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नेपाल: अधिवेशन के दौरान गहराया आरोप, दलित विरोधी हो गई है माओवादी पार्टी

Mon, 03 Jan 2022 03:34 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडो
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडो Published by: Harendra Chaudhary Updated Mon, 03 Jan 2022 03:34 PM IST
सार

2011 की जनगणना के मुताबिक नेपाल की कुल आबादी में दलितों की संख्या 13 फीसदी है। पार्टी के नए प्रावधान के मुताबिक उसकी सेंट्रल कमेटी में सात फीसदी दलितों को ही जगह मिल पाएगी...

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The Communist Party of Nepal Maoist Centre has been facing serious allegations of neglecting Dalits during the ongoing national convention of the party
नेपाल कम्यूनिस्ट पार्टी - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (माओईस्ट सेंटर) पर दलितों की अनदेखी करने के गंभीर इल्जाम लगे हैं। ये आरोप पार्टी के यहां चल रहे राष्ट्रीय अधिवेशन के दौरान खुद उसके दलित कार्यकर्ताओं ने लगाया है। पार्टी ने 1990 के दशक में जब ‘जन युद्ध’ शुरू किया, उस समय इसमें शामिल हुईं कार्यकर्ता उमिता बैराली ने यहां कहा- ‘पार्टी दलितों का समर्थक होने का दावा करती है। लेकिन पार्टी नेतृत्व शायद ही कभी उनकी चिंता करता दिखा है।’

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नहीं मिली नुमाइंदगी

अधिवेशन में पार्टी प्रमुख पुष्प कमल दहल की तरफ से पेश राजनीतिक दस्तावेज को मंजूरी मिलने के बाद अब पार्टी के नए पदाधिकारियों के चुनाव की प्रक्रिया चल रही है। इस सिलसिले में 299 सदस्यों की केंद्रीय समिति का चुनाव हुआ है। लेकिन दलित कार्यकर्तां की शिकायत है कि एक बार फिर उन्हें इस समिति में पूरी नुमाइंदगी नहीं मिली है। पार्टी ने इस बार सांगठननिक चुनाव प्रक्रिया में बदलाव किया। इसके तहत 50 फीसदी सदस्य सीधे चुने जाने थे। कहा गया था कि बाकी बचे पदों पर आनुपातिक प्रतिनिधित्व दिया जाएगा।

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पार्टी ने 15 फीसदी पद दलितों को देने का प्रावधान किया था। इससे दलित सदस्यों की उम्मीदें बढ़ी थीं। लेकिन बाद में स्पष्ट किया गया कि ये 15 फीसदी सीटें आरक्षित 50 फीसदी स्थान के अंदर होंगी। इससे दलित कार्यकर्ताओं को गहरी निराशा हुई है। अगर पूरी सेंट्रल कमेटी के अंदर 15 फीसदी जगह मिलती, तो कम से कम 44 दलित सदस्य इसमें शामिल होते। लेकिन दिए गए स्पष्टीकरण के बाद साफ है कि सिर्फ 22 स्थान ही दलितों के लिए आरक्षित हैं।

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नेपाल में दलित 13 फीसदी

बैराली ने अखबार काठमांडू पोस्ट से कहा- ‘हमारे नेता जो कहते हैं, उसे व्यवहार में लाने में नाकाम रहे हैं। उन्होंने कहा था कि वे सभी पार्टी समितियों में दलितों को उनकी कुल आबादी की तुलना में दो फीसदी अधिक आनुपातिक प्रतिनिधित्व देंगे।’ गौरतलब है कि 2011 की जनगणना के मुताबिक नेपाल की कुल आबादी में दलितों की संख्या 13 फीसदी है। पार्टी के नए प्रावधान के मुताबिक उसकी सेंट्रल कमेटी में सात फीसदी दलितों को ही जगह मिल पाएगी।


लेकिन इस बार के अधिवेशन में संकेत मिला है कि पार्टी के दलित सदस्य अब पर्याप्त प्रतिनिधित्व के लिए अब संघर्ष के मूड में हैं। उन्होंने पार्टी चेयरमैन पुष्प कमल दहल को दो ज्ञापन सौंपें हैं। दलित सदस्यों ने कहा है- ‘प्रत्यक्ष चुनाव में पांच दलित सदस्य निर्वाचित हुए। 20 दलित सदस्यों को आनुपातिक श्रेणी से जगह मिली है। आनुपातिक श्रेणी में दो और सदस्य अभी निर्वाचित होने हैं। यानी किसी भी स्थिति में दलितों को अपनी आबादी के अनुपात के बराबर यानी 13 फीसदी भी जगह नहीं मिलेगी।’ दलित बुद्धि नेपाली ने कहा- हमारे नेताओं ने हमारी उम्मीदों और सपनों को ध्वस्त कर दिया है। हमारी पार्टी प्रतिगामी हो गई है।


आठवें राष्ट्रीय अधिवेशन में दलित सदस्यों का विरोध उस समय फूटा, जब पार्टी नेतृत्व पहले से आलोचनाओं से घिरा हुआ है। पार्टी नेताओं पर इस दौरान समाजवाद की तरफ बढ़ने में नाकाम रहने, सभी वंचित समुदायों को मंच उपलब्ध ना करा पाने, और सर्वहारा वर्ग के लिए काम ना करने के इल्जाम लगे हैँ।

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