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बिगड़े रिश्ते: क्या होगा यूरोपियन यूनियन और चीन के बीच हुए व्यापक निवेश समझौते का भविष्य? चीनी अफसरों पर लगाया प्रतिबंध

Wed, 24 Mar 2021 02:52 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, ब्रसेल्स
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, ब्रसेल्स Published by: Harendra Chaudhary Updated Wed, 24 Mar 2021 02:52 PM IST
सार

चीनी मीडिया में ऐसी बातों को पाखंडी रुख बताया गया है। चीनी विशेषज्ञों ने कहा है कि ईयू एक तरफ चीन के बाजार का फायदा उठाना चाहता है, लेकिन प्रतिबंध जैसे कदम उठा कर ‘मानव अधिकारों का रक्षक होने’ का पाखंड भी करना चाहता है...

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Tension increase between the European Union and China over allegations of human rights abuses in China Xinjiang province
चीन में निवेश - फोटो : Twitter: @vonderleyen

विस्तार

चीन के शिनजियांग प्रांत में मानवधिकारों के हनन के आरोप को लेकर यूरोपियन यूनियन (ईयू) और चीन के बीच बढ़े तनाव के बाद अब ईयू-चीन व्यापक निवेश समझौते के भविष्य को अनिश्चित माना जा रहा है। ये समझौता पिछले 31 दिसंबर को हुआ था। तब अमेरिका में सत्ता संभालने की तैयारियों में जुटी जो बाइडन की टीम की इच्छाओं को नजरअंदाज करते हुए ईयू ने ये समझौता किया था। फिलहाल ईयू में इस करार के अनुमोदन की प्रक्रिया अपने आखिरी दौर में है। लेकिन इस हफ्ते पैदा हुए नए हालात से इसके खटाई में पड़ जाने का अंदेशा पैदा हो गया है।

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पहले ईयू ने शिनजियांग प्रांत में तैनात चार चीनी अधिकारियों पर प्रतिबंध लगाए। चीन ने तुरंत जवाबी कदम उठाया। इससे ईयू में आक्रोश और बढ़ा। उसका असर निवेश करार पर पड़ता दिख रहा है। चीन की तरफ से प्रतिबंधों के एलान के तुरंत बाद यूरोपियन संसद के सोशलिस्ट और डेमोक्रेटक सदस्यों के गुट (एसएंडडी) ने कहा कि अब वह करार के अनुमोदन के लिए किसी बातचीत में शामिल नहीं होगा। यूरोपियन संसद में यह एक प्रभावशाली गुट है।
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एक वेबसाइट पर छपे एक विश्लेषण में कहा गया है कि अगर निवेश समझौते का अनुमोदन नहीं हुआ, तो वह चीन के लिए एक बड़ा झटका होगा। उधर इसे अमरिकी कूटनीति की जीत माना जाएगा, जो चीन के खिलाफ अधिक से अधिक देशों को लामबंद करने में जुटी हुई है।
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व्यापक निवेश समझौते पर सहमति सात साल तक चली बातचीत के बाद जाकर बन सकी थी। इसमें प्रावधान है कि ईयू और चीन की कंपनियां एक दूसरे के यहां अधिक आसानी से निवेश कर पाएंगी। साथ ही, दोनों के बाजारों में एक दूसरे की पहुंच बनेगी। यूरोपियन संसद के लिए स्पेन विजयी हुए एसएंडडी गुट के सदस्य इनमाकुलादा रोड्रिग्ज-पिनरो ने अमेरिकी टीवी चैनल सीएनएन से कहा- ‘चीन के साथ व्यापार करना यूरोप की जरूरत है। लेकिन हमारे लिए हमारे उसूल और मानक सबसे ऊपर हैं।’

चीनी मीडिया में ऐसी बातों को पाखंडी रुख बताया गया है। चीनी विशेषज्ञों ने ध्यान दिलाया है कि पौने तीन महीने पहले जब ये समझौता हुआ, तब से शिनजियांग के हालात में कोई बदलाव नहीं आया है। उन्होंने कहा है कि ईयू एक तरफ चीन के बाजार का फायदा उठाना चाहता है, लेकिन प्रतिबंध जैसे कदम उठा कर ‘मानव अधिकारों का रक्षक होने’ का पाखंड भी करना चाहता है।

चीन ने अपनी जवाबी कार्रवाई में यूरोप के दस राजनेताओं और चार संस्थाओं पर पाबंदी लगाई है। उन पर चीन के बारे में दुर्भावनापूर्ण दुष्प्रचार फैलाने और चीन के आंतरिक मामलों में दखल देने का आरोप लगाया गया है। अब ये नेता और उन संस्थाओं से जुड़े व्यक्ति चीन, हांगकांग, और मकाउ की यात्रा नहीं कर सकेंगे। उनसे संबंधित कंपनियां चीन में कारोबार नहीं कर सकेंगी। जिन संस्थाओं पर प्रतिबंध लगाए गए हैं, उनमें मर्केटर इंस्टीट्यूट फॉर चाइनीज स्टडीज और एलायंस फॉर डेमोक्रेसीज फाउंडेशन भी हैं। ये दोनों कंजरवेटिव संस्थाएं हैं, जिनका चीन के मामले में आक्रामक रुख रहा है।

चीनी मीडिया में ईयू और प्रतिबंध लगाने वाले दूसरे देशों के खिलाफ चीन की जवाबी कार्रवाई का पुरजोर समर्थन किया गया है। कहा गया है कि ईयू ने अपने घरेलू जनमत को संदेश देने के लिए चीनी अधिकारियों पर प्रतिबंध लगाए हैं। लेकिन चीन चुपचाप इसे बर्दाश्त नहीं कर सकता।


लेकिन पश्चिमी विश्लेषकों का कहना है कि नए बन रहे हालात से पश्चिमी देशों में फूट डालने की चीनी रणनीति को झटका लगा है। उनके मुताबिक चीन को उम्मीद थी कि उसकी बाजार की ताकत के कारण ईयू और अमेरिका में चीन विरोधी सहमति नहीं बन सकेगी। लेकिन इस बात की वास्तविक संभावना पैदा हो गई है कि अमेरिका, ईयू और ब्रिटेन चीन के मामले में एकजुट हो जाएं और साझा कार्रवाई करें। इससे व्यापक निवेश समझौता खतरे में पड़ गया है। समझौते का अनुमोदन नहीं हुआ तो बेशक यूरोप को भारी नुकसान होगा, लेकिन चीन के लिए यह आर्थिक के साथ-साथ कूटनीति क्षति भी होगी।

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