न्यूजीलैंड: जीरो कोविड नीति खत्म होने से भयभीत हैं वहां का मूलवासी-अल्पसंख्यक समुदाय
अब तक न्यूजीलैंड उन देशों में है, जहां कोविड-19 के कारण प्रति व्यक्ति मृत्यु दर सबसे कम है। लेकिन अब सरकार ने जो अनुमान लगाए हैं, उनके मुताबिक अगले वर्ष संक्रमण और मौतों की संख्या बढ़ सकती है। इसकी वजह सरकार की जीरो कोविड-19 खत्म करने की योजना है। सरकारी अधिकारियों का कहना है कि इस नीति पर अनिश्चित समय तक नहीं चला जा सकता...
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बीते शनिवार को न्यूजीलैंड में एक दिन में कोरोना संक्रमण के सबसे ज्यादा नए मामले सामने आने का रिकॉर्ड बना। उस दिन देश में 160 नए मामले सामने आए। कोरोना महामारी की शुरुआत से ही न्यूजीलैंड ने जीरो कोविड की नीति अपनाई थी। इसके तहत संक्रमण का एक भी केस सामने आने पर सीमा बंद करने, सख्त क्वॉरंटीन, सामूहिक टेस्टिंग और लंबी अवधि के लॉकडाउन लागू करने के उपाय अपनाए गए। यह नीति कारगर रही। न्यूजीलैंड में कोविड-19 संक्रमण के इक्का-दुक्का मामले ही सामने आए थे।
लेकिन हाल में एशिया-प्रशांत क्षेत्र के दूसरे देशों की तरह न्यूजीलैंड में जीरो कोविड नीति में ढील दी गई है। सरकार ने एलान किया है कि जैसे ही 12 साल ऊपर उम्र के 90 फीसदी लोगों का टीकाकरण हो जाएगा, लॉकडाउन की नीति पूरी तरह खत्म कर दी जाएगी। आशा है कि दिसंबर तक इतने टीकाकरण का लक्ष्य हासिल हो जाएगा।
जेसिंडा ऑर्डेन सरकार की आलोचना
लेकिन ढिलाई के साथ पिछले हफ्ते संक्रमण के मामलों में तेज बढ़ोतरी ने प्रधानमंत्री जेसिंडा ऑर्डेन की सरकार की आलोचना शुरू हो गई है। आलोचकों का कहना है कि सरकार ने ढिलाई की जो नीति अपनाई है, उसका सबसे ज्यादा नुकसान मूलवासी माओरी समुदाय और अन्य अल्पसंख्यक समूहों को होगा। न्यूजीलैंड में दूसरे समुदायों की तुलना में माओरी समुदाय में गरीबी ज्यादा है। स्वास्थ्य सुविधाओं तक उनकी पहुंच भी कम है। माओरी समुदाय के अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों का कहना है कि सरकार की ढिलाई की नीति बहुत से माओरी लोगों की मौत का कारण बनेगी।
अब तक न्यूजीलैंड उन देशों में है, जहां कोविड-19 के कारण प्रति व्यक्ति मृत्यु दर सबसे कम है। लेकिन अब सरकार ने जो अनुमान लगाए हैं, उनके मुताबिक अगले वर्ष संक्रमण और मौतों की संख्या बढ़ सकती है। इसकी वजह सरकार की जीरो कोविड-19 खत्म करने की योजना है। सरकारी अधिकारियों का कहना है कि इस नीति पर अनिश्चित समय तक नहीं चला जा सकता।
सरकार की इस सोच ने माओरी और दूसरे अल्पसंख्यक समुदायों में चिंता बढ़ा दी है। एक माओरी कार्यकर्ता ने अमेरिकी टीवी चैनल एनबीसी से कहा- ‘आगे बहुत सारी अंत्येष्टियां देखने को मिलेंगी।’ ड्यूनेडिन स्थित ओटेगो यूनिवर्सिटी में संक्रामक रोग विशेषज्ञ माइकल बेकर के मुताबिक कुछ वर्गों में फैले डर का कारण सामाजिक गैर बराबरी है। उन्होंने एनबीसी से कहा- ‘बहुत से लोग खतरनाक अवस्था वाले मकानों में रहते हैं। बहुत से लोग मानसिक रोगों से पीड़ित या शराब या ड्रग्स की लत के शिकार हैं। ऐसे जन समूहों में संक्रमण का पता लगाना कठिन होता है। वहां संक्रमण तब तक फैलता रहता है, जब तक वह बड़ी महामारी के रूप में सामने ना आ जाए।’
लॉकडाउन से बढ़ी गरीबी
सरकार के मेडिकल सलाहकारों का कहना है कि टीकाकरण की ऊंची दर की वजह से संक्रमण के मामले कम रहेंगे। जो संक्रमण से ग्रस्त होंगे, उनमें भी इसके गंभीर लक्षण नहीं उभरेंगे। सरकार के सलाहकार डॉ. जेफ लॉव ने एनबीसी से कहा- ‘कोविड संक्रमण का शिकार हुए 90 से 95 फीसदी लोगों को अस्पताल जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।’
पर्यवेक्षकों के मुताबिक जेसिंड ऑर्डेन सरकार लंबे समय तक चले लॉकडाउन की वजह से भी आलोचना झेल रही थी। जन संगठनों का कहना था कि लॉकडाउन का कम आय वाले तबकों पर बहुत खराब असर हुआ है। ऑकलैंड स्थित संस्था चाइल्ड पॉवर्टी एक्शन ग्रुप का दावा है कि लॉकडाउन के कारण 18 हजार से ज्यादा बच्चे गरीबी रेखा के नीचे चले गए हैं।