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Hindi News ›   World ›   Ukraine crisis: Russian Foreign Ministry says that US-dominated NATO wants to justify its presence on the border of the Ukraine by citing Russia invasion on Ukraine

यूक्रेन संकट: अमेरिका बार-बार रूस के हमले की क्यों दे रहा है दुहाई? बाइडन के मुकाबले पुतिन की लोकप्रियता में इजाफा

Sat, 12 Feb 2022 03:05 PM IST
Shashidhar Pathak शशिधर पाठक
Updated Sat, 12 Feb 2022 03:05 PM IST
सार

रूस ने यूक्रेन के पूर्वी, उत्तरी और दक्षिणी सीमा पर एक लाख सैनिकों की तैनाती कर रखी है। इसमें भारी हथियार और अत्याधुनिक साजो-सामान हैं। काला सागर में उसके युद्धपोत, विमान वाहक बेड़ा, परमाणु पनडुब्बी, विध्वंसक तैनात हैं। अमेरिका का दावा है कि सैनिकों की यह संख्या 1.75 लाख होने वाली है। रूस वहां सैनिकों की स्थायी तैनाती के लिए लॉजिस्टिक सपोर्ट, ब्लड बैंक का इंतजाम कर रहा है...

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Ukraine crisis: Russian Foreign Ministry says that US-dominated NATO wants to justify its presence on the border of the Ukraine by citing Russia invasion on Ukraine
यूक्रेन और रूस के बीच तनाव - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

यूक्रेन संकट की गुत्थी सुलझाने की जितनी कोशिशें हो रही हैं, उतना ही मामला उलझता जा रहा है। इस बीच एक बड़ा सवाल उठ रहा है कि आखिर अमेरिका बार-बार रूस के यूक्रेन पर हमला करने की दुहाई के साथ चेतावनी क्यों दे रहा है? दो दिन पहले राष्ट्रपति जो बाइडन ने कहा कि रूस की यूक्रेन में घुसने की कोशिश भी हमला मानी जाएगी, लेकिन इसके बाद वह अपने इस स्टैंड से पीछे हट गए। हालांकि अमेरिका ने फिर दोहराया है कि बीजिंग ओलंपिक के दौरान रूस यूक्रेन पर हमला कर सकता है।

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यूक्रेन पर हमला जैसा कुछ नहीं, यह तो रूटीन अभ्यास है- रूस

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन कई बार कह चुके हैं कि यूक्रेन पर हमला करने जैसा कुछ भी नहीं है। अमेरिका ने भी अपने और नाटो सैनिकों की तैनाती का मकसद जंग में भाग लेना नहीं बल्कि नाटो क्षेत्र की रक्षा करना बताया है। कहा है कि आगे भी कूटनीति के रास्ते खुले हैं। रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव भी हमले की किसी योजना से इनकार करते हैं। विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया जराखोवा कहती हैं कि रूस के यूक्रेन पर हमला करने की योजना का हवाला देकर अमेरिका के प्रभुत्व वाला नाटो पड़ोसी देश (यूक्रेन) की सीमा पर अपनी मौजूदगी को न्यायोचित ठहराना चाहता है। इसलिए रूस के हमला करने का फर्जी माहौल बनाया जा रहा है। जराखोवा के अनुसार रूस की अपनी सीमाओं और सुरक्षा चिंताओं का हक है।

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जराखोवा की इसी लाइन के आगे विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव रूस की कूटनीति का आधार बुन रहे हैं। रूस की गोलबंदी का आधार भी यही है कि नाटो देशों की दबदबे की नीति अनुचित है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने इसी पक्ष को लेकर पश्चिमी देशों, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों से अपना पक्ष रखा है। इसी तरह का प्रस्ताव उन्होंने अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन द्वारा बातचीत का आमंत्रण देने पर उनके साथ वार्ता के दौरान दिया था। व्लादिमीर पुतिन के प्रस्ताव में पहली शर्त रूस और उसके आसपास के देशों को नाटो समूह में शामिल न करने का था। रूस के राजनयिक इसे अपने देश की क्षेत्रीय चिंताओं से जोड़कर देखते हैं।

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फिर रूस ने क्यों तैनात की सेना और बनाई युद्धाभ्यास की योजना?

रूस ने यूक्रेन के पूर्वी, उत्तरी और दक्षिणी सीमा पर एक लाख सैनिकों की तैनाती कर रखी है। इसमें भारी हथियार और अत्याधुनिक साजो-सामान हैं। काला सागर में उसके युद्धपोत, विमान वाहक बेड़ा, परमाणु पनडुब्बी, विध्वंसक तैनात हैं। अमेरिका का दावा है कि सैनिकों की यह संख्या 1.75 लाख होने वाली है। रूस वहां सैनिकों के लिए स्थायी तैनाती के लिए लॉजिस्टिक सपोर्ट, ब्लड बैंक का इंतजाम कर रहा है। यह लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष के लिए जरूरी है। इस व्यवस्था में समय भी लगता है। इसके सामानांतर रूस यूक्रेन से बिल्कुल सटी सीमा पर बेलारूस के साथ 10 दिन का बेहद घातक और अत्याधुनिक युद्धाभ्यास कर रहा है। रूस की इस आक्रामक योजना पर अमेरिका और 30 सदस्यीय नाटो संगठन निगाह गड़ाए हैं। यूक्रेन की इससे लगातार चिंता बढ़ रही है और यूरोपीय देश इसके आंच में झुलसने की आशंका जता रहे हैं। इस पूरी स्थिति पर रूस दो रणनीतियों को आगे बढ़ा रहा है। उसकी पहली चिंता नाटो को अपने क्षेत्र में घुसने को लेकर है। दूसरी रणनीति में वह इसे अपनी एकता, अखंडता, संप्रभुता की चिंता से जोड़कर रूटीन प्रक्रिया बता रहा है। उसका कहना है कि उसकी यूक्रेन पर हमले की कोई योजना नहीं है।

यह तो जोर अजमाइश है: रूस नाटो को तोड़ना चाहता है

यह दुहाई नाटो संगठन के सदस्य देश दे रहे हैं। नाटो संगठन में अमेरिका का प्रभाव है। अगली रणनीति भी बाइडन ही तय करेंगे और लातविया, इस्तानिया समेत रूस के आस-पास के 30 से अधिक देश नाटो के सदस्य हैं। नाटो संगठन का कहना है कि रूस उसके गठजोड़ को तोड़ने की साजिश कर रहा है। यह हरगिज नहीं होने दिया जाएगा। अपनी आजादी, स्वतंत्रता, यूरोप से नजदीकी का लाभ लेने, रूस के प्रभाव से मुक्त होने के लिए यूक्रेन भी इसका सपना देख रहा है। यूक्रेन में स्लाववादी अधिक हैं, लेकिन पूरे यूक्रेन में 17-19 फीसदी तक रूसी समर्थक हैं। रूसी भाषा उसके कई शहरों में काफी लोकप्रिय है। रूस के लिए यह उससे और यूरोप से सटा हुआ देश है। कह सकते हैं कि रूस के लिए गेट-वे ऑफ यूरोप है।

दूसरी तरफ रूस की मंशा को लेकर यूरोपीय देश खासकर फ्रांस, ब्रिटेन, पोलैंड, जर्मनी लगातार यूरोप को चेता रहे हैं। उनका कहना है कि रूस को उनकी एकता और क्षमता पर संदेह नहीं होना चाहिए। यूक्रेन पर कोई भी हमला हुआ तो रूस को इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। इस तरह से नाटो संगठन और पश्चिम के देश जहां इसे पुतिन की सोवियत संघ रूस वाली अवधारणा को साकार करने की कोशिश का हिस्सा बता रहे हैं, वहीं परोक्ष शब्दों में रूस के राजनयिक इसे अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन की साजिश भरी नीति और दादागिरी से जोड़ रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय मामले में यूक्रेन की बिना पर जो बाइडन और व्लादिमीर पुतिन की साख दांव पर है।

बाइडन के मुकाबले बढ़ रही है पुतिन की लोकप्रियता

अमेरिका की धमकी, यूरोप की चेतावनी और रूस की सैन्य तैनाती तथा युद्धाभ्यास ने यूक्रेन को युद्ध के संभावित भय से काफी डरा रखा है। यूक्रेन का एक बड़ा धड़ा और अमेरिका के कुछ थिंक टैंक भी जो बाइडन की इस नीति के काफी खिलाफ हैं। रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव, रक्षा मंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार निकोलाई पात्रुशेव लगातार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संबंध साध रहे हैं। अमेरिका के एंटनी ब्लिंकन, रूस की लिज ट्रस समेत तमाम नेता कूटनीति का पैमाना गढ़ने में लगे हैं। ब्रिटेन, फ्रांस, पोलैंड, जर्मनी के राष्ट्राध्यक्ष और राजनयिक दूत लगातार सक्रिय हैं।

इस बीच दो बेहद दिलचस्प बदलाव हुए। पहला अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन ने पुतिन को बातचीत की टेबल पर आने के लिए कहा। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के जानकारों का कहना है कि इससे बाइडन की तुलना में पुतिन का क्रेज बढ़ गया। दूसरा बड़ा बदलाव राष्ट्रपति पुतिन की दुनिया के एक और महाशक्ति राष्ट्र चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ तालमेल का संदेश देने की नीति रही। दोनों नेताओं की साथ आने की फोटो, जेस्चर ने दुनिया को नया संदेश दे दिया। एक बड़ा लाभ चीन को हुआ है। अमेरिका के साथ चरम पर चल रहे शीतयुद्ध, ट्रेडवॉर और आपसी नकारात्मक वातावरण से उसे फिलहाल मुक्ति मिल गई है। इसे भी लेकर बाइडन की आलोचना हो रही है कि उन्होंने इस बहाने चीन और रूस को उनकी विसंगतियों के बावजूद साथ आने का अवसर दे दिया।

अंतरराष्ट्रीय जगत के लिए अच्छा संदेश

यूक्रेन और रूस के बीच में युद्ध जैसी संभावना के बीच अब जिस तरह के संकेत आ रहे हैं, अंतरराष्ट्रीय जगत के लिए सुखद कहे जा सकते हैं। सामरिक मामलों पर नजर रखने वालों का कहना है कि भले ही अमेरिका और नाटो यूरोप की सुरक्षा में तथा यूक्रेन के लिए सैनिक और सैन्य साजोसामान भेज रहें हों लेकिन अब महाशक्तियों के बीच में सैन्य टकराव जैसी संभावना क्षीण हो रही है। कूटनीति के प्रयास तेजी से शुरू हुए हैं। उम्मीद है कि अगले कुछ सप्ताह में इसके कुछ सकारात्मक संकेत आएंगे। हालांकि रूस की पिछली रणनीति को देखते हुए कोई बहुत विश्वास के साथ कुछ ठोस नहीं कह पा रहा है।

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