय संघ के मुताबिक, 2024 में उसका और रूस का कारोबार करीब 77.9 अरब डॉलर था, जबकि इस दौरान भारत-रूस का कारोबार 68.7 अरब डॉलर था। यानी ईयू से 9.2 फीसदी कम।
एक गौर करने वाला तथ्य यह भी है कि यूरोपीय संघ लंबे समय से रूस से सबसे बड़े ऊर्जा आयातकों में से एक रहा है। 2021 में ईयू और रूस का कारोबार करीब 297.4 अरब डॉलर का था। दूसरी तरफ भारत इस दौर में रूसी उत्पादों के छोटे खरीदारों में था। कोरोनावायरस महामारी से ठीक पहले तक भारत और रूस का कारोबार महज 10 अरब डॉलर के वर्ग में था।
भारत ने कहा कि अमेरिका और यूरोपीय संघ लगातार रूस से कारोबारी रिश्ते बनाए हुए हैं। भारत की यह बात एकदम सही है।
1. यूरोप
यूरोपीय संघ के मुताबिक, 2024 में उसका और रूस का कारोबार करीब 77.9 अरब डॉलर था, जबकि इस दौरान भारत-रूस का कारोबार 68.7 अरब डॉलर था। यानी ईयू से 9.2 फीसदी कम।
एक गौर करने वाला तथ्य यह भी है कि यूरोपीय संघ लंबे समय से रूस से सबसे बड़े ऊर्जा आयातकों में से एक रहा है। 2021 में ईयू और रूस का कारोबार करीब 297.4 अरब डॉलर का था। दूसरी तरफ भारत इस दौर में रूसी उत्पादों के छोटे खरीदारों में था। कोरोनावायरस महामारी से ठीक पहले तक भारत और रूस का कारोबार महज 10 अरब डॉलर के वर्ग में था।
2022 में रूस-यूक्रेन संघर्ष शुरू होने के बाद यूरोप की तरफ से रूसी तेल और गैस के आयात को बंद करने के दावे किए जाते रहे। हालांकि, फिनलैंड के थिंक टैंक- सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर के मुताबिक, फरवरी 2022 (रूस के यूक्रेन पर हमले की तारीख) से लेकर अब तक ईयू ने रूस से तेल-गैस के आयात के लिए उसे 105.6 अरब डॉलर चुकाए हैं। यह रूस के 2024 के सैन्य बजट की 75 फीसदी राशि के बराबर है।
अकेले 2024 में ही ईयू ने रूस से एलएनजी आयात को पिछले साल के मुकाबले नौ फीसदी बढ़ा दिया। मौजूदा समय में यूरोप जिन चीजों का आयात रूस से करता है, उसका दो-तिहाई हिस्सा तेल-गैस का है। इसके अलावा ईयू खाद्य पदार्थ, कच्चे पदार्थ, मशीनरी और परिवहन से जुड़े उपकरण भी रूस से खरीदता था।
अकेले 2024 में ही ईयू ने रूस से एलएनजी आयात को पिछले साल के मुकाबले नौ फीसदी बढ़ा दिया। मौजूदा समय में यूरोप जिन चीजों का आयात रूस से करता है, उसका दो-तिहाई हिस्सा तेल-गैस का है। इसके अलावा ईयू खाद्य पदार्थ, कच्चे पदार्थ, मशीनरी और परिवहन से जुड़े उपकरण भी रूस से खरीदता था।
2. अमेरिका
यूरोपीय संघ की तरह ही अमेरिका भी रूस से कारोबार में जुटा है। 2024 में अमेरिका-रूस का कारोबार करीब 5.2 अरब डॉलर का रहा है। अमेरिका बीते वर्षों में रूस से फर्टिलाइजर, केमिकल और परमाणु उद्योग के लिए जरूरी पदार्थ खरीदता आया है। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (यूएसटीआर) के मुताबिक, 2021 में दोनों देशों का कारोबार करीब 36 अरब डॉलर था और अब इसमें कमी की गई है। हालांकि, ट्रंप के भारत पर लगाए गए आरोप इन आंकड़ों से पूरी तरह खारिज होते हैं।
यूरोपीय संघ की तरह ही अमेरिका भी रूस से कारोबार में जुटा है। 2024 में अमेरिका-रूस का कारोबार करीब 5.2 अरब डॉलर का रहा है। अमेरिका बीते वर्षों में रूस से फर्टिलाइजर, केमिकल और परमाणु उद्योग के लिए जरूरी पदार्थ खरीदता आया है। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (यूएसटीआर) के मुताबिक, 2021 में दोनों देशों का कारोबार करीब 36 अरब डॉलर था और अब इसमें कमी की गई है। हालांकि, ट्रंप के भारत पर लगाए गए आरोप इन आंकड़ों से पूरी तरह खारिज होते हैं।