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गरीब देशों के लिए मुश्किल हो गया है कोरोना वैक्सीन हासिल करना, अमीर देशों ने मचाई 'लूट'

Thu, 25 Feb 2021 05:06 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, लंदन
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, लंदन Published by: Harendra Chaudhary Updated Thu, 25 Feb 2021 05:06 PM IST
सार

हर डोज के लिए दक्षिण अफ्रीका को 5.25 डॉलर देने प़ड़ रहे हैं। एस्ट्राजेनेका कंपनी इसी दर पर ये वैक्सीन सऊदी अरब को भी दे रही है, जबकि सऊदी अरब दक्षिण अफ्रीका की तुलना में काफी धनी देश है...

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To obtain the Coronavirus vaccine becomes nightmare for developing and poor countries because they are paying more for the vaccine
Corona Vaccine - फोटो : pixabay

विस्तार

विकासशील देशों के लिए कोरोना वायरस का संक्रमण रोकने का वैक्सीन हासिल करना लगातार मुश्किल होता जा रहा है। उन्हें ना सिर्फ जल्द सप्लाई संबंधी समस्या का सामना करना पड़ रहा है, बल्कि वैक्सीन के लिए ज्यादा कीमत भी चुकानी पड़ रही है। ये बात गैर-सरकारी संस्था वन कैम्पन ने अपने ताजा अध्ययन के बाद कही है। कैम्पेन ने कहा है कि दूसरी तरफ धनी देशों में जल्द ही जरूरत की तुलना में वैक्सीन के एक अरब से ज्यादा डोज उपलब्ध हो जाएंगे। इसके पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) के निदेशक टेड्रोस एडहानॉम भी चेतावनी दे चुके हैं कि जिन देशों की सौदेबाजी की क्षमता कम है, संभव है कि वे वैक्सीन से वंचित रह जाएं।

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हाल के मीडिया रिपोर्टों में भी बताया गया है कि महामारी के दौरान धनी देशों ने अपनी ताकत का इस्तेमाल किया है। उन्होंने वैक्सीन निर्माता कंपनियों को अधिक संख्या में और अपेक्षाकृत किफायती दरों पर वैक्सीन डोज उपलब्ध कराने के लिए मजबूर किया है। हाल की एक रिपोर्ट में बताया गया कि ऑक्सफॉर्ड/एस्ट्राजेनेका ने बांग्लादेश को चार डॉलर प्रति डोज के हिसाब से वैक्सीन दी है। जबकि उसने यूरोपियन यूनियन के 27 देशों को ये वैक्सीन 3.5 डॉलर प्रति डोज के हिसाब से दिया है। भारत के सीरम इंस्टीट्यूट में इस वैक्सीन का उत्पादन हो रहा है।
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इसी वैक्सीन के हर डोज के लिए दक्षिण अफ्रीका को 5.25 डॉलर देने प़ड़ रहे हैं। एस्ट्राजेनेका कंपनी इसी दर पर ये वैक्सीन सऊदी अरब को भी दे रही है, जबकि सऊदी अरब दक्षिण अफ्रीका की तुलना में काफी धनी देश है। अमेरिका को ये कंपनी चार डॉलर प्रति डोज के हिसाब से वैक्सीन उपलब्ध करा रही है। कीमत में ये फर्क सिर्फ एस्ट्राजेनेका के वैक्सीन के मामले में नहीं है। बल्कि फाइजर/बाइयोएनटेक, मॉडेरना और साइनोवैक कंपनियों का वैक्सीन भी अलग-अलग देशों को अलग अलग दरों पर मिल पा रहा है।
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एस्ट्राजेनिका के साथ-साथ फाइजर की वैक्सीन को डब्ल्यूएचओ ने इमरजेंसी उपयोग की सूची में रखा है। ये वैक्सीन अफ्रीकन यूनियन के देशों को 6.75 डॉलर, ईयू को 14.70  डॉलर और अमेरिका को 19.50 डॉलर प्रति डोज की दर से मिल रहा है। लेकिन इस वैक्सीन को रखना एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि इसे माइनस 80 डिग्री तापमान बरकरार रखने वाले अति कोल्ड स्टोर में ही सुरक्षित रखा जा सकता है।

वेबसाइट पोलिटिको.ईयू के मुताबिक भारत के सीरम इंस्टीट्यूट की प्रतिष्ठा किफायती दरों पर वैक्सीन बनाने के लिए रही है। इसलिए जब ये खबर फैली कि कोरोना वायरस के वैक्सीन का उत्पादन वहां होगा, तो गरीब देशों में सस्ती वैक्सीन पाने की उम्मीद पैदा हुई। लेकिन अब ये उम्मीद टूट चुकी है। वेबसाइट पोलिटिको के मुताबिक संपर्क करने पर एस्ट्राजेनेका ने वैक्सीन डोज की कीमत में फर्क के बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी। उसके प्रवक्ता ने सिर्फ यह कहा कि कीमत कई चीजों पर निर्भर करती है। मसलन, वैक्सीन किस इलाके के लिए बनाई जा रही है और संबंधित देश ने कितनी मात्रा में वैक्सीन का ऑर्डर दिया है। जानकारों का कहना है कि जो देश बड़ी मात्रा में वैक्सीन डोज खरीद रहे हैं, कंपनियां उन्हें डिस्काउंट दे रही हैँ।

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने हाल में ब्रिटिश अखबार फाइनेंशियल टाइम्स को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि अफ्रीकी देशों को बहुत महंगे दाम पर वैक्सीन मिल रही है। उन्होंने कीमतों में फर्क रखने के लिए कंपनियों की आलोचना की थी। दक्षिण अफ्रीका के अधिकारियों का कहना है कि उन्हें एस्ट्राजेनेका ने इसलिए अधिक दाम पर वैक्सीन दी, क्योंकि कंपनी ने दक्षिण अफ्रीका को मध्य आय वाले देशों की श्रेणी में रखा है। जबकि असल में दक्षिण अफ्रीका ईयू के सबसे गरीब देशों से भी ज्यादा गरीब है।


वैसे दवाओं की कीमत में फर्क कोई नई बात नहीं है। पहले भी अलग-अलग दवाएं और वैक्सीन अलग-अलग देशों को अलग कीमत पर मिलती रही हैं। जानकारों के मुताबिक दवाओं की खरीद के सौदों में पारदर्शिता की कमी होती है। इसलिए ये समझना मुश्किल बना रहता है कि किसी देश को किसी दवा के लिए ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है। लेकिन कोरोना महामारी जैसे मौकों पर जब दुनिया में अधिक एकजुटता और संवेदनशीलता की अपेक्षाएं थीं, जानकार इस ट्रेंड के जारी रहने को अफसोसनाक मानते हैँ।

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