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श्रीलंका ने माफी मांगी: कोविड पीड़ित मुस्लिमों का कराया था जबरन दाह संस्कार, कहा- भविष्य में ऐसा नहीं होगा

Wed, 24 Jul 2024 01:18 AM IST
विशांत श्रीवास्तव वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, कोलंबो
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, कोलंबो Published by: विशांत श्रीवास्तव Updated Wed, 24 Jul 2024 01:18 AM IST
सार

श्रीलंका की सरकार ने मुस्लिम समुदाय से माफी मांगी है। सरकार ने कहा कि कोरोना काल के दौरान कोविड पीड़ित मुसलमानों का जबरन दाह संस्कार करवाया गया, जो कि गलत था। 

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Sri Lankan Government Apologises For "Forced" Cremation Of Muslim Covid Victims
भारत के साथ जमीन से जुड़ेगा श्रीलंका - फोटो : ANI

विस्तार

श्रीलंका की सरकार ने मंगलवार को औपचारिक रूप से मुस्लिम कोविड पीड़ितों के जबरन दाह संस्कार करने के लिए माफी मांगी है। साथ ही भविष्य में ऐसी गलती ना करने का आश्वासन दिया है। 

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श्रीलंकाई सरकार ने माफी मांगते हुए कहा कि कोविड काल के दौरान डब्ल्यूएचओ के आश्वासन की अनदेखी की गई थी। जिसमें इस्लामी संस्कारों के अनुरूप दफनाना सुरक्षित था। 
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सरकार ने आगे कहा कि एक नया कानून दफनाने या दाह-संस्कार के अधिकार की गारंटी देगा ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि भविष्य में मुसलमानों या किसी अन्य समुदाय के अंतिम संस्कार रीति-रिवाजों का उल्लंघन न हो।
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मुस्लिम प्रतिनिधियों ने किया स्वागत
श्रीलंका के सदन में मुस्लिम प्रतिनिधियों ने सरकार के इस फैसले का स्वागत किया है। साथ ही कहा कि मुस्लिम की आबादी द्वीप की कुल आबादी का 10 प्रतिशत है और कोविड काल के बाद से अब तक मुसलमान सदमे में हैं। 


श्रीलंका में बौद्ध बहुसंख्यंक हैं
परंपरागत रूप से मुसलमान अपने मृतकों को मक्का की ओर मुंह करके दफनाते हैं। श्रीलंका के बहुसंख्यक बौद्धों का आम तौर पर अंतिम संस्कार किया जाता है, जैसा कि हिंदुओं का होता है।

सरकार ने कहा था- दफनाने से महामारी फैल जाती है
कोविड काल के दौरान श्रीलंका की सरकार ने स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं का हवाला देते हुए मृतकों को दफनाने की अनुमति नहीं दी थी। उसने कुछ विशेषज्ञों का हवाला देते हुए दावा किया था कि कोविड-19 से मरे लोगों को दफनाने से पानी दूषित हो जाएगा, जिससे महामारी और फैल जाएगी। 


सरकार के इस आदेश की संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद ने भी आलोचना की थी। कई अधिकार समूहों ने कहा था कि श्रीलंका मृतकों और उनके परिजनों, खासतौर पर मुस्लिमों, कैथोलिक और कुछ बौद्धों की धार्मिक भावनाओं का सम्मान करने में विफल रहा है। इस्लामी देशों के संगठन (ओआईसी) ने भी इस फैसले को पलटने के लिए जिनेवा में अपील की थी। 

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