तो क्या अब सचमुच लग जाएगी बड़ी टेक कंपनियों पर लगाम, अमेजन के होंगे दोफाड़, यूट्यूब होगा अलग!
खबरों के मुताबिक हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव के सदस्यों ने द्विपक्षीय सहमति वाले पांच विधेयकों का खाका तैयार किया है। विश्लेषकों के मुताबिक हालांकि डेमोक्रेटिक पार्टी और रिपब्लिकन पार्टी में आज ज्यादातर मसलों पर सहमति नहीं है, लेकिन टेक कंपनियों के तौर-तरीकों को बदलने की जरूरत पर वे सहमत हैं...
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बड़ी टेक कंपनियों पर लगाम कसने से संबंधित विधेयक को लेकर अमेरिका की दोनों प्रमुख पार्टियों के सांसदों के बीच सहमति बन गई है। इससे इस विधेयक के पारित हो जाने की संभावना काफी बढ़ गई है। अगर ये विधेयक पारित हो गया, तो इन कंपनियों के कारोबार में बुनियादी बदलाव आ सकता है। जानकारों के मुताबिक अगर ये बिल पास हुआ, तो उसका यह मतलब होगा कि एपल कंपनी को अपने एप स्टोर को चलाने के तरीके बदलने होंगे। उधर अमेजन कंपनी का अपने बाजार पर नियंत्रण कमजोर हो जाएगा। साथ ही फेसबुक और गूगल अपनी छोटी प्रतिस्पर्धी कंपनियों को अपने रास्ते से नहीं हटा पाएंगी।
खबरों के मुताबिक हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव के सदस्यों ने द्विपक्षीय सहमति वाले पांच विधेयकों का खाका तैयार किया है। विश्लेषकों के मुताबिक हालांकि डेमोक्रेटिक पार्टी और रिपब्लिकन पार्टी में आज ज्यादातर मसलों पर सहमति नहीं है, लेकिन टेक कंपनियों के तौर-तरीकों को बदलने की जरूरत पर वे सहमत हैं। रिपब्लिकन पार्टी में भी ये राय बनी है कि इन कंपनियों का बिना प्रतिस्पर्धा के चलना आमजन के फायदे में नहीं है।
उधर व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने वेबसाइट एक्सियोस.कॉम से कहा कि बाइडन प्रशासन कांग्रेस (संसद) के साथ मिल कर इस दिशा में आगे बढ़ना चाहता है। व्हाइट हाउस की राय है कि बड़ी टेक कंपनियों के दबदबे से छोटे कारोबार को नुकसान हो रहा है। इससे वैसी अविष्कार भावना का गला घुंट रहा है, जिसकी वजह से अमेरिका दुनिया की अग्रणी अर्थव्यवस्था रहा है। अधिकारी ने कहा कि विधेयकों का जो खाका तैयार हुआ है, उन सबमें समस्या का समाधान ढूंढा गया है। उसने कहा कि बाइडन प्रशासन इस मामले में बनी द्विपक्षीय सहमति से उत्साहित है।
विधेयकों के जो प्रारूप तैयार किए गए हैं, उनमें एक में वर्चस्व कायम कर चुकीं कंपनियों के अपने प्रतिद्वंद्वियों को अनुचित रूप से नुकसान की स्थिति में डालने पर रोक लगाने के प्रावधान हैं। इसमें प्रावधान है कि बड़ी कंपनियां अपनी सामग्रियों और सेवाओं की कीमत मनमाने ढंग से तय नहीं कर पाएंगी। साथ ही एपल या एंड्रॉयड कंपनियां अपने एप स्टोर के बारे में मूल्य और नीतियां खुद तय नहीं कर पाएंगी। उनके ऐसा करने के कारण ही दूसरी कंपनियां नुकसान की स्थिति में रहती हैं। एक अन्य प्रारूप में प्रावधान है कि बड़ी कंपनियां अपने क्षेत्र की प्रतिस्पर्धी कंपनियों को नहीं खरीद पाएंगी। ऐसी खरीदारी करके ये कंपनियां बाजार में वैसी कंपनियों के उभरने को रोकती रही हैं, जिनसे आगे चल कर उन्हें चुनौती मिल सकती है।
तीसरे प्रारूप में शामिल एक प्रावधान ऐसा है, जिसके मुताबिक अमेजन कंपनी दो भागों में बंटने के लिए मजबूर हो जाएगी। इसमें किसी कंपनी के अपने प्लैटफॉर्म पर दी जाने वाली सेवाओं की कीमत खुद तय करने का अधिकार को खत्म करने की बात शामिल है। जानकारों के मुताबिक इस प्रारूप के मुताबिक गूगल को यू-ट्यूब को खुद से अलग करना होगा। प्रारूप में कहा गया है कि एक कंपनी सर्च इंजन और वीडियो सेवा दोनों अपने स्वामित्व में नहीं रख सकती, क्योंकि ऐसे में वह अपने वीडियो को अनुचित ढंग से प्रोमोट करने के लिए प्रेरित होती है।
चौथे प्रारूप में व्यवस्था है कि अगर यूजर्स अपने एक से दूसरे प्लैटफॉर्म पर अपने डाटा ले जाना चाहें, तो कोई कंपनी इसे नहीं रोक सकेगी। ये पोर्टेबिलिटी वैसी ही होगी, जैसा यूजर समान फोन नंबर रखते हुए सेवादाता कंपनी को बदल लेते हैं। पांचवें प्रारूप में एक अरब डॉलर से ज्यादा मूल्य वाले कंपनियों के विलय की निगरानी रखने के लिए प्रवर्तन एजेंसियों ज्यादा अधिकार देने की बात कही गई है। अब निगाहें इस पर टिकी हैं, इन तमाम बिलों को मिलाकर एक प्रभावी कानून बनाने की दिशा में कदम कितनी जल्दी उठाए जाते हैं।