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Afghanistan: दोनों तरफ की हैं अपनी-अपनी शिकायतें, तालिबान-पाकिस्तान के रिश्तों में बढ़ती जा रही है खटास

Wed, 23 Nov 2022 03:33 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काबुल
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काबुल Published by: Harendra Chaudhary Updated Wed, 23 Nov 2022 03:33 PM IST
सार

Afghanistan: पर्यवेक्षकों के मुताबिक अफगानिस्तान में अपना प्रभाव रखना अपने विदेश नीति मकसदों के लिहाज से पाकिस्तान को बेहद अहम मालूम पड़ता है। जबकि मौजूदा तालिबान सरकार लगातार उसे अहसास करा रही है कि यह 1990 के दशक जैसी तालिबान सरकार नहीं है...

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Taliban government is keeping a close watch on the changing attitude of Pakistan in the matter of Afghanistan
Afghanistan: Taliban - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

अफगानिस्तान के मामले में पाकिस्तान के बदलते रुख पर तालिबान सरकार कड़ी नजर रख रही है। यहां ये आम समझ बनी है कि पिछले साल तालिबान के सत्ता में काबिज होने के बाद पाकिस्तान ने जो दोस्ताना रुख दिखाया था, वह दौर गुजर चुका है। अब पाकिस्तान की ज्यादा दिलचस्पी अफगानिस्तान में अड्डा बनाए आतंकवादी संगठनों को नियंत्रित करने में है। साथ ही वह अफगानिस्तान में भारत की संभावित भूमिका को रोकने की कोशिश में जुटा हुआ है। इससे अफगानिस्तान की मौजूदा सरकार के साथ पाकिस्तान के रिश्तों में कड़वाहट लगातार बढ़ रही है।

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विश्लेषकों के मुताबिक पाकिस्तान की शिकायत यह है कि तालिबान सरकार ने उसकी चिंताओं को दूर नहीं किया है। तालिबान के सत्ता में आने के बाद से पाकिस्तान में आतंकवादी हमलों में 56 फीसदी का इजाफा हुआ है। अफगानिस्तान में अल-कायदा, तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) और इस्लामिक स्टेट खोरासान (आईएसआईएस-के) के अड्डे पहले की तरह मौजूद हैं। पाकिस्तान का आरोप है कि ये गुट ही सीमा पार से उसके यहां आतंकवादी हमले कर रहे हैं। खासकर टीटीपी का निशाना पाकिस्तान बना हुआ है।

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पर्यवेक्षकों ने ध्यान दिलाया है कि इस वर्ष सितंबर में संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करते हुए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने अफगानिस्तान की आलोचना की थी। उन्होंने कहा था कि अफगानिस्तान में सक्रिय आतंकवादी गुटों को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता से पाकिस्तान सहमत है। उस भाषण से तालिबान में गहरी नाराजगी देखी गई। उधर पाकिस्तानी टीकाकारों ने कहा है कि तालिबान स्वायत्त विदेश नीति अपनाने की कोशिश में है, जिससे पाकिस्तान के हितों को चोट पहुंच सकती है।

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इस्लामाबाद स्थित नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी में समाज विज्ञान के असिस्टेंट प्रोफेसर अहमद वकास ने वेबसाइट एशिया टाइम्स पर छपी एक टिप्पणी में लिखा है- ‘तालिबान भारत से अनुरोध कर रहा है कि वह द्विपक्षीय व्यापार और मानवीय सहायता फिर शुरू कर अफगानिस्तान में अभी भूमिका बढ़ाए। तालिबान ने अफगान बलों के प्रशिक्षण में भारत की मदद लेने में दिलचस्पी दिखाई है।’

तालिबान ने ईरान में चाबहार बंदरगाह परियोजना का समर्थन किया है। जबकि ये परियोजना पाकिस्तान के ग्वादार बंदरगाह के मुकाबले विकसित की गई है। अहमद वकास ने कहा है कि यह भी इस बात की मिसाल है कि तालिबान पाकिस्तान के हितों की अनदेखी कर रहा है।

पर्यवेक्षकों के मुताबिक अफगानिस्तान में अपना प्रभाव रखना अपने विदेश नीति मकसदों के लिहाज से पाकिस्तान को बेहद अहम मालूम पड़ता है। जबकि मौजूदा तालिबान सरकार लगातार उसे अहसास करा रही है कि यह 1990 के दशक जैसी तालिबान सरकार नहीं है। उस समय ये धारणा बनी थी कि तालिबान सरकार के सूत्र पाकिस्तान- खास कर पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के हाथ में हैं।

तालिबान के सूत्र भी यह कहने में नहीं हिचकते कि पाकिस्तान के साथ उनका रिश्ता संरक्षक और अधीनस्थ का नहीं हो सकता। तालिबान की शिकायत यह है कि पाकिस्तान सरकार उसके साथ बराबरी का व्यवहार नहीं करती है। विश्लेषकों के मुताबिक एक दूसरे के प्रति दोनों तरफ गहराती शिकायतों से दोनों देशों के रिश्ते हाल के महीनों में लगातार बिगड़े हैं।

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