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शिनजियांग में उइघुर मुसलमानों के मानवाधिकारों का हनन: चीन पर प्रतिबंध लगाने में क्यों नहीं शामिल हुआ जापान?

Wed, 24 Mar 2021 03:11 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, टोक्यो
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, टोक्यो Published by: Harendra Chaudhary Updated Wed, 24 Mar 2021 03:11 PM IST
सार

शिनजियांग मुद्दे पर नए प्रतिबंध लगाने की शुरुआत ईयू ने की। उसके बाद अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा ने भी शिनजियांग क्षेत्र में तैनात चीन के चार अधिकारियों पर प्रतिबंध लगा दिए। अमेरिका ने उन चार में से दो के खिलाफ पिछले साल जुलाई में ही प्रतिबंध लगाए थे...

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The European Union, US, Britain and Canada imposed new sanctions on China over the human rights violations Uighur Muslims in Xinjiang province, but Japan abstained
चीन में उइगर मुस्लिम - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

चीन के शिनजियांग प्रांत में उइगर मुसलमानों के कथित दमन के मुद्दे पर यूरोपियन यूनियन (ईयू), अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा ने चीन पर नए प्रतिबंध लगाए हैं, लेकिन जापान ने ऐसे किसी कदम से खुद को दूर रखा है। प्रतिबंधों के इस नए दौर के बीच उसने सिर्फ यह कहा है कि शिनजियांग में हो रही कार्रवाई 'गहरी चिंता' की बात है। टोक्यो से लेकर पश्चिमी राजधानियों तक में जापान के इस अलग रुख की वजहों को लेकर कयास लगाए जा रहे हैं। चीन के खिलाफ किसी गोलबंदी में जापान आगे रहता आया है। बीते हफ्ते अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकेन और रक्षा मंत्री लॉयड ऑस्टिन की यात्रा के समय साझा बयान में उसने चीन के खिलाफ कड़े शब्दों के इस्तेमाल पर अपनी सहमति दी थी।

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शिनजियांग मुद्दे पर नए प्रतिबंध लगाने की शुरुआत ईयू ने की। उसके बाद अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा ने भी शिनजियांग क्षेत्र में तैनात चीन के चार अधिकारियों पर प्रतिबंध लगा दिए। अमेरिका ने उन चार में से दो के खिलाफ पिछले साल जुलाई में ही प्रतिबंध लगाए थे। इसलिए इस बार इस लिस्ट में दो नाम और जोड़े। इसके बाद मंगलवार को यहां एक प्रेस कांफ्रेंस में जापान के चीफ कैबिनेट सेक्रेटरी कातसुनोबु कातो ने पूछा गया कि क्या जापान चीन के अधिकारियों पर आर्थिक प्रतिबंध, उनकी संपत्ति जब्त करने या आयात-निर्यात पर पाबंदी लगाने जैसे कदम उठाएगा, तो कातो ने कहा कि जापान के कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जिससे सरकार मानव अधिकार के मुद्दे पर एकतरफा ढंग से कोई आर्थिक प्रतिबंध लगा सके।
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गौरतलब है कि अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने चीन को घेरने के लिए अपने सहयोगी देशों को लामबंद करने की कोशिशें तेज कर रखी हैँ। जापान अमेरिका का पारंपरिक सहयोगी देश है। उधर ब्रिटेन के विदेश मंत्रालय ने नए प्रतिबंधों का एलान करते हुए कहा था कि मिल-जुल कर उठाए गए कदमों से ये साफ संकेत जाएगा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय चीन में ‘मानव अधिकारों के हनन’ की निंदा करने में एकजुट है। लेकिन हाल में चीन के खिलाफ जुबानी आक्रामकता दिखाने के बावजूद जापान ने प्रतिबंध जैसा कोई कदम उठाने से फिलहाल इनकार कर दिया है। पिछले हफ्ते अमेरिकी मंत्रियों की जापान यात्रा के समय जारी बयान में यह कहा गया था कि शिनजियांग प्रांत में मानव अधिकार की स्थिति दोनों देशों की साझा चिंता का विषय है।
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लेकिन कदम उठाने के मामले में जापान ने इस साझेपन का परिचय नहीं दिया है। टोक्यो के अखबार जापान टाइम्स ने कूटनीतिक विशेषज्ञों के हवाले से कहा है कि जापान अपने शक्तिशाली पड़ोसी देश को एक सीमा से ज्यादा नाराज करने को तैयार नहीं है। जापान इस समय गंभीर आर्थिक संकट में है। ऐसे में वह चीन के साथ अपने कारोबार में रुकावट खड़ी नहीं करना चाहता। फिर जापान में एक तबके की समझ यह है कि बाकी देश जहां चीन से बहुत दूर हैं, वहीं जापान उसका पड़ोसी है। ऐसे में चीन की आक्रामकता से उसे ज्यादा नुकसान हो सकता है।

लगाए गए ताजा प्रतिबंधों का चीन ने कड़ा जवाब दिया है। उसने जवाबी प्रतिबंध लगा दिए हैं। इस बीच वह रूस के साथ अपने संबंधों को एक नए स्तर पर ले गया है। रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव की बीजिंग यात्रा की समाप्ति पर जारी साझा बयान में सभी देशों से अपील की गई कि वे संयुक्त राष्ट्र को केंद्र में रख कर बनी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की दृढ़ता से रक्षा करें।

चीनी विशेषज्ञों ने इस बात को ‘नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था’ थोपने की अमेरिका की कोशिश को तगड़ा जवाब बताया है। उन्होंने कहा है कि अमेरिका ऐसी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और उसूल थोपने की कोशिश कर रहा है, जिसे वह खुद परिभाषित करता है। इसके पीछे उसका मकसद दुनिया पर अपनी दादागीरी जारी रखना है।


चाइना इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के कार्यकारी उपाध्य़क्ष रुअन जोंग्जे ने चीन के अखबार ग्लोबल टाइम्स से कहा कि चीन और रूस का साझा बयान यह जाहिर करता है कि दोनों देश बहु-ध्रुवीय दुनिया में वैश्विक न्याय की रक्षा के लिए संकल्पबद्ध हैं। विश्लेषकों ने कहा है कि ये बयान असल में दुनिया में एक नया ध्रुव बनाने का दस्तावेज है। ये कामयाब हुआ, तो दुनिया शीत युद्ध की तरह दो खेमों में बंट सकती है। इसे देखते संभवतया जापान सावधानी से चल रहा है। उसकी नीति फिलहाल ज्यादा जोखिम उठाने से बचने की है।

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