United Kingdom strikes: एक के बाद दूसरी हड़ताल से चरमराती जा रही है ब्रिटेन की व्यवस्था
United Kingdom strikes: देश में दशकों बाद नर्सें हड़ताल पर गई हैं। बुधवार को इंग्लैंड के कई हिस्सों में अर्ध-स्वास्थ्य कर्मी (पैरामेडिक्स) भी हड़ताल पर चले गए। आशंका है कि ये हड़तालें जल्द खत्म नहीं हुईं, तो ब्रिटेन में अफरा-तफरी मच जाएगी...
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ब्रिटेन में क्रिसमस की छुट्टियों से ठीक पहले हड़तालों से पूरी व्यवस्था चरमराती दिख रही है। रेल कर्मचारियों के साथ-साथ स्वास्थ्य कर्मियों की हड़ताल ने त्योहार के माहौल में खलल डाल दिया है। इस बीच बॉर्डर फोर्स कर्मी, डाक कर्मचारी, बस ड्राइवर और प्रशासनिक अधिकारी भी या तो हड़ताल पर हैं, या हड़ताल पर जाने की तैयारी में हैं।
देश में दशकों बाद नर्सें हड़ताल पर गई हैं। बुधवार को इंग्लैंड के कई हिस्सों में अर्ध-स्वास्थ्य कर्मी (पैरामेडिक्स) भी हड़ताल पर चले गए। आशंका है कि ये हड़तालें जल्द खत्म नहीं हुईं, तो ब्रिटेन में अफरा-तफरी मच जाएगी। देश की स्वास्थ्य व्यवस्था पहले से ही कई मुश्किलों की शिकार है। इन हड़तालों से ऋषि सुनक के नेतृत्व वाली कंजरवेटिव सरकार पर दबाव और बढ़ गया है।
एंबुलेंस कर्मचारियों के हड़ताल पर जाने के कारण स्वास्थ्य अधिकारियों को यह आम अपील जारी करनी पड़ी कि लोग सावधानी बरतें, ताकि उन्हें एंबुलेंस बुलाने की जरूरत ना पड़े। विश्लेषकों के मुताबिक अलग-अलग सेक्टर्स के कर्मचारी अपनी खास मांगों को लेकर हाल में हड़ताल पर गए हैं। लेकिन हड़तालों का सिलसिला जारी रहने के कारण यह धारणा बन गई है कि ब्रिटन में श्रमिक वर्ग के लोग बगावत की राह पर हैं। वैसे ज्यादातर क्षेत्रों के कर्मचारियों की शिकायतों में एक सामान्य पहलू है। कर्मचारी यूनियनों के मुताबिक वर्षों से सामाजिक क्षेत्र के बजट में कटौती और कम निवेश के कारण उनके लिए अपनी सेवाएं देना मुश्किल होता चला गया है।
गुरुवार को हड़ताल पर एंबुलेंस कर्मियों और नर्सों ने मुद्रास्फीति दर के अनुपात में वेतन बढ़ाने की मांग की है। इसके पहले अलग-अलग क्षेत्रों के कर्मचारी भी यह मांग उठा चुके हैं। क्रिसमस की छुट्टियों के समय जिन क्षेत्रों के कर्मचारी इस मांग के समर्थन में आंदोलन पर उतरे हैं, उनमें रेलवे, डाक, बॉर्डर फोर्स, हवाई अड्डों पर बैगेज प्रबंधन की सेवा देने वाले कर्मी, लंदन के बस ड्राइवर, कई शिक्षक यूनियनें, और सरकारी वकील शामिल हैं।
विश्लेषकों के मुताबिक गुजरे महीनों में ब्रिटेन में बढ़ी महंगाई ने सभी वर्गों पर असर डाला है। महंगाई के कारण लोगों की वास्तविक आमदनी घट गई है। इस कारण तनख्वाह पर आश्रित तबकों के लिए वेतन वृद्धि की मांग करने के अलावा कोई और चारा नहीं रह गया है।
महंगाई की सबसे बुरी मार पब्लिक सेक्टर के कर्मचारियों पर पड़ी है। अमेरिकी टीवी चैनल सीएनएन की वेबसाइट पर छपे एक विश्लेषण के मुताबिक 2022 में प्राइवेट सेक्टर के कर्मियों की औसत वेतन वृद्धि दर 6.9 फीसदी रही, जबकि पब्लिक सेक्टर में यह सिर्फ 2.7 फीसदी रही। इसीलिए हड़ताल पर जाने वालों में सबसे बड़ी संख्या पब्लिक सेक्टर के कर्मचारियों की है।
इसी विश्लेषण के मुताबिक पूर्व प्रधानमंत्री डेविड कैमरॉन के जमाने में अपनाई गई किफायत की नीतियों के तहत सार्वजनिक सेवाओं के बजट में भारी कटौती की गई। उनके बनी तमाम सरकारों ने इस नीति को जारी रखा है। 2019 में हुए ब्रेग्जिट (यूरोपियन यूनियन से ब्रिटेन के अलगाव) का देश के कारोबार पर बहुत खराब असर हुआ। इससे महंगाई बढ़ी। इसी बीच कोरोना महामारी और उसके बाद यूक्रेन युद्ध ने हालात और मुश्किल बना दिए। अब इन सब का मिला-जुला असर सामने आ रहा है।
बीते छह साल में ब्रिटेन में राजनीतिक अस्थिरता का दौर भी रहा है। इस दौरान देश में पांच प्रधानमंत्री सत्ता में आए। लेकिन उनमें से किसी ने हालात को संभालने की प्रभावी नीति पर अमल नहीं किया। वर्तमान ऋषि सुनक सरकार ने कर्मचारियों की मांगों को मानने से इनकार कर दिया है। लेकिन इसका परिणाम जनमत सर्वेक्षणों में प्रधानमंत्री की लोकप्रियता में भारी गिरावट के रूप में सामने आया है।