Survey report: अध्ययन में आया सामने, दुनिया में अब पश्चिम की मनमर्जी नहीं चलेगी
सर्वे में शामिल अध्ययनकर्ता इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि यूक्रेन युद्ध विश्व इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण टर्निंग प्लाइंट साबित हो सकता है। इसके बाद अब ‘पश्चिम के प्रभाव से मुक्त दुनिया’ का उदय हो सकता है...
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यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद पहले साल में जहां पश्चिमी देश अधिक मजबूती से एकजुट हुए हैं, वहीं बाकी दुनिया से उनकी दूरी बढ़ गई है। यह बात यूरोप के प्रमुख थिंक टैंक यूरोपियन काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस (ईसीएफआर) के एक नए अध्ययन से सामने आई है। अध्ययन रिपोर्ट यूक्रेन युद्ध की पहली बरसी से ठीक पहले जारी की गई।
अपने अध्ययन के दौरान ईसीएफआर के शोधकर्ताओं ने यूरोपियन यूनियन (ईयू) के सदस्य नौ देशों के साथ-साथ अमेरिका, ब्रिटेन, भारत, चीन, रूस और तुर्किये में लोगों के बीच सर्वे किया। इससे सामने आया कि युद्ध, लोकतंत्र और विश्व शक्ति-संतुलन के मुद्दों पर ईयू के लोगों की आम राय और बाकी दुनिया के लोगों की आम राय में काफी फासला बन गया है। ईयू के जिन सदस्य देशों में सर्वे किया गया, उनमें फ्रांस, जर्मनी और पोलैंड शामिल हैं।
सर्वे में शामिल अध्ययनकर्ता इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि यूक्रेन युद्ध विश्व इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण टर्निंग प्लाइंट साबित हो सकता है। इसके बाद अब ‘पश्चिम के प्रभाव से मुक्त दुनिया’ का उदय हो सकता है। ईसीएफआर के निदेशक और अध्ययन रिपोर्ट के लेखकों में से एक मार्क लियोनार्ड ने ब्रिटिश अखबार द गार्जियन को बताया- ‘यूक्रेन युद्ध से एक विरोधाभास सामने आया है। पश्चिमी जगत अब अधिक एकजुट है, लेकिन दुनिया में उसका प्रभाव इस समय जितना कम हुआ है, वैसा पहले कभी नहीं था।’
इस अध्ययन से जुड़े रहे ब्रिटेन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर टिमोथी गार्टॉन ऐश ने अध्ययन के निष्कर्षों को पश्चिमी उत्साह पर पानी डालने वाला बताया है। उन्होंने कहा- यूक्रेन युद्ध ने यूरोप और अमेरिका के बीच एकता पैदा की है और उन्हें समान उद्देश्य दिया है। लेकिन पश्चिमी देश बाकी दुनिया की बाकी बड़ी ताकतों- चीन, भारत और तुर्किये आदि को अपने साथ लाने में पूरी तरह नाकाम रहे हैं। उन्होंने कहा- ‘सबक साफ है। हमें तुरंत ऐसा नया नैरेटिव तैयार करना होगा, जो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत और उसके जैसे देशों में स्वीकार्य हो सकें।’
सर्वे के दौरान इसमें शामिल लोगों को रूस के व्यवहार को व्यक्त करने के लिए दस शब्द दिए गए। अमेरिका में 45 फीसदी देशों ने इनमें से ‘आक्रामक’ शब्द को चुना, जबकि 41 फीसदी लोगों ने ‘अविश्वसनीय’ शब्द को चुना। यूरोप में इन शब्दों को चुनने वाले लोगों की संख्या क्रमशः 48 और 30 फीसदी रही, जबकि ब्रिटेन में यह संख्या 57 और 49 फीसदी रही। लेकिन गैर-पश्चिमी देशों में यह संख्या काफी कम रही।
बल्कि उन देशों में बहुमत की राय यह सामने आई कि अगले एक दशक में दुनिया पर से अमेरिका और उसके साथी देशों का वर्चस्व खत्म हो जाएगा। अध्ययन से जुड़े रहे एक विशेषज्ञ ने द गार्जियन को बताया कि दुनिया में अब ज्यादातर लोग यह मानते हैं कि दुनिया दो ध्रुवों में बंट रही है। पश्चिमी देशों से बाहर के लोग अब चीजों को अलग ढंग से देख रहे हैं।
उन्होंने कहा- ‘पश्चिमी देशों को अब चीन और रूस जैसे तानाशाही व्यवस्था वाले विरोधी देशों के साथ जीना सीखना होगा। साथ ही उन्हें भारत और तुर्किये जैसे स्वतंत्र रुख वाले देशों के साथ जीना सीखना पड़ेगा। ये देश कोई तीसरा गुट नहीं बना रहे हैं, ना ही उनकी कोई साझा विचारधारा है। लेकिन वे महाशक्तियों की मर्जी और योजनाओं के मुताबिक चलने को भी तैयार नहीं हैं।’